सोमवार, 19 अगस्त 2013

केदारनाथ की विभीषिका


गड़ड़ गड़ड़ की ध्वनि सुन कर,
दहल गया सर्वस मेरा,
चीख पुकार मची चँहु दिस,
काँप उठा ज़र्रा ज़र्रा,
पत्थर की बरसात हुई,
घनघोर अंधेरी रात हुई,
जाने कितने घर टूटे,
और जाने कितने,
बह निकले,
ऐसा लगता था जैसे,
पानी से पत्थर पिघले,
प्रलय का था मंजर सारा,
प्रकृति ने था खंजर मारा,
सब चीख चीख कर रोते थे,
अपने अपनो को खोते थे,
ना कोई अपना दिखता था,
बस काल ही किस्मत लिखता था,
भगवान ने भृगुटी की तिरछी,
हर तरफ थी केवल मौत बिछी,
रात सरकती जाती थी,
हर आहट दिल धड़काती थी,
हुई सुबह सब दहल गये,
हो ज़मीदोज सब महल गये,
बस लाशें लाशें लाशें थी,
रुक चुकी सभी की साँसे थीं,
जो जीवन अब भी बाँकी था,
वो लाचारी की झाँकी था,
पर रुके नही थे इंद्र अभी,
जारी जीवन के द्वंद स़भी,
खौफ़ भरा था हर चेहरा,
ईश्वर बन बैठा था बहरा,
शिव बैठे थे शव के ऊपर,
या शव लेटे थे शिव के ऊपर,
तांडव नृत्य हुआ भारी,
तेरी शिव महिमा न्यारी,
नेत्र तीसरा खोल दिया,
पर्वत भी बम शिव बोल दिया,
हाहाकार मचा भारी,
अब त्राहिमाम हे त्रिपुरारी,
त्राहिमाम हैं त्राहिमाम,
मृत्युंजय तुमको है प्रणाम,
बरखा रुकी जगा जीवन,
प्राण बचा भागे सब वन,
आशा ने साथ ना छोड़ा था,
अब भूँख ने नाता जोड़ा था,
पर खाना पानी नही मिला,
ना वहाँ किसी का दिल पिघला,
अब सजी दुकानें लालच की,
पाखंडी लोभी स्वारथ की,
आज कोई ना दानी था,
सौ रुपये में बोतल पानी था,
दूध भी दो  सौ रुपये का था,
हर धंधा अब तो नफ़े का था,
कपटियों का आलम ना पूँछो,
क्या हुआ वहां पर ना पूँछो,
अब बचे रहे तो कह लेंगे,
आगे अब आप भी दहलेंगेे,
जंगल में घना अंधेरा था,
विपदाओं ने घेरा था,
एक माँ थी बेटी साथ लिये,
बैठी थी हाँथ में हाँथ लिये,
दिल धड़क रहा,
मन लरज़ रहा,
अब कलम भी मेरी काँप रही,
होनी विपदा को नाप रही,
दो राक्षस जंगल से  निकले,
मनविकृत बुद्धि से थे छिछले,
हाँथ पकड़ कर बेटी का,
बाल उखाड़ा चोटी का,
वस्त्र भी उसके फ़ाड़ दिये,
माँ चीखी सूखा हाड़ लिये,
कोई तो मदद करो आ कर,
खुद उलझ पड़ी वो चिल्ला कर,
तभी रोशनी एक चमकी,
माता की आँखे दमकी,
रणचंडी सी बनी हुई,
फिर टूट पड़ी वो तनी हुई,
बेटी को माँ ने बचा लिया,
स्वरक्त से मेंहदी रचा लिया,
अब बैठे मिल कर साथ सभी,
बाँकी थी आधी रात अभी,
होंठ सभी के सूखे थे,
सब तीन दिनों से भूखे थे,
आँखों मे रात बिता डाली,
अब चमकी सूरज की लाली,
भेद ना था  कुछ भाषा का,
हुआ सवेरा आशा का,
आ गये बाँकुरे भारत के,
पुतले सब परमारथ के,
वो आ पँहुचे हैं धैर्य धरो,
बस थोड़ा सा तुम सबर करो,
रस्सों का सेतु बना दिया,
खुद को रस्सों पर बिछा दिया,
मानव निर्मित मानव पुल था,
ये भारत का मानव कुल था,
इस पार सभी को ले आये,
जान बचा सब घर आये।

ये रचना अपूर्ण है....इसलिये क्यों कि....जिस पीड़ा को केदारनाथ धाम में फ़ंसे हुये लोगों ने झेला..उसका रंच मात्र भी मैं अपने शब्दों में व्यक्त नही कर पाया हूँ.......
सभी मित्रों से विनम्र निवेदन है कि, प्रस्तुत रचना को कृपया "लाइक" ना करें.......सादर.....सस्नेह....राजेन्द्र अवस्थी।

2 टिप्‍पणियां:

  1. अपूर्णता में पूर्णता का अहसास!! अद्भुत!!

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    1. आदरणीय, बहुत आभार आपका....आपका उत्साहवर्धन निश्चय ही मेरा पथ प्रशस्त करेगा।

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