बुधवार, 17 अक्तूबर 2012

महंगू की बेटी



कसमसाती परछाई से लटकते चीथड़े,
झपट्टा मारते भेड़िये नोचते लोथड़े,
कभी सिसकी कभी हिचकी कभी चीख,
वो माँगती रही हाँथ जोड़ जोड़ दया की भीख,
ना जाने किसकी किसकी देती रही दुहाई,
शर्म भी शर्माई पर उनको लज्जा नहीं आई,
पहले मोह्मद रसूल फिर राम फूल,
नानक सिंह फिर गॉडस्टीन रिंग,
होश खोती छाया,
उसको कोई बचाने ना आया,
चारों अपने धर्म और पुरुषार्थ का दे कर सबूत,
चल दिये छाया को कर नेस्तनाबूद,
कोहराम था सारे गाँव मे हर गली में,
कमीनों को दया ना आई उस नन्ही सी कली मे,
सरपंच ने पंचायत में किया फरमान जारी,
छोड़ा ना जाएगा कार्यवाही होगी सरकारी,
अचेत बिटिया मंहगू उठाता है,
थाने मे दरोगा जी के पैरों मे लिटाता है,
कहता है भर के आँखों मे नीर,
हुजूर माई बाप मेरी हरो पीर,
दरोगा जी ने प्यार से बिठाया,
संविधान के हर नुक्ते को बखूबी समझाया,
रुपये से इसका उपचार करवाओ,
खुद रहो ठाठ से इसे शिक्षा दिलवाओ,
मँहगू बोला, यदि आपकी बेटी होती,
क्या सलाह तब भी यही होती,
दरोगा का हाँथ गया बेंत पर,
दहाड़ कर बोले-तू काम करने वाला खेत पर,
हमसे जबान लड़ाता है,
व्यर्थ में विवाद बढाता है,
माना नहीं मंहगू दरोगा की बात,
चला बड़े साहब को देने दरख्वास्त,
गाँव से निकली खबर बिजली बन,
छाया शहर पंहुची उजली बन,
पत्रकारों मे होड़ मची हुआ खूब घमासान,
छाया लाश जैसी मंहगू डोम गाँव मसान,
टी.वी. पर चर्चा हुई खूब सुबहोशाम,
अखबार की बिक्री बढ़ी सम्पादकों ने छलकाए जाम,
पत्रकारों को आदेश था आग बढ़नी चाहिये,
देश के बाँकी जिलों मे बिक्री बढ़नी चाहिये,
नेता जी के बाद आया प्रगतिशील महिला मंच,
गीत गाए स्वाभिमानी खूब हुआ प्रपंच,
हो जाता आबाद रोज़ ही सघन चिकित्सा कक्ष,
पूंछताँछ कर कहते मंहगू तुम भी रक्खो पक्ष,
छाया सी छाया पड़ी अधर फटे पपड़ीदार,
बालों सी उलझी ज़िंदगी पीड़ा से बेज़ार,
रह रह कर वो चीखती माँगती दया की भीख,
बस याद थी काली रात वो याद थी वो तारीख

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