किंतु इसके रखरखाव पर कोई विशेष ध्यान ना दिये जाने से आबादी के बीच मंदिर कहीं खो सा गया है...कभी कभी लोग पिकनिक मनाने के उद्येश्य से इसके पार्क में चले आते हैं.. ये तो गुप्तकालीन इष्टिका मंदिर का प्रसंग था..इस मंदिर का संरक्षक नियुक्त किये गये श्री साही जी से मालूम हुआ ग्राम बुजुर्ग बेहटा में स्थित भगवान जगन्नाथ जी के प्राचीन मंदिर के बारे में अब तो ह्रदय में जिज्ञासा हिलोरे लेने लगी और मन भगवान के दर्शनों के लिये व्याकुल हो उठा...लगभग एक घण्टे का सफर कर के हम भगवान जगन्नाथ जी के दरबार में थे..
भले ना हो पास मेरे शब्दों का खजाना, ना ही गा सकूँ मै प्रसंशा के गीत, सरलता मेरे साथ, स्मृति मेरी अकेली है, मेरी कलम मेरी सच्चाई बस यही मेरी सहेली है..
बुधवार, 28 जनवरी 2015
कानपुर की प्राचीन विरासत..
किंतु इसके रखरखाव पर कोई विशेष ध्यान ना दिये जाने से आबादी के बीच मंदिर कहीं खो सा गया है...कभी कभी लोग पिकनिक मनाने के उद्येश्य से इसके पार्क में चले आते हैं.. ये तो गुप्तकालीन इष्टिका मंदिर का प्रसंग था..इस मंदिर का संरक्षक नियुक्त किये गये श्री साही जी से मालूम हुआ ग्राम बुजुर्ग बेहटा में स्थित भगवान जगन्नाथ जी के प्राचीन मंदिर के बारे में अब तो ह्रदय में जिज्ञासा हिलोरे लेने लगी और मन भगवान के दर्शनों के लिये व्याकुल हो उठा...लगभग एक घण्टे का सफर कर के हम भगवान जगन्नाथ जी के दरबार में थे..
शुक्रवार, 21 नवंबर 2014
हँसी
मेरे बच्चे हर बात में हँसी खोज लेते हैं,
जैसे फूल काँटों में भी खुशी खोज लेते हैं,
भूल जाते हैं हर बात जो चुभती हो कहीं,
ऐसी हर बात में नाखुशी खोज लेते हैं,
मेरे बच्चे हर बात में हँसी.................
सितम भी सह ले जो हँस कर जमाने के,
ऐसी कोई मासूम दिलकशी खोज लेते हैं,
मेरे बच्चे हर बात में हँसी...................
मेरे घर में सहमे नही रहते बच्चे हमसे,
वो मुझमें ही कोई हमनशीं खोज लेते हैं,
मेरे बच्चे हर बात में हँसी....................
बड़े प्यारे हैं बच्चे मेरे जरा सादा से हैं,
हर रंग में खुशबू - ए-गुलाब सी खोज लेते है,
मेरे बच्चे हर बात में हँसी.....................
मंगलवार, 18 नवंबर 2014
फेरा..
छोड़ दो फेरा ग्रहों का तुम शनि के घर में हो,
शांति की हो बात कैसे आत्मा जब डर में हो,
खोजते हो रास्ते पर खो चुकी उम्मीद को,
चमक से लुट जाओगे चोरों के शहर में हो,
पालते हो स्वप्न क्यों स्वाभिमानी चैन के,
आँसुओं से है जो गीला तुम उसी बिस्तर में हो,
पेट भर खाना जुगाड़ो बेशरम बन कर रहो,
फिर तराजू ले के बैठो तुम उसी स्तर में हो,
पीठ पर थपकी यहाँ पर मुफ्त में मिल जायेगी,
मिलती हैं मीठी बोलियां फ्री तुम उसी के दर में हो,
पत्नी तो पल पल प्रश्न करती ही रहेगी शान से,
शुक्र है घर पर नहीं तुम आज भी दफ्तर में हो।
भाई-भाई
भाई-भाई..
