बुधवार, 11 मार्च 2015

रंगीलो म्हारो कानपुर..

कानपुर का आलम देखो बरस रही है मस्ती,
सभी दिवाने हुए खड़े है चाहे जो हो हस्ती,
रंगरलियों की बात करें क्या हवा हुई रंगीन,
हुल्लड़ धूम तमाशा हो चाहे आग लगी हो बस्ती।

मनु होय त कम्पू घूमि जाओ,
भीड़ भड़क्का रेलम पेला,
मोटर टम्पू खड़खड़ ठेला,
चाट पकउड़ी सेब औ केला,
चम्प चमेली केतकी बेला,
भगवत भूमि का चूमि जाओ,
मनु होय त कम्पू घूमि जाओ,

खुरपी फरुहा काँटा कीला,
लाल गुलाबी नीला पीला,
भंग तरंगं हैं छैल छबीला,
खड़खड़ गढ्ढा अड्डी टीला,
ठग्गू के लड्डू चिउरा चीला,
अब होरी के रंग मा झूमि जाओ,
मनु होय त कम्पू घूमि जाओ,

आला माला कान कै बाला,
स्थित प्रयागनरायन शिवाला,
हटिया कै खटिया बक्सा ताला,
नये गंज के मोटे लाला,
अखबारन मा अमर उजाला,
देखि बुनाई हैण्डलूमि जाओ,
मनु होय त कम्पू घूमि जाओ।

रचनाकार-राजेन्द्र अवस्थी....

सोमवार, 16 फ़रवरी 2015

मान्यता...


घुमक्कड़ी प्रवृत्ति कहाँ ले जाए कुछ पता नही होता.....बड़ा नाम सुना था चूड़ेश्वर महादेव जी का गंजमुरादाबाद से दाहिनी ओर मुड़ कर करीब 4 किलोमीटर पैदल चल कर मैं पहुँचा फूलगढ़ गाँव (फुलई) इसी गाँव में स्थित हैं भगवान चूड़ेश्वर महादेव जी का भव्य मंदिर....ये परकोटा शैली में हैं और लगभग 1850 ईस्वी में निर्मित किया गया है...चूँ कि ये स्वर्गीय पण्डित हुलास रॉय तिवारी और उनके अनुज स्वर्गीय लक्ष्मन प्रसाद तिवारी जी सानिध्य में बनवाया गया था अत: आज भी उन्ही परिवार के लोगों द्वारा मंदिर की देखभाल और रखरखाव किया जाता है..
मंदिर से इस परिवार की कुछ कृषि योग्य भूमि जोड़ दी गई है....
लगभग दो फुट चौड़ी एक दीवार से मंदिर चारो ओर से घिरा हुआ है. चारो कोनो पर एक एक अष्टभुजाकार चबूतरा बना है..मंदिर में पुजारी जी के निवास की अति उत्तम व्यवस्था है.... मंदिर के अंदर विशालाकार में भगवान शिव जी प्रतीक लिंग रूप में विराजमान हैं..भगवान के सम्मुख ही नंन्दी जी विनम्र स्वरूप में अवस्थित हैं.....मंदिर के साथ ही एक तालाब का भी निर्माण कराया गया था जिसे अब गाँव







 के लोगों नें पाटना शुरू कर दिया है.....मंदिर की जमीन और आस पास की जमीन पर भी कुछ दबंग लोगों नें कब्जा करना प्रारम्भ कर दिया जिससे मंदिर का मूल स्वरूप भी प्रभावित हो रहा है.......

गुरुवार, 12 फ़रवरी 2015

ओ री होरी..



होरी है सिर पर ठाढ़ी,
मैं का करौं गुइयाँ,

पेड़न से जबसे महुआ चुवत है,
पुरवा हवा मोरी देही छुवत है,
जियरा मा धुक धुकी बाढ़ी, 
मैं का करौं गुइयाँ,
होरी है सिर पर ठाढ़ी, मैं का करौं गुइयाँ,

सपनेहु साजन लोरी सुनावैं,
बातन हमका दुनिया देखावैं,
गाले मा जब चुभी दाढ़ी,
मै का करौं गुइयाँ,
होरी है सिर पर ठाढ़ी, मैं का करौं गुइयाँ,

पाँव धरनि पर ना धरै देवैं,
पल पल हमका गोदी लेवैं,
लाज बहुत है गाढ़ी,
मै का करौं गुइयाँ,
होरी है सिर पर ठाढ़ी,मैं का करौं गुइयाँ।

गुरुवार, 29 जनवरी 2015

प्रियतमा..

