रविवार, 22 मई 2011

आम आदमी

आम आदमी की जिंदगी, राह की धूल मिट्टी गंदगी,
दुनियाँ की दुत्कार, रहीसों की बंदगी.......




सामान्य इंसान,
जीवन भर नहीं बना पता अपनी पहचान,     
रोटी,कपडा समाज की रीत,
ढूंढते उम्र सारी जाती है बीत,
सारे बाल स्याह से हो जाते है सफ़ेद,
फिर भी नहीं भर पाते जरूरतों के छेद,
कुछ न कुछ रह जाता है बांकी,
मरते दम तक फिकर रहती है माँ की,
ग्रीष्म की लपट शिशिर की सिहरन,
गृह में निपट अकेली विरहन,
रस्ता देखते हैं सब बच्चे,
boston common man sleeping grass by photographynataliaलटे से कपडे फटे से कच्छे,
आँखों में है अजब उदासी,
कर दे कोई दया जरा सी,
मेहनतकश की खाली मेहनत,
सूखी रोटी लगती नेमत,
सुबह अकेली शाम है भारी,
सफर जिंदगी का है जारी,
गाली सुनते कभी ना थकता,
फटे चीथड़ों से तन ढँकता,
जब मई जून का जले महीना,
20,000  + views. Well, I'm thrilled. Thanks to my Flickr Friends ! by H G Mपानी जैसे बहे पसीना,
बासी रोटी नमक और प्याज,
मिल कर पेट भरो सब आज,
सर्दी जब आती है भाई,
सिलनी पड़ती फटी रजाई,
गंतरिया भी गीली लगती,
भावनाएँ सब सीली लगती,
चारपाई है टूटी फूटी,
बान बिनाई झूठी झूठी,
कड़ी ठण्ड भी सहते रहते,
मजबूरी सब किससे कहते,
कभी कभी तो ऐसा होता,
बिना दूध के बच्चा सोता,
ईश्वर से भी नहीं बंदगी,
जानवर जैसी हुई जिंदगी,
नाम के बस हम है इंसान,
जाने कहाँ छुपे भगवान्, जाने कहाँ छुपे भगवान्  ............


रविवार, 8 मई 2011

माँ तेरे बिन..

Mother & Child by Stella Bluआज "मदर्स डे" है किन्तु मेरी ये समझ में नही आता, कि माँ का कोई एक दिन कैसे हो सकता है? माँ तो हमारे जीवन में हर पल हर क्षण होते हुए भी और ना होते हुए भी अपने ममत्व का सुखद अनुभव कराती रहती है, माँ के अस्तित्व को किसी दिन विशेष में नही बांधा जा सकता...



cpr mother & child by zenमाँ तुम कहाँ हो मैंने तुम्हे कभी नही देखा,

लोग बताते है तुमसे ही पैरों पर चलना सीखा,

मुझे भरोसा है लोगों की बातों पर,

कुछ गुस्सा भी आता है उन सूनी रातों पर,

जब ह्रदय में होती थी छटपटाहट,

रात्रि की नीरवता में छोटी सी आहट,

मौन करता करुण क्रंदन,

अवरुद्ध होता ह्रदय स्पंदन,

माँ तुम ही बताओ तुम्हारे बिन हम कैसे सोएं,

जी करता चीख चीख कर रोएँ,

पर अब तो मै बड़ा हो गया हूँ,

अपने पैरों पर खड़ा हो गया हूँ,

काश तुम होतीं तो कितना अच्छा होता,

तुम होती और मै छोटा बच्चा होता,

तुम्हारी गोद में सर रख कर सोता,

तुम्हारे आंचल में मुंह छुपा कर रोता,

तुम ढूंढती मै छुप जाता,

तुम बुलाती मै रुक जाता,

तुम हँसती तो मै भी हंसता,

तुम रोती तो मै भी रोता,

तुम्हारी डाट फटकार भी लगती अच्छी,

तुम्हारी चितवन सीधी सच्ची,

तुम्हारी याद नही आती,तुम सदा ह्रदय में रहती हो,

निर्मल विचार बन कर मष्तिष्क में बहती हो,

तुम्हारा स्वर गूंजता है कानो में,

डर नही लगता अब वीरानो में,

क्यों की तुम साथ हो मेरे हर पल,


हाँ तुम साथ हो मेरे हो हर पल.... हाँ तुम साथ हो मेरे हर पल....

शनिवार, 7 मई 2011

भूंख....

स्वार्थी, विश्वासघाती, हर पल मिला करते है,आस्तीनों में सांप पला करते है,सीख लो बीन बजाना तुम भी, संपोले हर घर में घुसा करते है...