तुमने खूब सवाल किये हैं,
हमने अपने होंठ सिंये हैं,
कातर आँखें पलक झपकती,
साथ ये कैसा अलग जिये हैं,
हरदम करते हो मनमानी,
फिर कहते हो गई नादानी,
तर्क कुतर्कों से करते हो,
हर हरकत की खैरमख्वानी,
जी भर जाये जब जिद्दों से,
ना रहना फिर शरमिंदो से,
कर लेना तुम सोंच को व्यापक,
दुनियाँ भरी हुई गिद्धों से,
तुमने खूब सवाल किये हैं,
हमने अपने होंठ सियें हैं,
इसी तरह बचपन से अबतक,
हम तुम दोनो साथ जिये हैं।
गीत- करवाचौथ-हुदहुद..
चाँद निकल आया जो छत पर चढ कर आई तुम,
लाज के मारे तारे छुप गये हो गये सब गुमसुम,
सुर्ख सुहानी चूनर तेरी यूँ लहराती है,
जैसे कोई गुड़िया अपने घर को जाती है,
नेह का अम्बर ओढ़े सिर पर जो मुस्काईं तुम,
लाज के मारे तारे छुप गये हो गये सब गुमसुम,
सजना तेरा सजनी साजन को बहलाता है,
बिंदिया काजल टीका गीत मिलन के गाता है,
तेरे पैरों में पायल गोरी यूँ इतराती है,
निर्मल कोई धार नदी की कल कल गाती है,
प्रेम सुधा का प्याला भर छलकाती आईं तुम,
लाज के मारे तारे छुप गये हो गये सब गुमसुम,
चाँद निकल आया जो छत पर चढ कर आई तुम,
बैरी हुदहुद का कम्पू में जब से हुआ है आना,
दिल बेइमान हुआ है मेरा मौसम हुआ सुहाना।
वसंत..
वसंत तुम क्यों आ जाते हो,
गीत निर्मल नेह का,
तुम क्यों सुनाते हो,
वसंत तुम क्यों......
अवरुद्ध होता ह्रदय कम्पन,
सुरभि सुरभित नेह ये मन,
प्रकृति का मेला धरा पर,
उत्फुल लगाते हो,
वसंत तुम क्यों आ जाते हो...
नव चेतना भरते धरा में,
व्यापते जर औ जरा में,
नापते हो दृष्टि के सुख,
विरहन को तपाते हो,
वसंत तुम क्यों आ जाते हो......
प्रकृति के रंगीन झरने,
मन मनोहर विपुल सपने,
भ्रमर कलियों के ह्रदय,
तुम क्यों रिझाते हो,
वसंत तुम क्योंआ जाते हो......
स्वार्थी
हमने कुछ नहीं किया तुम्हारे लिये,
हम तो अपने हाँथ के छालों को देखते रहे,
सहेजते रहे दर्द का एक एक कण,
जिससे मेरे साथ के लोग खुश रहे हर क्षण,
भावुकता का हास जारी रहा अंतस में,
संवेदनाएं पीछे छूटती रहीं हरदम,
हम खुशियों की चाहत में भागते रहे,
भीड़ में अकेले प्रकाश को छोड़ कर,
एकत्रित भी हुआ था बहुत कुछ सबके लिये,
उस "सब" में शायद मैं कभी फिट ना हो सका,
अभी भी नही हूँ और दौड़ रहा हूँ,
भीड़ में अकेले असहाय,
आज भी मै बता नही सकता,
मैने क्या किया तुम्हारे लिये,
वाकई मर्जी मेरी थी और आज भी है,
सर्वशक्तिमान की प्रेरणा निहित है,
कुछ भी होने में कुछ भी करने में,
समय ने माध्यम चुना मुझे,
चुना सबने समय समय पर,
मुझे स्वहितार्थ सप्रयोजन,
बस मैं बता नहीं सकता कि,
मैने क्या किया किसी के लिये,
जहरीला धुआँ
पीला है पका है ऊपर से टपका हुआ है,
जो चमका एक बार वो चपका हुआ है।
वाह वाह का शोर सुन के न रहना भरम में,
ये हिंदी का साहित्य भी एक अंधा कुंआ है,
दिखती है दूर तक इंसानों की ही भीड़,
मजाल है जो दिल को किसी ने भी छुआ है,
खुद मे ही है बाँकी शराफत का सिलसिला,
सलामत रहे ता-उम्र बस ये ही दुआ है,
बड़ा किया है वक्त ने शोलों में तपा कर,
उठता हुआ जो दिखता है जहरीला धुंआ है
कविताई
प्रगति का गीत सुना हमने,
नैतिकता मचल उठी बौराई,
रोक दिया पथ शब्द तिरोहित,
हुए सभी प्रतिमा घबराई,
पहरेदार हैं हर पहलू के,
स्थितियों संग रहे दिखाई,
दिखें सलोनी गाँव की गलियाँ,
पर दिखती विरहन अमराई,
लिखा किसी ने नहीं मरण को,
वरण क्यों करती है तरुणाई,
कलप रहा है ह्रदय प्रकृति का,
नज़र ना आती है अरुणाई,
आस का श्वांस रोके ना रुके,
सृष्टि का सार है या सरिताई,
कालीदास ना हो पाये हम,
चूल्हे भाड़ गई कविताई,
खोज
सर झुकाये सड़क पर चलते हुए,
तलाश करती रहती नज़रें,
सड़क पर पड़ी बेतरतीब चीज़ें,
सहजने में लगे लोग एक एक पल,
लोगों की नज़रे मुझ पर हैं,
पूँछा किस पल की तलाश है,
मेरा जवाब मुस्कराहट में शामिल था,
मै चलता रहा तलाशते हुए,
लोग भी पीछे चलने लगे,
सभी तलाश रहे हैं शायद,
मैं चिल्लाया..ऐ लोगों तुम क्या तलाश रहे हो!!?