बढ़ जाता स्पंदन हिय का पास तुम्हारे आने से,
थमती धड़कन रुकती सांसे दूर तुम्हारे जाने से,

दीवानापन तो ऐसा के दिन में ख्वाब तुम्हारे है,
राते आँखों में कटती हैं यादों से हम हारे हैं,

कल्पित से लगते हैं पल जो साथ गुज़ारे हैं,
साथ नहीं हैं फिर भी लगता हम तो संग तुम्हारे हैं,

रोम रोम रोमान्चित होता आज भी जब हम मिलते है,
यादों की गनतरिया हम तुम दोनो मिल कर सिलते हैं,

बिलकुल तुम ना बदली हो आज भी हो वैसी की वैसी,
फागुन, सावन, चाट बताशे, औ चूड़ी कंगन के जैसी,

व्यक्त् करूँ मै नेह को कैसे अर्पित जीवन सारा है,
सुख दुख हँसना रोना सोना सब कुछ तुम पे वारा है....


.प्रियतमा....

बुधवार, 28 जनवरी 2015

कानपुर की प्राचीन विरासत..

यूँ तो काम से फुर्सत मिलती नहीं और यदि मिलती भी है तो अब फुर्सत से रहने की चाह नहीं रह गई..छ्याशठवें गणतंत्र दिवस का अवकाश मेरे लिये घूमने का सुअवसर ले कर आया..
सवेरे से इंद्रदेव का सुंदर प्रस्तुतीकरण लगातार जारी था ...यात्रा के लिये हमने अपने बैग में बरसाती,टार्च,टूटने वाला छाता,एक गिलास और प्लेट साथ ही बिस्किट और नमकीन रख ली थी...
दस बजे से हम तैयार हो कर बैठे और पानी बंद होने का इंतजार कर रहे थे....भगवान की कृपा से ग्यारह बजे पानी बरसना बंद हुआ तो श्रीमती जी ने एहतियातन समझाया कि, हो सके तो आज का प्रोग्राम कैंसिल कर दिया जाय क्योंकि सड़कों पर फिसलन होगी और हम जहाँ जा रहे थे वहाँ पता नहीं सड़के कैसी हों....लेकिन हम ना माने और बेटे से बाइक निकालने को कहा..खैर किसी तरह महामृत्युंजय मंत्र का जाप करते हुए यात्रा प्रारम्भ की.... ईधन टैंक फुल करा लिया और गूगल मैप के सहारे भीतरगाँव में स्थित गुप्तकालीन मंदिर की ओर चल पड़े. पानी बरसने के कारण जगह जगह गढ्ढों में जलभराव और सड़क पर कीचड़ का अनुपम सुयोग बाइक के साथ ही मेरे कपड़ों पर भी विचित्र चित्रकारी कर रहा था फिर भी ना जाने क्यों आज ये बुरा नहीं लग रहा था. गणतंत्र दिवस होने के कारण सड़कों पर अधिक भीड़ भी नहीं थी रमइपुर से मेरी मंजिल के लिये रास्ता बाँई ओर को घूम रहा था लेकिन अति आत्मविश्वास से लबरेज सोंचा कि हम सही रास्ते पर हैं और पत्नी जी की सलाह भी ठुकरा दी कि मैप में एक बार देख लो...इसका नतीजा ये हुआ कि हम रमईपुर से आगे बढ़ते चले गये और जब बिधनू पहुँचे तब पता चला कि हम पाँच किलोमीटर व्यर्थ में आगे आ गये हैं....कभी कभी आगे होना भी तकलीफ देता है...  अभी तक दो जगह गूगलमैप देखना पड़ा था...बिधनू में एक होटल पर हल्का जलपान किया और वापस रमईपुर की ओर चल दिये....चार किलोमीटर चलने के बाद भीतरगाँव का रुख किया और मुख्य सड़क से करीब आठ किलोमीटर अंदर चलने के बाद भीतरगाँव के बाजार से होते हुए जैसे ही पहला मोड़ दाहिनी तरफ घूमे तो हम अवाक रह गये...




