रविवार, 20 जनवरी 2013

दुनियां छल बल की,

मैंने तो रिश्तों का कौमार्य उतरते देखा,
निज अपनो का व्यवहार बदलते देखा,
सीख मिली नूतन सी मुझको,
फिर भी मन है भारी,
व्यथित ह्रदय होता है पल पल,
सोच के हे त्रिपुरारी,
सरित प्रेम को मिल प्रपात में,
धार बदलते देखा,
मैने तो रिश्तों का कौमार्य.......
पलक झपकते बदली दुनियां,
मुझ गंवार पागल की,
खुली आँख तो देखा अचरज,
है दुनियां छल बल की,
बचपन से अब तक खुशियों को,
द्वार बदलते देखा,
मैने तो रिश्तों का कौमार्य.........
पुरखों की सत शिक्षाओं को,
उर में धारण कर के,
पल पल देखा खुद को खुद में,
अह्लादित हो मरते
पीछे आते राही को हाँ,
राह बदलते देखा,
मैने तो रिश्तों का कौमार्य.......
कैसी दुनियां कैसे रिश्ते,
मतलब के सब साथी,
जाने कब तक लिये चलूंगा,
संस्कारों की थाथी,
अच्छा हुआ कहूं मै कैसे ,
सधवा का श्रंगार बिखरते देखा,
मैने तो रिश्तों का कौमार्य उतरते देखा।

6 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुन्दर भैया ....................

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    1. छुटकी....बहुत सच्चा और अच्छा लिखती हो तुम भी।

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  2. मैंने तो रिश्तों का कौमार्य उतरते देखा,
    निज अपनो का व्यवहार बदलते देखा,
    jee maine bhi dekha......

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    1. Mridula pradhan ji, कृपया अपना स्नेह यूँ हि बनाये रक्खें।

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  3. आदरणीय सर, आपको पढ़ के प्रेरणा मिलती है।

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