लोगों ने मेरी ओर देखा मुस्कराये,
नज़रें फिर तलाशने लगीं सभी की,
कोई कोई उठा लेता था झुक कर,
अव्यक्त और अनमोल चीज़ों को,
तलाश की पूर्णता का अर्थ जिंदगी नहीं,
पूर्णता तो मौत मे निहित है,
तलाशते रहते हैं हम जिंदगी-ज़िंदगी भर।
शनिवार, 1 नवंबर 2014
कविताई..
प्रगति का गीत सुना हमने,
नैतिकता मचल उठी बौराई,
रोक दिया पथ शब्द तिरोहित,
हुए सभी प्रतिमा घबराई,
पहरेदार हैं हर पहलू के,
स्थितियों संग रहे दिखाई,
दिखें सलोनी गाँव की गलियाँ,
पर दिखती विरहन अमराई,
लिखा किसी ने नहीं मरण को,
वरण क्यों करती है तरुणाई,
कलप रहा है ह्रदय प्रकृति का,
नज़र ना आती है अरुणाई,
आस का श्वांस रोके ना रुके,
सृष्टि का सार है या सरिताई,
कालीदास ना हो पाये हम,
चूल्हे भाड़ गई कविताई,
सोमवार, 22 सितंबर 2014
गरिमा
लेओ अब का कीन जाय.. अब तो मोदियौ कहि दीन्हेन कि, परिवारिक संस्कृति विकसित कीन जाय.
हा हा हा.......वइसे ई बात से कॉग्रेसी बड़े खुस भे होइहैं...कि आखिर आये वई रस्ता पर..लेकिन गज्जब की बात तौ या है कि, मोदी जी का कउनौ परिवार तो है नहीं. फिर !!
फिर उई मौका की बात कई दीन्हेन कि, भारत सोने केर चिरइय्या रहए मगर हम आसमान मा उड़ब छाँडि के जमीन पर आ गेन मुला अब हमरे पास फिर से उड़ै केर मौका है.
तो मौका तो बाद मा दीख जाई पहिले चउका द्याखौ..नहीं तो पारिवारिक संस्कृति विकसित करै के चक्कर मा ना घरु के होइहौ ना घाटु के..
कायदे से दीख जाय तो देस मा पारिवारिक संस्कृति विकसित करै का श्रेय कॉग्रेसै का मिलै क चही..
भाई हम तौ पूरे नम्बर दइ के महाकोढ़पती मान लीन है कॉग्रेस का..
काहे से कि दमाद,लरिका,बिटिया,महतारी,अजिया,बाबा, अउर आगेओ न जानै केत्ते नाती पोता कस्मीर से लइके क्न्याकुमारी तक कॉग्रेसी परिवार की विरासत सम्हारे हैं..
खैर या तौ पुरान बतकही राहए.. नई बात या है कि जंऊ नई बहुरिया हैं वऊ सब उदास होइ गई है..या पारिवारिक संस्कृति वाली खबर सुनिके..काहे से कि मनु मा स्वाचौ कुछु होइ जात है कुछु..अब बुढइ बुढ़वा का को दस दाँय चाह दे..