                                                       कल शाम मेरे पुराने मित्र मेरे घर पधारे,
I sure is Hungree!! by flava4life84उन्हें देखते ही मैंने कहा- अहो भाग्य हमारे,
जो आप जैसे महापुरुष का दर्शन हुआ,
शायद मेरे स्नेहिल शब्दों ने- मित्र के अंतर्मन को छुआ,
बोले- क्या बताऊँ जब से वो मायके गई है,
खाने की समस्या खडी हो गई है,
आज कल मित्रों के यहाँ खा रहे है,
ये बताइये- आज आप क्या बनवा रहे है,
हमने कहा- ईमानदारी की रोटी,
इंसानियत की बोटी,
मजबूरी का पुलाव,
वो बोले- बस करो हमको ये सब मत खिलाओ,
P1080719 by hearts and laserbeamsगर खिलाना ही है,तो रिश्वत की रोटी बनवाइए,
बेईमानी की आग में सिंकवाइये,
मै सब खा जाऊंगा,
खाने के बाद डकार भी नही लाउंगा,
मैंने कहा प्यारे- बड़े उच्च विचार है तुम्हारे,
यही हाल रहा तो एक दिन सारे देश को खा जाओगे,
भूंख के कारन अपनी जान पर खेल जाओगे,
मित्र बोले- ये क्या बक रहे हो,
बिलकुल दुश्मन लग रहे हो,
मैंने कहा- वर्तमान परिवेश में तो दुश्मन ही सच बोलता है,
दोस्त तो मित्रता की आड़ ले कर पीठ में छुरा भोंकता है.....

गुरुवार, 5 मई 2011

टिप्पणी "ना क"रें...

ह्रदय वेधी व्यथा, एक अदद टिप्पणी की कथा, कविताओं,लेखों,और ब्लागरों के संस्मरणों को टिपियाते टिपियाते एक अरसा बीत चला है! किन्तु किसी भी ब्लागर की नज़रें इनायत मेरी किसी भी रचना पर नही हुई कि कोई मुझे भी टिपिया देता,
जैसे अन्ना हजारे ने केन्द्र सरकार को टिपियाया है, कि सरकार टिपिया भी गई और टिपियाने का बुरा भी नही माना,
अब तो मै मानने लगा हूँ, कि टिप्पणी का प्राप्त होना भी सौभाग्य की निशानी है, सौभाग्यशाली मै भले न होऊ,
किन्तु टिप्पणी के संबध में मै "लक्की स्टार हूँ",
इतना टिपिया चुका हूँ लोगों को, कि लगता है जैसे मै पेशेवर टिप्पणीकार हूँ,
एकबार सड़क पर जा रहे एक भले मानुष को टिपिया दिया, उसने भी पलट कर मुझे टिपियाया,
पर उसके टिपियाने में और मेरे टिपियाने में थोडा फर्क था,
मैंने तो इकलौती जबान से टिपियाया था,
उसने अपने सारे शारीरिक अवयवों के साथ मुझे टिपिया दिया, घर आया तो पत्नी और बच्चों ने भी टिपियाया! कि मना करती रहती हूँ हर ऐरे गैरे को मत टिपियाया करो लेकिन मेरी बात तुम मानते कब हो,
पर मै स्वभाव से जिद्दी आदत से मजबूर,
टिप्पणी करने के लिए मशहूर,
पत्नी की बात पर टिप्पणी कर दी,
उन्होंने अटैची उठा के सामने धर दी,
मायके जाने की देने लगी धमकी,
मेरे मष्तिष्क में नई टिप्पणी चमकी,
मेरा लैपटाप दे के जाना,
और बच्चो को ले के जाना,
बोली तुम तो चाहते ही हो सर से बला टले,
फिर से तुम्हारा टिप्पणियों का ट्रक चले,
मैंने कहा भाग्यवान- थोडा सोंच समझ कर टिप्पणी किया करो,
मुझसे ना सही कम से कम भगवान से डरो,
पर मुझे टिपियाने का उनको बहुत दिनों के बाद मिला था मौका,
ट्वेन्टी-ट्वेंटी  की तरह टिपियाने लगी छक्का चौका,
मैंने बोला- राखी जी संभावना,
कुछ तो समझो मेरी भावना,
पत्नी ने कहा- दुनियां में सब प्राणी एक दूसरे को टिपिया रहे है,
आपने टिपियाया तो बाहर से पिट के आ रहे है,
मुझे लगने लगा अब मेरी टिप्पणियां हो रही है स्वारथ,
क्योंकि टिप्पणी की वजह से घर में छिड़ गई थी महाभारत,
मित्रों टिप्पणी के रूप अलबेले है,
लाखों है दुर्योधन द्रोपदी अकेले है,
द्रोपदी ने एतिहासिक टिप्पणी किया था,
भरी सभा में अपमान का घूँट पिया था,
पर हम द्रोपदी नही है,ना ही दुर्योधन या दुष्शासन,
मै टिप्पणी में रखता हूँ निश्चित अनुशासन,
फिर भी क्या मालूम कब टिप्पणी बन जाए नाक रे, कृपया टिप्पणियाँ बचाएं टिप्पणी "ना क"रें...

सोमवार, 2 मई 2011

कल्पना.....


कविता भगवान की आरती है,कविता माँ भारती है,                        

कविता यानि "रसात्मक काव्य" हम सबके जीवन में विभिन्न शैलियों में मौजूद है.
अलग अलग रस युक्त काव्य लेखन भारतवर्ष में पुरातन काल से हो रहा है.. कविता कि महिमा को शब्दों में व्यक्त कर पाना बहुत मुश्किल है
namu rangolee by papssapa

कविता कवी की कल्पना है,
कविता रंगोली की अल्पना है,
कविता उगते सूर्य की चमक है, पायल की छमक है,
कविता हिमालय की ऊंचाई है सागर की गहराई है,
कविता शहनाई है तपती दोपहर में अमराई है,
कविता बचपन है आँखों का गीलापन है,
कविता अमीर है कविता ज़मीर है,
कविता राम है रहीम है,कविता महा है महिम है,
कविता अविरल धार है,कविता सच्चा प्यार है,
Payal by Neha Thakurकविता भाषा है उम्मीद की किरण है आशा है,...
जीवन की परिभाषा है,...
कविता हमारा राष्ट्र है देश है,ग्रामीण परिवेश है,
कविता गौरव है शान है,हमारा अभिमान है,
कविता रसात्मक काव्य है,अज्ञानी का दुर्भाग्य है,
कविता चंचल है चपलता है,कविता शब्दों की प्रबलता है,
कविता रस है रसना है,रोना है हंसना है,
कविता अमृत है विष है वेलेंटाइन का किस है,
कविता की महिमा अपार है,
कवितामय सारा संसार है....