सातवी आठवीं शती का ये मंदिर वर्गाकार स्थान पर बना हुआ है। वर्ग के कोने, एक छोड़कर एक, इस प्रकार से बने हैं,  और मध्य में 15 वर्ग फुट का एक गर्भगृह तथा उसके साथ एक 7 वर्ग फुट का मण्डप है। दोनों के बीच एक मार्ग है। गर्भगृह के ऊपर एक वेश्म है जिसका क्षेत्र नीचे के कक्ष से लगभग आधा है। 1850 ई. में ऊपरी भाग की छत बिजली गिरने से नष्ट हो गई थी। स्थूल दीवारों के बाह्य भाग पर आयताकार घेरों में सुन्दर मूर्तिकारी अंकन है। ये मूर्तियाँ पकी हुई मिट्टी की बनी हैं। मन्दिर में अनेक सुन्दर अलंकरणों का प्रदर्शन किया गया है। 



किंतु इसके रखरखाव पर कोई विशेष ध्यान ना दिये जाने से आबादी के बीच मंदिर कहीं खो सा गया है...कभी कभी लोग पिकनिक मनाने के उद्येश्य से इसके पार्क में चले आते हैं.. ये तो गुप्तकालीन इष्टिका मंदिर का प्रसंग था..इस मंदिर का संरक्षक नियुक्त किये गये श्री साही जी से मालूम हुआ ग्राम बुजुर्ग बेहटा में स्थित भगवान जगन्नाथ जी के प्राचीन मंदिर के बारे में अब तो ह्रदय में जिज्ञासा हिलोरे लेने लगी और मन भगवान के दर्शनों के लिये व्याकुल हो उठा...लगभग एक घण्टे का सफर कर के हम भगवान जगन्नाथ जी के दरबार में थे..



किंतु.. मंदिर की दशा देख कर बेहद अफसोस हुआ...पुरातत्व विभाग द्वारा संरक्षित ये प्राचीन मंदिर अपनी खंडित हो चुकी उत्कृष्ट मूर्तियो और टूटे हुए अलंकृत स्तम्भों के साथ अपनी विशिष्ट बनावट को समेटे गवाही देता सा जान पड़ता है कि कम से कम ये एक हजार वर्ष पुराना तो अवश्य ही होगा....दुख: इस बात का भी है कि संरक्षित स्मारक घोषित होने के बावजूद भी पुरातत्व विभाग की ओर से मंदिर के सम्बंध में कोई जानकारी उपलब्ध नहीं कराई गई है......हाँ पुरातत्व विभाग ने इस मंदिर के चबूतरे की मरम्मत करवाने के साथ ही प्रकाश के लिये एक सौर सिस्टम की व्यवस्था अवश्य कर दी है लेकिन ये प्रकाश व्यवस्था दिन में भी मंदिर के अंदर व्याप्त अंधकार को दूर करने के लिये नहीं है..मरम्मत के बाद मंदिर का मुख्य द्वार आदमकद जरूर हो गया है लेकिन जो प्राचीन मुख्यद्वार है वो लगभग तीन फुट ऊँचा और दो फुट चौड़ा है जिससे पूरी तरह झुक कर जाने पर ही भगवान के दर्शन किये जा सकते हैं..मंदिर के अंदर भगवान जगन्नाथ जी की विशाल प्राचीन मूर्ति स्थापित है और जिस पत्थर पर भगवान की मूर्ति है उसी पत्थर पर दाँये बाँये खंडित मूर्तियाँ भी उकेरी हुई हैं... मंदिर के गर्भगृह में दिन में भी अंधेरा छाया रहता है और इसी गर्भगृह में ही ऊपर एक चमत्कारी पत्थर स्थित है जिसे यहां के लोग मानसून पत्थर कहते हैं ..रहस्य को समेटे ये पत्थर मानसून आने की सूचना पंद्रह दिन पूर्व ही दे देता है, मानसून आने से पंद्रह दिन पूर्व ही इस पत्थर से बूँद बूँद पानी टपकने लगता है वाकई ये एक अनसुलझा रहस्य है...मंदिर के गर्भगृह के दोनों ओर बनी छोटी छोटी कोठरियों में भगवान विष्णु की प्रतिमा है, इन्हीं में से एक में पुरावशेषों के ढेर हैं....गाँव में कुछ महिलाएं ही दिखी उनसे बात की तो उन्होने बताया कि इस मंदिर के आस पास खुदाई की जाय तो और भी प्राचीन वस्तुएं प्राप्त हो सकती हैं...
बड़े अफसोस की बात है कि कानपुर में प्रति वर्ष भगवान जगन्नाथ जी मण्डल के द्वारा रथयात्रा का आयोजन किया जाता है...कितना बेहतर हो कि इस प्राचीन मंदिर के देखभाल की जिम्मेदारी जगन्नाथ जी मण्डल सम्हाल ले... 