फिर बुढ़ापे मा चाह,बिस्कुट,दूध,मलाई, हद्द होइगै...अरे यो सब लरिकन खातिर होत है कि बुढ़वन खातिर...हाँ एक बात हमका नीक लागि..उई कहेन " स्त्री गरिमा बनी रहए का चही" लेकिन हिंया तो एत्ते दिमागी परे हैं कि गरिमै की रोटी खा रहे हैं जब तक ई गरिमा पर बहस करिके मामला गरमा न दें तब तक इनका चैनै नाइ आवत..अब द्याखौ भइया हम तौ तिखार दीन तुमहूं तनक तिखारौ..
रविवार, 31 अगस्त 2014
हाय-क्यूँ...!
1-जय गणेश,
छि: उत्तर प्रदेश,
गर्मी अशेष,
2-गर्मी पसीना,
गणेशोत्सव महीना,
मुश्किल जीना।
3-वो चूहा चोर,
कलियुग है घोर,
जोर का शोर।
4-सैलाबी आँसू,
बा बहू और सासू,
कहानी धाँसू।
5-प्रभु छेड़ो ना,
करने दो आराम,
दिल तोड़ो ना।
6-ऊपर देर,
मंदिर में अंधेर,
वक्त का फेर।
7-होली यूँ जली,
लपटे रंगीन थी,
सूनी थी गली।
8-पास पैसे थे,
पिचकारी लेनी थी,
फिर से गिने।
गुरुवार, 28 अगस्त 2014
हे गणपति महराज
भक्त तुम्हारे हम भी हैं हे गणपति हम पर दया करो,
निर्धन हैं पर भक्त तो हैं हे गणपति हम पर दया करो,
विघ्नविनाशक तुम हो हे प्रभु विपति निवारणहार हो,
हम संकट में पड़े हुओं के तुम ही तारणहार हो,
आधी सड़क को प्रभु घेरे हो कैसा ये इंसाफ है,
धनी भगत के लिये प्रभू क्या सारे अवगुण माफ हैं,
मुझको लगता हे गणपति तुम डीजे धुन में मस्त हो,
निर्धन भक्त तुम्हारा चाहे सड़क पे कितना पस्त हो,
पेट तुम्हारा भरा हुआ है मोदक और मिठाई सेे,
हम तो भूखे फंसे जाम में भक्तों की निठुराई सें,
आरति के संग डिस्को भी होता तुम्हरे दरबार में,
चूहा भी है पूँछ पटकता मिल भक्तो के प्यार में,
वारे न्यारे लाखों के पूजा में रोज ही होते हैं,
पर पंण्डाल के बाहर बच्चे भूँखे पेट ही सोते हैं,
हे प्रभु कुछ तो दया करो क्या कलियुग में सब भूल गये,
रंग रंगीली रास रचा मस्ती का झूला झूल गये,
बने मदारी डगर डगर पर प्रभु मंदिर में अच्छे थे,
सिद्धिविनायक लम्बोदर दरबार तुम्हारे सच्चे थे,
अब तो बैठे हो भगवन तुम चौराहों और नुक्कड़ पे,
पेट में चूहे कूद रहे है दया करो मुझ भुख्खड़ पे,
सुलझा दो ये जाम डगर का करते तुम उपकार हो,
हे जग वंदन पार्वती नंदन तुम ही पालनहार हो,
नाच नचा लो ग्यारह दिन फिर होगा विसर्जन धूम से,
परेशान सब राही होंगे हल्ला गुल्ला बूम से।
बुधवार, 20 अगस्त 2014
हे प्रभु देवा.
अब शुरू हुई पकड़म पकड़ाई..इस पकड़म पकड़ाई को देख मीडिया भी चकराई...
वो कहावत तो सबने सुनी ही होगी. उँगली पकड़ के पहुँचा पकड़ना..बस अब यही पहुँचा पकड़ाई हो रही है सत्ता से बाहर हुए लोगों में. और जितना बचा खुचा सीना है उसी को तान के हो रही है..बुझाया कि नाहीं ई लाल बुझक्कड़ी में मित्र लोग खूब उलझे हुए हैं..और इसी उलझन में हम सब आलू की बेतहाशा बढ़ती कीमत भी भूल जाते हैं..लेकिन हाय रे बिहार. यहाँ के लोग लालू को ना भूल पायेंगे.
चाहे कितनहो चारा कोई चर जाये. गिन्नीज़ बुक वाले लगता है आराम फरमाने लगे हैं नहीं तो आज चारा के मामले में बिहार का नाम ई विश्व रिकार्ड बुकवा में जरूर होता. खैर कोई बात नहीं भइया गिन्नीज वालों अब तो चेतो.