शनिवार, 16 अप्रैल 2011

भ्रष्टाचारी..


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भ्रष्टाचारी की परिभाषा गढता हूँ मै,

भ्रष्टाचारी के बारे में पढता हूँ मै,

भ्रष्ट हो कर ये मच्छर बन गए है मगर,

इनकी लीला है जारी हर गांव शहर,

भरोसा न कोई कब ये क्या सोंच लें,
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अपने माँ बाप का भी कफ़न नोंच लें,

न कोई धर्म इनका न जाती कोई,

मानवता भी इनसे लजाती हुई,

पुतले भ्रष्टता के चाहे लाखों फूंक लो,

इनके चेहरे पे चाहे जितना थूंक लो,

जरा सा भी ये स्वाभिमानी नहीं है,

इनकी आँखों में लज्जा का पानी नहीं,

रिश्वत ही बस इनका ईमान है,

परले दर्जे के साले ये बेईमान है,

Go to fullsize imageसबसे मजबूत इनका जो हथियार है,

वो निकम्मी ये कांग्रेस सरकार है,

इंसानियत नही इनमे पत्थर है ये,

जो बदतर से भी ज्यादा हो बदतर है ये,

बनाते है ये लाशों पर महल,

टूटे पांवों से भी लेते है टहल,

राष्ट्र को भ्रष्टाचारी भ्रष्ट करते रहे,

इनको सह कर सभी साथ देते रहे,

अभी भ्रष्टता का है जारी कहर,

नस नस में इनके भरा है जहर,

पर अन्ना ने इनकी कमर तोड़ दी,
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एकता की लड़ी बाहुनर जोड़ दी,

चल पडी देश में ऐसी आंधी नई,

जैसे पैदा हुआ हो फिर से गांधी कोई,

फिर गुलामी की जंजीरें तोड़ेंगे हम,

पंक्ति इतिहास में नई जोडेंगे हम,

यज्ञ में आज मिलकर करो सब हवन,

मेरा स्वीकार अन्ना करो अब नमन..

मंगलवार, 12 अप्रैल 2011

भावना पत्र...

आदरणीय सर जी, कृपया मेरे अंतर्मन की भावनाओं को समझें और यदि हो सके तो मेरी शंकाओं का निवारण करने की कृपा करें..


जैसे ही समाप्त हुआ सत्र,
लिख डाला मैंने गुरू जी को भावना पत्र,
आदरणीय सर जी महोदय,
हिन्दी साहित्य के शब्द नवोदय,
मेरी आपसे याचना है,
ये जो मार्च महीने की यातना है,
कम से कम मुझे ना मिले,
क्योंकि करने होते है मुझे आपसे बहुत सारे गिले,
पर इस महीने आप रहते हो अत्यधिक व्यस्त,
मै सवालों के चक्रव्यूह में फंस कर हो जाता हूँ त्रस्त,
मै समझता हूँ आपकी मजबूरी,
दिल से ना सही पर हो ही जाती है अपनों से दूरी,
याद दिला रहा हूँ आपको किया हुआ वादा,
हो सकता है आपकी स्मरण शक्ति हो कम या ज्यादा,
आपके अलावा जब मेरे पास नही था अन्य कोई विकल्प,
तब अप्रैल में सहायता करने का आपने लिया था संकल्प,
अब अप्रैल भी आधे से अधिक गया है बीत,
और अधूरा है आज भी हमारा वो गीत,
बड़ी हसरतों के साथ जो हमने आप को भेजा था,
पर ना जाने कहाँ से आ मरा ये तनेजा था,
जिसने आपके द्वारा प्रसिद्धि पा ली,
भले ही दिल और दिमाग दोनों से था खाली,
आप तो व्यस्त हो मै हो रहा हूँ बोर,
मेरा भी मन करता है लिख दूँ तनेजा है चोर,
पर रोक देते है हाँथ मेरे संस्कार,
आप की दी हुई शिक्षा मत करना अहंकार,
तभी तो जीवित है तनेजा जैसे जंतु,
मै फिर से लिखने लग जाता हूँ वही किन्तु परन्तु,
आप तो भोले हो आप का ह्रदय है उदार,
पहली बार देखा किसी ब्लॉगर के इतने गंदे विचार,
क्षमा करें कुछ गंदगी में अटक गया था,
अपने विषय से भटक गया था,
मैंने तो कर लिया है पक्का इरादा,
करना होगा पूरा आपको अपना वादा,
लाईट जा चुकी है अधिक हो गई है रात,
आपके चरण स्पर्श के साथ समाप्त करता हूँ बात,
स्पष्टवादी हूँ विचार है साफ़ साफ़,
गलतियों के लिए कर दीजियेगा माफ,
अशीर्वादाकंशी उज्वल हो मेरा भविष्य,
राजेन्द्र अवस्थी (कांड)आपका सेवक आपका शिष्य,

शुक्रवार, 8 अप्रैल 2011

अन्ना हजारे,हम आपके आप हमारे....