शुक्रवार, 21 नवंबर 2014

हँसी

मेरे बच्चे हर बात में हँसी खोज लेते हैं,
जैसे फूल काँटों में भी खुशी खोज लेते हैं,

भूल जाते हैं हर बात जो चुभती हो कहीं,
ऐसी हर बात में नाखुशी खोज लेते हैं,
मेरे बच्चे हर बात में हँसी.................

सितम भी सह ले जो हँस कर जमाने के,
ऐसी कोई मासूम दिलकशी खोज लेते हैं,
मेरे बच्चे हर बात में हँसी...................

मेरे घर में सहमे नही रहते बच्चे हमसे,
वो मुझमें ही कोई हमनशीं खोज लेते हैं,
मेरे बच्चे हर बात में हँसी....................

बड़े प्यारे हैं बच्चे मेरे जरा सादा से हैं,
हर रंग में खुशबू - ए-गुलाब सी खोज लेते है,
मेरे बच्चे हर बात में हँसी.....................

मंगलवार, 18 नवंबर 2014

फेरा..

छोड़ दो फेरा ग्रहों का तुम शनि के घर में हो,
शांति की हो बात कैसे आत्मा जब डर में हो,
खोजते हो रास्ते पर खो चुकी उम्मीद को,
चमक से लुट जाओगे चोरों के शहर में हो,
पालते हो स्वप्न क्यों स्वाभिमानी चैन के,
आँसुओं से है जो गीला तुम उसी बिस्तर में हो,
पेट भर खाना जुगाड़ो बेशरम बन कर रहो,
फिर तराजू ले के बैठो तुम उसी स्तर में हो,
पीठ पर थपकी यहाँ पर मुफ्त में मिल जायेगी,
मिलती हैं मीठी बोलियां फ्री तुम उसी के दर में हो,
पत्नी तो पल पल प्रश्न करती ही रहेगी शान से,
शुक्र है घर पर नहीं तुम आज भी दफ्तर में हो।

भाई-भाई

भाई-भाई..

तुमने खूब सवाल किये हैं,
हमने अपने होंठ सिंये हैं,
कातर आँखें पलक झपकती,
साथ ये कैसा अलग जिये हैं,

हरदम करते हो मनमानी,
फिर कहते हो गई नादानी,
तर्क कुतर्कों से करते हो,
हर हरकत की खैरमख्वानी,

जी भर जाये जब जिद्दों से,
ना रहना फिर शरमिंदो से,
कर लेना तुम सोंच को व्यापक,
दुनियाँ भरी हुई गिद्धों से,

तुमने खूब सवाल किये हैं,
हमने अपने होंठ सियें हैं,
इसी तरह बचपन से अबतक,
हम तुम दोनो साथ जिये हैं।

गीत- करवाचौथ-हुदहुद..

चाँद निकल आया जो छत पर चढ कर आई तुम,
लाज के मारे तारे छुप गये हो गये सब गुमसुम,
सुर्ख सुहानी चूनर तेरी यूँ लहराती है,
जैसे कोई गुड़िया अपने घर को जाती है,
नेह का अम्बर ओढ़े सिर पर जो मुस्काईं तुम,
लाज के मारे तारे छुप गये हो गये सब गुमसुम,
सजना तेरा सजनी साजन को बहलाता है,
बिंदिया काजल टीका गीत मिलन के गाता है,
तेरे पैरों में पायल गोरी यूँ इतराती है,
निर्मल कोई धार नदी की कल कल गाती है,
प्रेम सुधा का प्याला भर छलकाती आईं तुम,
लाज के मारे तारे छुप गये हो गये सब गुमसुम,
चाँद निकल आया जो छत पर चढ कर आई तुम,










बैरी हुदहुद का कम्पू में जब से हुआ है आना,
दिल बेइमान हुआ है मेरा मौसम हुआ सुहाना।

वसंत..

वसंत तुम क्यों आ जाते हो,
गीत निर्मल नेह का,
तुम क्यों सुनाते हो,
वसंत तुम क्यों......