चारा ना सही पहुँचा पकड़ाई में ही नाम डाल दो. भारतीय राजनीति के नाम भी रिकार्ड लिख दो. वइसे यहाँ सब एक से एक लिखने वाले हाजिर हैं लेकिन मजाल है जो कोई राजनीति के रिकार्ड पर बात करे या पकड़म पकड़ाई की चर्चा करे.....हे प्रभु देवा, खूब बाँट रहे हो मेवा..
बुधवार, 13 अगस्त 2014
स्मृणिका.
मंज़िल को पास जो देख लिया,
बेकल हो हर पल बीत रहा,
स्मृणिका को नमन करूँ,
पल पल अब मेरा रीत रहा,
चल पड़े सभी थे साथ मेरे,
थल नभ सौरभ वृंद सभी,
स्वांस भी मेरे साथ रही,
औ जीवन के मकरंद सभी,
इक इक क्षण को गिनूँ अगर,
अनगिनत ना बीते होंगे क्षण,
सब उल्लासों का लेखा दूँ,
कम होंगे ना जीवन के वृण,
सारी रीत निभा कर के,
अब बना है जीवन गीत मेरा,
स्वाँस रहे ना साथ भले,
बस साथ रहे वो मीत मेरा,
मंज़िल को पास जो देख लिया,
बेकल हो हर पल बीत रहा,
स्मृणिका को नमन करूँ,
पल पल अब मेरा रीत रहा,
रविवार, 10 अगस्त 2014
हितैषी..
मत आना मुझे देखने,
जब अस्पताल में हो बसेरा मेरा,
मत सोंचना मेरे बारे में तुम,
कोई पीड़ा का पैमाना लेकर,
अपनी छुद्र मानसिकता से,
बाहर रखना मेरे परिवार को भी,
मैं कोई प्रदर्शन की वस्तु नहीं हूँ,
क्या देखोगे?क्यों देखोगे?
क्या देखोगे रुग्णावस्था मेरी?
या असहाय हो चुके मेरे बच्चों के चेहरे?
या फिर भविष्य से डरी हुई मजबूर स्त्री?
पीला मुखमण्डल सूखे होंठ,
तुमको तो ये सब ग्लैमरस लगते हैं,
सहयोग राशि देते हुए उसकी उँगली को छूना,
और अधिक सहायता के लिये पूँछना,
तुम्हारी आँखों की चमक,
तुम्हारी शैतानी मुस्कराहट,
बेहोश होने से पहले मैं देख चुका था,
क्या बहुत जरूरी है इस अमानवीय,
सामाजिक कर्तव्य को पूरा करना?
या कि, मेरी असहाय अवस्था को,
देखना अत्यंत आवश्यक है?
मैं जानता हूँ ये भी कि,
घृणा है तुम्हे इन जगहों से,
सहज नही हो पाते हो तुम,
नाक पर रूमाल बाँध कर वार्ड में तुम्हारा आना,
अपने जूतों में असंख्य हानिकारक,
जीवाणुओं को साथ लेकर,
फिर हितैषी कैसे हो सकते हो मेरे,
मात्र तुम्हारे देखने भर से क्या,
कोई चमत्कार हो जायेगा?
मैं स्वस्थ हो कर तुमसे हाँथ मिलाऊँगा?
मेरी समस्त पीड़ा और संताप हर लोगे तुम,
काश़ ऐसा कर पाते तुम.....
सोमवार, 28 जुलाई 2014
ईद..
हम ईद मुबारक कैसे कह दें,
जब जंग छिड़ी हो अपनों में,
और आग लगी हो सपनों में,
हम ईद मुबारक कैसे कह दें?
जब रोटी चाँद का टुकड़ा हो,
बच्चों का रोता मुखड़ा हो,
हम ईद मुबारक कैसे कह दें?
जब खून लगा हो हाँथों में,
और सूनी माँग हो माथों में,
हम ईद मुबारक कैसे कह दें?
जब कब्र में बिस्तर लगता हो,
और बस्तों में बम मिलता हो,
हम ईद मुबारक कैसे कह दें?
हम ईदी की क्या बात करें,
खुशियों की क्या सौगात भरें,
फिर ईद मुबारक कैसे कह दें?
हो तुम्हे मुबारक नादानी,
और बच्चों की ये कुर्बानी,
हम ईद मुबारक कैसे कह दें????
बुधवार, 23 जुलाई 2014
पुरवा.