कई ब्लोगर्स ने अपनी पोस्ट के माध्यम से "अन्ना जी" को अपना समर्थन दिया है, अपनी शैली में हमने भी प्रयास किया है ज़रा देखें...
अन्ना हजारे,हम आपके आप हमारे..

सन १९६५ में भारत , पकिस्तान युद्ध के दौरान सेना में ट्रक ड्राइवर की नौकरी करने वाले "अन्ना हजारे" भ्रष्टाचार के विरोध में हिन्दुस्तान के अंदर सागरमाथा जैसा आंदोलन करेंगे, शायद किसी ने भी सोंचा नही होगा, विदेशी दुश्मनों के दांत खट्टे करने वाली सेना में रह कर तो उन्होंने ने देश कि सेवा कि ही थी, लेकिन अब देश के अंदर मौजूद सबसे बड़े दुश्मन यानि भ्रष्ट्राचार को देश से समाप्त करने के लिए संकल्पित हैं,

आइये एक नज़र डालते है अन्ना हजारे के नाम से प्रसिद्ध किसान बाबूराव हजारे के जीवन के अनदेखे पन्नों पर.......

सर्वप्रथम देशसेवा...मेग्सेसे पुरूस्कार से सम्मानित अन्ना जी का जन्म महाराष्ट्र में अहमद नगर जिले के रोलेगन सिद्धी गाँव में १५ जून १९३८ को हुआ था. इनके पिता एक किसान थे. अन्ना हजारे १९६३ में भारतीय सेना का हिस्सा बने. भारत, पाकिस्तान लड़ाई के दौरान वह खेमकरन सेक्टर में तैनात थे. यहाँ पाकिस्तानी लड़ाकू विमानों ने भारतीय सीमा में प्रचंड बमबारी की. इस लड़ाई में अन्ना जी ने अपने साथियो को मातृभूमि पर बलिदान होते देखा. इसके बाद इन्होने कभी विवाह ना करने कि सौगंध खाई. १९६० मे ड्राईवर के पद पर रहते हूए उन्होंने रबीन्द्रनाथ टैगोर, महात्मा गाँधी, विवेकानंद,और आचार्य विनोबा भावे के बारे में रिसर्च की. अन्ना जी आज भी अपने गांव में यादव बाबा मंदिर के पास बने छोटे से कमरे में निवास करते हैं...

फिर समाज सेवा..

१९७५ में सेना से स्वेक्षिक सेवा निवृत्ति लेने के पश्चात वह अपने गाँव रोलेगन सिद्धी लौट आये.गाँव में सूखा, गरीबी, अपराध, और शराबियों का बोलबाला था, उन्होंने इन सब समस्याओं का सामना करते हुए गाँव वासियों को नहर बनाने और तालाबों में वर्षा जल को एकत्र करने के लिए प्रोत्साहित किया, और अन्य कई प्रकार के सामाजिक कार्यक्रम चलाए जिसके कारण रोलेगन सिद्धी गाँव अन्य सभी गांवों के लिए आदर्श गाँव बन गया, इस साहसिक प्रयास के कारण वो पूरे देश में प्रसिद्ध हो गए.

आंदोलन...

उसी समय उनका सामना महाराष्ट्र के वन विभाग के अधिकारियों से हुआ. वह पुणे के पास आलंदी के पास भूंख हड़ताल पर बैठ गए. उनके आंदोलन ने समूचे प्रशाशन को हिला कर रख दिया और प्रशाशन को आरोपियों के खिलाफ कार्रवाई करने के लिए विवश होना पड़ा. उन्होंने १९९१ में "भ्रष्टाचार विरोधी जन आंदोलन" का गठन किया जो आज पूरे देश में फ़ैल गया है. देश में सूचना के अधिकार का विचार अन्ना जी ने १९९७ में दीया. इसी वर्ष अन्ना जी ने सूचना का अधिकार प्राप्त करने के लिए जन जागृति अभियान चलाया. जिसके कारण केन्द्र सरकार को २००५ में "सूचना का अधिकार क़ानून" बनाने के लिए विवश होना पड़ा..


और अब....जन लोक पाल बिल...

जस्टिस संतोष हेगड़े,प्रशांत भूषण,और अरविन्द केजरीवाल द्वारा बनाया गया यह विधेयक लोगों के द्वारा वेबसाइट पर दी गई प्रतिक्रिया और जनता के साथ विचार विमर्श के बाद तैयार किया गया है. इस बिल को शांति भूषण, जे.एम्.लिंगदोह, किरन बेदी, अन्ना हजारे आदि का भारी समर्थन प्राप्त है. इस बिल की प्रति प्रधान मंत्री एवं सभी राज्यों के मुख्यमंत्रियों को १ दिसंबर को ही भेज दी गई थी..


जन लोकपाल बिल की खास बातें..