अवरुद्ध होता ह्रदय कम्पन,
सुरभि सुरभित नेह ये मन,
प्रकृति का मेला धरा पर,
उत्फुल लगाते हो,
वसंत तुम क्यों आ जाते हो...

नव चेतना भरते धरा में,
व्यापते जर औ जरा में,
नापते हो दृष्टि के सुख,
विरहन को तपाते हो,
वसंत तुम क्यों आ जाते हो......

प्रकृति के रंगीन झरने,
मन मनोहर विपुल सपने,
भ्रमर कलियों के ह्रदय,
तुम क्यों रिझाते हो,
वसंत तुम क्योंआ जाते हो......

स्वार्थी

हमने कुछ नहीं किया तुम्हारे लिये,
हम तो अपने हाँथ के छालों को देखते रहे,
सहेजते रहे दर्द का एक एक कण,
जिससे मेरे साथ के लोग खुश रहे हर क्षण,
भावुकता का हास जारी रहा अंतस में,
संवेदनाएं पीछे छूटती रहीं हरदम,
हम खुशियों की चाहत में भागते रहे,
भीड़ में अकेले प्रकाश को छोड़ कर,
एकत्रित भी हुआ था बहुत कुछ सबके लिये,
उस "सब" में शायद मैं कभी फिट ना हो सका,
अभी भी नही हूँ और दौड़ रहा हूँ,
भीड़ में अकेले असहाय,
आज भी मै बता नही सकता,
मैने क्या किया तुम्हारे लिये,
वाकई मर्जी मेरी थी और आज भी है,
सर्वशक्तिमान की प्रेरणा निहित है,
कुछ भी होने में कुछ भी करने में,
समय ने माध्यम चुना मुझे,
चुना सबने समय समय पर,
मुझे स्वहितार्थ सप्रयोजन,
बस मैं बता नहीं सकता कि,
मैने क्या किया किसी के लिये,

जहरीला धुआँ

पीला है पका है ऊपर से टपका हुआ है,
जो चमका एक बार वो चपका हुआ है।

वाह वाह का शोर सुन के न रहना भरम में,
ये हिंदी का साहित्य भी एक अंधा कुंआ है,

दिखती है दूर तक इंसानों की ही भीड़,
मजाल है जो दिल को किसी ने भी छुआ है,

खुद मे ही है बाँकी शराफत का सिलसिला,
सलामत रहे ता-उम्र बस ये ही दुआ है,

बड़ा किया है वक्त ने शोलों में तपा कर,
उठता हुआ जो दिखता है जहरीला धुंआ है

कविताई

प्रगति का गीत सुना हमने,
नैतिकता मचल उठी बौराई,
रोक दिया पथ शब्द तिरोहित,
हुए सभी प्रतिमा घबराई,
पहरेदार हैं हर पहलू के,
स्थितियों संग रहे दिखाई,
दिखें सलोनी गाँव की गलियाँ,
पर दिखती विरहन अमराई,
लिखा किसी ने नहीं मरण को,
वरण क्यों करती है तरुणाई,
कलप रहा है ह्रदय प्रकृति का,
नज़र ना आती है अरुणाई,
आस का श्वांस रोके ना रुके,
सृष्टि का सार है या सरिताई,
कालीदास ना हो पाये हम,
चूल्हे भाड़ गई कविताई,

खोज

सर झुकाये सड़क पर चलते हुए,
तलाश करती रहती नज़रें,
सड़क पर पड़ी बेतरतीब चीज़ें,
सहजने में लगे लोग एक एक पल,
लोगों की नज़रे मुझ पर हैं,
पूँछा किस पल की तलाश है,
मेरा जवाब मुस्कराहट में शामिल था,
मै चलता रहा तलाशते हुए,
लोग भी पीछे चलने लगे,
सभी तलाश रहे हैं शायद,
मैं चिल्लाया..ऐ लोगों तुम क्या तलाश रहे हो!!?
लोगों ने मेरी ओर देखा मुस्कराये,
नज़रें फिर तलाशने लगीं सभी की,
कोई कोई उठा लेता था झुक कर,
अव्यक्त और अनमोल चीज़ों को,
तलाश की पूर्णता का अर्थ जिंदगी नहीं,
पूर्णता तो मौत मे निहित है,
तलाशते रहते हैं हम जिंदगी-ज़िंदगी भर।

शनिवार, 1 नवंबर 2014

कविताई..