महक उठी है शाम सुहानी पुरवा पागल हो बैठी,
मै बिरहन ऐसी बौराई अँसुवन आँचल धो बैठी,
दर्पन मुखड़ा नैन निहारें जब दर्पन मैं देखूँ,
रंग नशीला नैनन देखूँ सुधबुध सारी खो बैठी,
महकी मेरे मन की बगिया कलियाँ फूलन लागीं,
याद हिया में पिया समाई सम्हली फिर मैं रो बैठी,
सोंचूँ तज दूँ नींद नयन की चंदा जिया जरावे,
बाट निहारूँ रात रात भर जागी फिर मैं सो बैठी,
मै मतवारी हुई बावरी याद तेरी जब आवे,
मैं बैठी की बैठी रह गई याद में तेरी जो बैठी,
सखियन को कैसे बतलाऊँ लाज मोहे है आवे,
सोंचा था बेला महकेगा पर काँटे मैं बो बैठी,
महक उठी है शाम सुहानी पुरवा पागल हो बैठी,
सोमवार, 21 जुलाई 2014
दिल की बात-2.
सुप्रभात मित्रों... आज की भोर कुछ विशेष होनी चाहिये.
पिछले कुछ दिनों से देश में महिला अपराधों की बाढ़ सी आ गई है. हर तरफ चर्चा का बाज़ार लगा है किसी को तस्वीरें नागवार गुज़रती है तो कोई चालचलन पर कीचड़ उछाल रहा है. किसी को स्त्री स्वतंत्रता सुहाती तो कोई कपड़ों को लेकर परेशान है..अपराधियों को कोसने के अतिरिक्त तथा इन दुुर्दान्त घटनाओं पर चर्चा करने के सिवा कोई भी कुछ नहीं कर पा रहा है. इन सब बातों के बींच बेचारी अबला स्त्री सदियों से पिस रही है.
निदान क्या है? समाज में महिलाओं का शोषण कब रुकेगा.? हमारे देश में समाज में घरों में वास्तव में देवी का स्थान नहीं इंसान से बराबरी का दर्जा महिलाओं को कब प्राप्त होगा? साक्षरता,परिस्थितियों से जूझने का माद्दा, सहनशीलता,सरलता,सहजता,सुचिता आदि सारे गुण होने के बाद भी स्त्री दशा में जो सुधार दिखने चाहिये थे वो कहीं नहीं दिखते. वास्तव में आज भी हम सभी पुत्र मोह, वंश वृक्ष को हरियाते हुए देखने की लिप्सा से जरा भी मुक्त नहीं कर पाये हैं.और प्राकृतिक रूप से भी स्त्री पुरुष की अपेक्षा दुर्बल है. यही प्राकृतिक दुर्बलता महिलाओं के आत्मविश्वास में कमी उत्पन्न करने का कारण है और शिक्षा के अवसर तथा स्वतंत्रता मिलने के बाद भी नारी दशा में कोई विशेष सुधार दृष्टिगत नही होता. आज हमें गम्भीरता पूर्वक विचार करने की आवश्यकता है कि अपने देश में समाज में तथा घर में हम नारी के सम्मान को किस प्रकार बचाये रख सकते हैं मैं बढ़ाने की बात नहीं कर रहा बस जितना है उसी को बचाना है बनाये रखना है.
इसलिये आज और अभी हम सभी को विशेषरूप से महिला मित्रों से मेेरा निवेदन है कि भावी माताओं को हम आत्मविश्वास से परिपूर्ण करने के लिये उचित कदम उठायें इसके लिये हमारा पहला प्रयास बेटियों की शारीरिक दुर्बलता को हटा कर उनमें साहस एवं शक्ति का संचार करना होगा और इस उत्तम कार्य के लिये स्कूल से अच्छा माध्यम कोई नहीं हो सकता...स्कूल स्तर पर ही बच्चियों को जूडो,कराटे का प्रशिक्षण दिलाने की व्यवस्था हमें करनी होगी.
जिस प्रकार स्कूलों में स्काउट और गाइड तथा एन.सी.सी. के प्रशिक्षण की व्यवस्था होती है उसी प्रकार जूडो कराटे के प्रशिक्षण की व्यवस्था भी लड़कियों के लिये प्रत्येक स्कूल में अनिवार्य रूप से होनी चाहिये...तो सम्भव है हम किसी हद तक महिला अपराधों में हो रही वृद्धि को रोकनेे में सफल हो पायें।