१. इस क़ानून के अंतर्गत, केन्द्र में लोकपाल और राज्यों में लोकायुक्त का गठन होगा.
२. ये संस्था निर्वाचन आयोग और सुप्रीम कोर्ट की तरह सर्कार से स्वतंत्र होगी.
कोई भी नेता या सरकारी अधिकारी जाँच की प्रक्रिया को प्रभावित नही कर पाएगा.
३. भ्रष्टाचारियों के खिलाफ कई वर्षों तक मुक़दमे लंबित नही रहेंगे. किसी भी मुक़दमे की
जाँच एक वर्ष में पूरी होगी. ट्रायल अगले एक वर्ष में पूरा होगा भ्रष्ट नेता, अधिकारी या
जज को दो वर्ष के अंदर जेल भेजा जाएगा.
४. अपराध सिद्ध होने पर भ्रष्टाचारियों के द्वारा सरकार को हुए घाटे को वसूल किया जाएगा.
५. यदि किसी नागरिक का काम तय समय सीमा के भीतर नही होता, तो लोकपाल
दोषी अधिकारी पर जुर्माना लगाएगा और वह जुर्माना शिकायत कर्ता को मुआवजे के रूप में
मिलेगा.
६. अगर आप का राशन कार्ड, मतदाता पहचान पात्र, पासपोर्ट आदि तय समय सीमा के भीतर
नही बनता है या पुलिस आपकी शिकायत दर्ज नही करती तो आप इसकी शिकायत लोकपाल
से कर सकते है और उसे यह काम एक माह के भीतर कराना होगा. आप किसी भी प्रकार
के भ्रष्टाचार की शिकायत लोकपाल से कर सकते है जैसे सरकारी राशन की कला बाजारी,
सड़क बनाने में गुणवत्ता की अनदेखी, पंचायत निधि का दुरूपयोग. लोकपाल को इसकी जाँच
एक साल के भीतर पूरी करनी होगी. ट्रायल अगले एक वर्ष में पूरा होगा और दोषी को दो वर्ष
के भीतर जेल भेजा जाएगा.
७. क्या सर्कार भ्रष्ट और कमजोर लोगों को लोकपाल का सदस्य नही बनाना चाहेगी?
ये मुमकिन नहीं है क्यों की लोकपाल के सदस्यों का चयन जजों, नागरिकों और संवैधानिक संस्थानों
द्वारा किया जरगा ना की नेताओं के द्वारा. इनकी नियुक्ति पारदर्शी तरीके से और जनता की भागीदारी से
होगी.
८. अगर लोकपाल में काम करने वाले अधिकारी भेष्ट पाए गए तो? लोकपाल/लोकयुक्तों का कामकाज पूरी
तरह पारदर्शी होगा.लोकपाल के किसी भी कर्मचारी के खिलाफ शिकायत आने पर उसकी जाँच
अधिकतम दो माह में पूरी कर उसे बर्खास्त कर दिया जाएगा.
९. मौजूदा भ्रष्टाचार निरोधक संस्थानों का क्या होगा? सीवीसी, विजिलेंस विभाग, सीबीआई के भ्रष्टाचार
निरोधक विभाग का लोकपाल में विलय कर दिया जाएगा. लोकपाल को किसी जज, नेता या अधिकारी
के खिलाफ जाँच करने व मुकदमा चलाने के लिए पूर्ण शक्ती और व्यवस्था भी होगी..

रविवार, 20 मार्च 2011

होली की सीख....



                           होली की सीख                         होली की सीख



लिखने के लिए हों``` पढ़ने के लिए````` या``` बोलने के लिए```` कुछ विषय``` इतने बम ब्लास्ट होते है,
कि रिक्शे वाले````खोमचे वाले````झल्ली वाले से ले कर`````` भारत के प्रधान मंत्री तक``` का ```ध्यान आकर्षित कर ही लेते है|. ऐसा ही एक विषयी त्यौहार है भारतीय होली``````होली के बारे में तो`` बहुत कुछ लिखा`` कहा`` पढ़ा गया है`````````` ना जाने क्या क्या गढा गया है,

फिर भी जो कुछ रह गया है बाँकी,
मै यहाँ  पर उसकी दिखा देता हूँ झाँकी,
उत्तर प्रदेश कि होली,
साथ में देहाती बोली,
थोडा और लुत्फ़ उठाओ,
हमारे शहर में आओ,
यानी कानपूर,
आपकी सब मस्ती हो जाएगी काफूर,
कानपुर सेन्ट्रल जैसे ही आओगे,
बड़े बड़े इंसानी छोत अपने सामने पाओगे,
बदबू से आपकी फटने लगेगी
.
.
.
नाक,
सीना होगा छलनी हसरतें चाक चाक,
पस्त हो चुके होंगे आधे हौसले,
कुली कहेगा बाबूजी थोडा कानपुर घूम लें,
जैसे ही  स्टेशन से बाहर आएँगे,
ऑटो वाले साहब कह के का सामान उठाएंगे,
बाहर जब आप सन्निपात से जागोगे,
ऑटो रिक्शा खुद चला कर भागोगे,
कुछ ही देर में आप को पता चल जाएगा,
कि आप खोटा सिक्का तो चला सकते हो पर ऑटो आप से नहीं चल पाएगा,
गुस्से से ड्राइवर जब भ्रकुटी करेगा तिरछी,
ह्रदय में चुभ जाएगी स्वाभिमान की बरछी,
फिर भी मौन रहते हुए,
अनापेक्षित यातना सहते हुए,
शुरू करोगे यादगार सफर,
ड्राइवर सोंचेगा...आज अच्छा फंसा डफर,
अचानक धीरे से लगेगा आपको जोरदार झटका,
बिगड कर कहोगे अबे कहाँ ला पटका,
ड्राइवर बोलेगा.. चिल्लाइये मत गहरी साँस लीजिये,
कानपुर कि सड़कों के गड्ढों का दर्शन कीजिए,
विभिन्न किस्म के गड्ढे आप यहाँ पाएँगे,
गलती से पहली बार आए हैं,
दोबारा नहीं आएँगे,
अब आप मौन हो जाओगे,
छुप के अपना सर सहलाओगे,
बार बार ऑटो खाएगा हिचकोले,
करोगे अनुभव जैसे धरा डोले,
पर आपके सर तो चढा होगा होली का खुमार,
क्यों की योजना बना कर आये थे बेशुमार,
अब छोटी मुसीबतों से घबराना क्या,
चाहे जितनी हो अनजान डगर लडखडा कर गिर जाना क्या,
सोंच ही रहे थे ये सब क्या है बखेडा,
तभी ऑटो के अंदर आया गोबर का थपेड़ा,
आपकी सूरत देख ड्राइवर बेसाख्ता हंसा,
ऑटो से उतरते ही पैर घुटनों तक कीचड में धंसा,
किराया सुनकर कलेजा मुंह तक आया,
ड्राइवर बोला, शुक्र करो आपसे धक्का नहीं लगवाया,
पीछे गली में गूँज रही थी गाली,
मै,पर्स,दिमाग,जेब हर जगह से हो चुका था खाली,
कानपुर आ कर मुझे अच्छी मिली सीख,
भाग्यशाली हूँ जो स्टेशन पर मांग रहा हूँ भीख,
                                          भाग्यशाली हूँ जो स्टेशन पर मांग रहा हूँ भीख......