प्रगति का गीत सुना हमने,
नैतिकता मचल उठी बौराई,
रोक दिया पथ शब्द तिरोहित,
हुए सभी प्रतिमा घबराई,
पहरेदार हैं हर पहलू के,
स्थितियों संग रहे दिखाई,
दिखें सलोनी गाँव की गलियाँ,
पर दिखती विरहन अमराई,
लिखा किसी ने नहीं मरण को,
वरण क्यों करती है तरुणाई,
कलप रहा है ह्रदय प्रकृति का,
नज़र ना आती है अरुणाई,
आस का श्वांस रोके ना रुके,
सृष्टि का सार है या सरिताई,
कालीदास ना हो पाये हम,
चूल्हे भाड़ गई कविताई,

सोमवार, 22 सितंबर 2014

गरिमा

लेओ अब का कीन जाय..           अब तो मोदियौ कहि दीन्हेन कि, परिवारिक संस्कृति विकसित कीन जाय.
हा हा हा.......वइसे ई बात से कॉग्रेसी बड़े खुस भे होइहैं...कि आखिर आये वई रस्ता पर..लेकिन गज्जब की बात तौ या है कि, मोदी जी का कउनौ परिवार तो है नहीं. फिर !!
फिर उई मौका की बात कई दीन्हेन कि, भारत सोने केर चिरइय्या रहए मगर हम आसमान मा उड़ब छाँडि के जमीन पर आ गेन मुला अब हमरे पास फिर से उड़ै केर मौका है.
तो मौका तो बाद मा दीख जाई पहिले चउका द्याखौ..नहीं तो पारिवारिक संस्कृति विकसित करै के चक्कर मा ना घरु के होइहौ ना घाटु के..
कायदे से दीख जाय तो देस मा पारिवारिक संस्कृति विकसित करै का श्रेय कॉग्रेसै का मिलै क चही..
भाई हम तौ पूरे नम्बर दइ के महाकोढ़पती मान लीन है कॉग्रेस का..
काहे से कि दमाद,लरिका,बिटिया,महतारी,अजिया,बाबा, अउर आगेओ न जानै केत्ते नाती पोता कस्मीर से लइके क्न्याकुमारी तक कॉग्रेसी परिवार की विरासत सम्हारे हैं..
खैर या तौ पुरान बतकही राहए.. नई बात या है कि जंऊ नई बहुरिया हैं वऊ सब उदास होइ गई है..या पारिवारिक संस्कृति वाली खबर सुनिके..काहे से कि मनु मा स्वाचौ कुछु होइ जात है कुछु..अब बुढइ बुढ़वा का को दस दाँय चाह दे..
फिर बुढ़ापे मा चाह,बिस्कुट,दूध,मलाई, हद्द होइगै...अरे यो सब लरिकन खातिर होत है कि बुढ़वन खातिर...हाँ एक बात हमका नीक लागि..उई कहेन " स्त्री गरिमा बनी रहए का चही" लेकिन हिंया तो एत्ते दिमागी परे हैं कि गरिमै की रोटी खा रहे हैं जब तक ई गरिमा पर बहस करिके मामला गरमा न दें तब तक इनका चैनै नाइ आवत..अब द्याखौ भइया हम तौ तिखार दीन तुमहूं तनक तिखारौ..

रविवार, 31 अगस्त 2014

हाय-क्यूँ...!

