मंगलवार, 3 नवंबर 2015

आधारशिला

आह आह...
आज कुछ अंतस में टूटा है,
खिजा ने फूलों को लूटा है,
थे मौन तो कोई बात ना थी,
आधार तेरा वादा झूठा है,
            आज कुछ अंतस में टूटा है,...
अंगारों को खुशबू दे डाली,
फूलों में अग्नि लहका दी,
शब्द पड़े थे लाशों जैसे,
पन्नो पर ऋतु पावस ला दी,
अब ग्रंन्थो से ग्रन्थी छूटा है,
             आज कुछ अंतस में टूटा है,...
बौने सारे शब्द हो गये,
भाषा के स्वर मौन हो गये,
कुनबा सारा जोड़ लिया था,
अनायास तुम कौन हो गये,
हृदय अश्रु झरना फूटा है,
              आज कुछ अंतस में टूटा है,....

                पूज्य राजीव चतुर्वेदी भैया जी को समर्पित अश्रुपूरित शब्दांजलि......

1 टिप्पणी:

  1. बहुत सुंदर रचना की प्रस्‍तुति। मेरे ब्‍लाग पर आपका स्‍वागत है।

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