शुक्रवार, 18 मार्च 2011

हाय कितना कठिन ये जीवन,

मेरी ये रचना जेल में  बंद एक निरपराध कैदी की भावनाओं को व्यक्त करती है....

 कहना पड़ता है अब मुझको,
                             हाय कितना कठिन ये जीवन,
                                         Caged Inside by lor.rain.e

             जो वीराने का देता परिचय,
                            हर पल जीवन करता जो  क्षय,
            सरल ह्रदय सुन्दर मृदुभाषी,
                            स्म्रति जिसकी नहीं है बासी,
            व्यथित हो रहा है अब कन कन,
                             हाय कितना कठिन ये जीवन,

                   Your secret is your prisoner; once you reveal it, you become its slave by Xploiтєя ™


                              दुनिया की गति वही बनी है,
                                               कल के निर्धन आज धनी हैं,
                              उसका प्रभु तो आज भी बहरा,
                                              समय वहीँ का वहीँ है ठहरा,
                               नहीं है वश में अपना तन मन,
                                             हाय कितना कठिन ये जीवन,

         
                                                 The Key to Your Soul by Ben Heine
             
                                            देखा कभी सुआ पिंजरे में,
                                                           जश्न नहीं होता उजड़े में,
                                             रात अँधेरी दिया न बाती,
                                                          परछाई है कान में गाती,
                                            नहीं है अब वो बाग वो उपवन,
                                                          हाय कितना कठिन ये जीवन,


                          Hope  in the Prison of Poverty by KathyAAdams

                                      योगी  को लज्जा आ जाए,
                                                       जो जीवन इतना कठिन बिताए,
                                      भावुकता अपनी किसे बताए,
                                                       हर पल घर की याद सताए,
                                     मै तो करता स्वयं का तरपन,
                                                       हाय कितना कठिन ये जीवन,

                                                Freedom by GraveBone
                               
                                       वार्तालाप करे प्रति छाया,
                                                    ईश्वर क्यों इंसान बनाया,
                                       मै तो हूँ इक ऐसा तोता,
                                                    बेगुनाह पिंजरे में होता,
                                       खोज रहा सबमे अपनापन,
                                                   हाय कितना कठिन ये जीवन,
                    Empty Cage by h.koppdelaney

                                        याद सभी की आती रहती,
                                                     निर्जनता बस यही है कहती,
                                         तू ही नहीं अपनों से डरा सा,
                                                     सबर करो बस और जरा सा,
                                          रोज ही करता स्वयं को अर्पन,
                                                    हाय कितना कठिन ये जीवन,


                                           Day 113/365: I'll fly away by talulayu

                                खुला आसमां तुझे दिखेगा,
                                          वंश तेरा इतिहास लिखेगा,
                               नहीं हुई तेरी कुछ हानि,
                                           समय करेगा खुद पर ग्लानि,
                               देख रहा हूँ दुःख का दर्पन,
                                           हाय कितना कठिन ये जीवन,


                    Raksha Bandhan Gifts to India by Giftstoindians1    

                                                जल्दी से तुम वापस आओ,
                                                                 विरहा,फाग,भजन,सब गाओ,
                                                 बहना से "राखी" बंधवाओ,
                                                                ना  रखना कोई  इच्छा बांकी,
                                                  इतिश्री हो अब सारा कलपन,
                                                              वाह रे कितना सुखी वो जीवन....
                                                                         वाह रे कितना सुखी वो जीवन...

बुधवार, 16 मार्च 2011

समर्पण..

"कुछ धीर के साथ" "कुछ नीर के साथ" "ह्रदय में गूंजी पीर के साथ" अपनी नादान,मासूम,स्नेहिल अर्धांगिनी को समर्पित करता हूँ ये रचना......