1-जय गणेश,
छि: उत्तर प्रदेश,
गर्मी अशेष,

2-गर्मी पसीना,
गणेशोत्सव महीना,
मुश्किल जीना।

3-वो चूहा चोर,
कलियुग है घोर,
जोर का शोर।

4-सैलाबी आँसू,
बा बहू और सासू,
कहानी धाँसू।

5-प्रभु छेड़ो ना,
करने दो आराम,
दिल तोड़ो ना।

6-ऊपर देर,
मंदिर में अंधेर,
वक्त का फेर।

7-होली यूँ जली,

लपटे रंगीन थी,

सूनी थी गली।


8-पास पैसे थे,

पिचकारी लेनी थी,

फिर से गिने।

गुरुवार, 28 अगस्त 2014

हे गणपति महराज

भक्त तुम्हारे हम भी हैं हे गणपति हम पर दया करो,
निर्धन हैं पर भक्त तो हैं हे गणपति हम पर दया करो,
विघ्नविनाशक तुम हो हे प्रभु विपति निवारणहार हो,
हम संकट में पड़े हुओं के तुम ही तारणहार हो,
आधी सड़क को प्रभु घेरे हो कैसा ये इंसाफ है,
धनी भगत के लिये प्रभू क्या सारे अवगुण माफ हैं,
मुझको लगता हे गणपति तुम डीजे धुन में मस्त हो,
निर्धन भक्त तुम्हारा चाहे सड़क पे कितना पस्त हो,
पेट तुम्हारा भरा हुआ है मोदक और मिठाई सेे,
हम तो भूखे फंसे जाम में भक्तों की निठुराई सें,
आरति के संग डिस्को भी होता तुम्हरे दरबार में,
चूहा भी है पूँछ पटकता मिल भक्तो के प्यार में,
वारे न्यारे लाखों के पूजा में रोज ही होते हैं,
पर पंण्डाल के बाहर बच्चे भूँखे पेट ही सोते हैं,
हे प्रभु कुछ तो दया करो क्या कलियुग में सब भूल गये,
रंग रंगीली रास रचा मस्ती का  झूला झूल गये,
बने मदारी डगर डगर पर प्रभु मंदिर में अच्छे थे,
सिद्धिविनायक लम्बोदर दरबार तुम्हारे सच्चे थे,
अब तो बैठे हो भगवन तुम चौराहों और नुक्कड़ पे,
पेट में चूहे कूद रहे है दया करो मुझ भुख्खड़ पे,
सुलझा दो ये जाम डगर का करते तुम उपकार हो,
हे जग वंदन पार्वती नंदन तुम ही पालनहार हो,
नाच नचा लो ग्यारह दिन फिर होगा विसर्जन धूम से,
परेशान सब राही होंगे हल्ला गुल्ला बूम से।

बुधवार, 20 अगस्त 2014

हे प्रभु देवा.

अब शुरू हुई पकड़म पकड़ाई..इस पकड़म पकड़ाई को देख मीडिया भी चकराई...
वो कहावत तो सबने सुनी ही होगी. उँगली पकड़ के पहुँचा पकड़ना..बस अब यही पहुँचा पकड़ाई हो रही है सत्ता से बाहर हुए लोगों में. और जितना बचा खुचा सीना है उसी को तान के हो रही है..बुझाया कि नाहीं  ई लाल बुझक्कड़ी में मित्र लोग खूब उलझे हुए हैं..और इसी उलझन में हम सब आलू की बेतहाशा बढ़ती कीमत भी भूल जाते हैं..लेकिन हाय रे बिहार. यहाँ के लोग लालू को ना भूल पायेंगे.
चाहे कितनहो चारा कोई चर जाये. गिन्नीज़ बुक वाले लगता है आराम फरमाने लगे हैं नहीं तो आज चारा के मामले में  बिहार का नाम ई विश्व रिकार्ड बुकवा में जरूर होता. खैर कोई बात नहीं भइया गिन्नीज वालों अब तो चेतो.
चारा ना सही पहुँचा पकड़ाई में ही नाम डाल दो. भारतीय राजनीति के नाम भी रिकार्ड लिख दो. वइसे यहाँ सब एक से एक लिखने वाले हाजिर हैं लेकिन मजाल है जो कोई राजनीति के रिकार्ड पर बात करे या पकड़म पकड़ाई की चर्चा करे.....हे प्रभु देवा, खूब बाँट रहे हो मेवा..

बुधवार, 13 अगस्त 2014

स्मृणिका.

मंज़िल को पास जो देख लिया,
बेकल हो हर पल बीत रहा,
स्मृणिका को नमन करूँ,
पल पल अब मेरा रीत रहा,

चल पड़े सभी थे साथ मेरे,
थल नभ सौरभ वृंद सभी,
स्वांस भी मेरे साथ रही,
औ जीवन के मकरंद सभी,

इक इक क्षण को गिनूँ अगर,
अनगिनत ना बीते होंगे क्षण,
सब उल्लासों का लेखा दूँ,
कम होंगे ना जीवन के वृण,

सारी रीत निभा कर के,
अब बना है जीवन गीत मेरा,
स्वाँस रहे ना साथ भले,
बस साथ रहे वो मीत मेरा,

मंज़िल को पास जो देख लिया,
बेकल हो हर पल बीत रहा,
स्मृणिका को नमन करूँ,
पल पल अब मेरा रीत रहा,