July 7 2009 Extravaganza - Prediction = True by Pilottage
    
 मै वाचाल समंदर सा तुम
               निर्मल धार सी बहती हो,







ह्रदय का संबल तुम ही हो,
               जीवन आलंबन तुम ही हो,
तुम स्नेह की कोमल डोर प्रिये,
                     प्रेम पाश प्रतिबद्ध किये,
साथ मेरे हो कर भी तुम न,
                        जाने क्या क्या सहती हो,   मै वाचाल समंदर सा तुम निर्मल.....


A New Begining.. by Gauri V

सहज मेरी मुस्कान हो तुम,
                 अभिमान भी तुम स्वाभिमान भी तुम,
तुम कंठ कोकिला सुरभित हो,
                      मै दुनिया के आयाम में गुम,

और मेरे कागा स्वर को तुम,
            भँवरे की गुन गुन कहती हो,   मै वाचाल समंदर सा तुम निर्मल.....

The glow within by P a c h y d e r m
 













  न जाने कितने वसंत प्रिये,                      
                            तेरे पतझड़ जैसे गुजरे है,
टूटे स्वप्न कई जब हम,
                          खुद दिए वचन से मुकरे हैं,
पर सुख में दुःख में साथ मेरे,
                          हर हाल में खुश तुम रहतीहो,    मै वाचाल समंदर सा तुम निर्मल.....

 by Krins
जब स्मृति पृष्ठ पलटता हूँ,
                         नेत्र नीर टपकाते है,
टेढ़े मेढे अनगढ़ से,
                          चित्र कई बन जाते है,
तब हूक ह्रदय में होती है,
                            तुम मूक ही सबकुछ  कहती हो,   मै वाचाल समंदर सा तुम निर्मल.....



Birds / Lovers - Megalaima haemacephala by Umang Dutt















 कैसा ये प्रतिदान प्रिये,
                         ये कैसा स्वाभिमान प्रिये,
सारे कष्टों से मुझको,
                       रखती हो अनजान प्रिये,
दुनियां के बिछाए खारों पर,
                       तुम बिना पादुका चलती हो.   मै वाचाल समंदर सा तुम निर्मल.....



                                                                                            रजेन्द्र अवस्थी......
                                                                                                                                                               

रविवार, 13 मार्च 2011

होली का हुडदंग........

होली रंगों का उल्लास का और प्रेम का त्यौहार है.
छोटे "बच्चों" से ले कर "वयोवृद्ध", सभी पूर्ण "उल्लास" के साथ अपने "उत्साह" को प्रदर्शित करते हुए एक दूसरे को रंग और अबीर लगा कर "प्रसन्नता" पूर्वक मनाते हैं,
बहुत सारे लेखकों,कवियों, और विद्वानों ने अपनी, अपनी शैली में शब्दों के द्वारा खूब होली खेली है.
मैंने भी प्रयास किया है...



portrait by subhasish
मैंने साली से खेला जो रंग, तो घर में बीबी से हो गयी जंग,                                                    पिचक्का टूट गया..........................
उनके क्रोध की सीमा टूट गयी, और पत्नी हमसे रूठ गयी,
            मैंने प्यार से पकड़ा जो हाँथ, उन्होंने हुसर के मारी लात,
                                                  पिचक्का टूट गया...........................



Nandgaon Holi Festival, India by Jitendra Singh : Multi Media Trainer












हमने प्रेम में वादे कर लिए, कान भी मैंने पकड़ लिए,
          पर धन्य हो औरत जात, गुजर गई बैठे सारी रात,
            पिचक्का टूट गया..........................


Contours by sunny-drunk
 स्वाभिमान भी अपना मार गए, सब तरह से कह के हार गए,
            जब नहीं बनी कोई बात, दिखाई हमने भी औकात,
                                                   पिचक्का  टूट गया........................


SHRUTI by Sukanto Debnath
                                       
अब पत्नी से हम ऐंठ गए, और घर के बाहर बैठ गए,
            तब बढ़ने लगी तकरार, बिगड़ गया होली का त्यौहार,
                                                  पिचक्का टूट गया.........................

Ras  Lilas in Vrindavana - भक्तिकाल by Ginas Pics
 सामान भी अपना बांध लिया, और बच्चो को तैयार किया,
               जब करने लगी गृह त्याग, तो लागी हमरे ह्रदय में आग,
                                                 पिचक्का टूट गया.........................

SAM SAJAN THOMAS by Sukanto Debnath
मौसम में कुछ गर्मी थी, मेरे नेचर  में अब नरमी थी,
                मै जोड़ के बोला हाँथ, प्रिये न छोडो मेरा साथ,
                                                 पिचक्का टूट गया.......................




Carnaval d'Automne by Christine Lebrasseur
 मुस्कान उन्हें अति मंद हुई, और प्यार से आँखे बंद हुई,
               जब टूटा भ्रम का जाल, तो बजने लगी प्रेम की ताल,
                                                     पिचक्का टूट गया................... 
                                                                         

                                                                      आपका अपना बुलबुल
                                                                       राजेंद्र अवस्थी   (कांड)

मंगलवार, 8 मार्च 2011

गीत.....

किसी से प्यार करना या किसी से प्यार होना दोनों एक ही सिक्के के दो पहलू हैं,
प्यार की समीक्षा नहीं की जा सकती. प्यार का कोई पैमाना नहीं होता, प्यार की कोई तौल नहीं होती, प्यार का कोई मोल नहीं होता, प्यार कम या ज्यादा नहीं होता, प्यार केवल प्यार होता.है.
हर् व्यक्ति के जीवन में प्यार होता ही है,
आज इसी प्यार से प्रेरित हो कर बड़े प्यार से पहली बार एक प्यारा सा गीत लिखने का प्रयास किया है.......

शर्मा कर देखना तेरा,फिर झुका लेना निगाहों का,
अदा तेरी ये कत्लेआम कर देती है आहों का,
तेरी चितवन को कैसे मै नज़र अंदाज़ कर जाऊँ,
चली आओ मेरे दिल में सहारा लेलो बाँहों का,      चली आओ मेरे.........


 प्यार मुझको तो तुमसे है इश्क तुमको भी कम नहीं,
      कब से तेरी आंख गीली है मेरी आंख नम नहीं,
      खता मेरी ही है शायद तुम्हारा दोष कुछ नहीं,
       अब चर्चा आम होता है हमारी ही वफाओं का,     चली आओ मेरे...........


ज़माना याद रक्खेगा हमारी इस कहानी को,
समय बर्बाद कर देगा तुम्हारी सब जवानी को,
बांकी बस निशाँ रह जाएगा इन मस्त हवाओं का,
मेरी रगबत है बस इतनी कोई रहबर हो बागों का.    चली आओ मेरे...........


तुम्हारा अक्स दिखता है मुझे फूलों में कलियों में,
हवाएं सर्द चुभती है बदन में तेरी गलियों में,
झलक दिख जाए बस तेरी यही उम्मीद रखता हूँ,
नज़र भर देख लूँ तुमको नज़ारा हो नजारों का...       चली आओ मेरे..........



    

पत्नी भक्ति...

ये बार बार आज  आज लिखते लिखते बोर हो गया हूँ किन्तु क्या करूँ लिखना तो यही पड़ेगा कि आज फिर कुछ लिखने का मन किया तो लिखने बैठ गया, मन को मारना भी उचित नहीं जान पड़ता, उचित अनुचित क्या मन को मारा ही नहीं जा सकता अगर मारा जा चुका होता तो आदरणीय धर्मराज युधिष्ठिर यक्ष से न कहते कि मन ही सबसे ज्यादा गतिवान होता है,
शायद मै राह भटक गया, क्यों कि शीर्षक "पत्नी भक्ति" लिखने के बाद मन को ले कर बैठ गया,
कोई बात नहीं देर आए दुरुस्त आए......वास्तव में पत्नी की शक्ति, धैर्य और उनकी क्षमताओं को नकार पाना किसी के बस में नहीं है..मेरे भी नहीं..क्यों कि एक देवी साक्षात् मेरे घर के मंदिर में प्रतिष्ठित है,और मै पूरे मनोयोग एवं तन,मन,धन से देवी की उपासना करने में तल्लीन रहता हूँ,
प्रतिपल मेरी भक्ति में कोई भूल न रह जाए इस डर से भयभीत रहता हूँ,..ये रचना मै दुनियां की सभी पत्नियों को समर्पित करता हूँ...


आज कल हम लोग पत्नी युग में जी रहे है,
उन्ही का दिया हुआ खा पी रहे है,
इस युग में पत्नी भक्ति बहुत जरुरी है,
बिना भार्या भक्ति के जिंदगी अधूरी है,
यूँ तो मेरे जैसे श्रद्धालु बहुत मिल जायेंगे,
आप एक्सरे निगाहों से देखेंगे तो कई पत्नी भक्त पाएंगे,
कवि होने के साथ सरकारी कर्मचारी हूँ,
पहले माता पिता का था अब पत्नी का आज्ञाकारी हूँ,
 हमारी पत्नी का स्वभाव बड़ा नरम है,
उनके समक्ष मौन रहना मेरा मुख्य धरम है,
प्रातः काल बेड टी देना मेरी नित्य क्रिया का हिस्सा है,
आगे का हांल सुनिए एक रोज का किस्सा है,
दफ्तर से शाम को घर आया तो पत्नी को नदारद पाया,
किसी बात पर नाराज हो मायके चली गयी थी,
अपने तीन प्रतिनिधि मेरे पास छोड़ गयी थी,
बेटे से पूछा,चंदू मम्मी क्या अभी से सो गयीं
चंदू बोला वो तो नानी के यहाँ गयीं,
फिर तो मै अपने आप को कोसने लगा,
क्या गलती हो गयी इस विषय में सोचने लगा,
दाल में नमक तो बिलकुल सही था,
कही छोला ज्यादा कड़वा तो नहीं था,
मैंने चाय भी नहीं पी थी पर उनको जरुर दी थी,
ना जाने क्या बात हो गयी,
जो अपनी एक क्षत्रछाया से मुझे वंचित कर गयीं,
इसी उलझन में फंसा हुआ,गले तक पत्नी प्रेम में धंसा हुआ,
पहुच गया ससुराल,ससुर ने देखते ही पूछा हालचाल,
मैंने कहा बाकी तो सब ठीक है,
परेशानी केवल एक है,
आपकी बेटी का मूड पाकिस्तानी प्रधानमन्त्री की तरह उखड़ा हुआ है,
जबकि हाल ही में हमारे बीच जिनेवा समझौता हुआ है,
कि हम दोनों के बीच अब प्रेम की गंगा बहेगी,
मुझसे कोई गलती हो तो अपने मुख से वो जरूर कहेगी,
पर मुझे चेतक समझ उन्होंने अपनी पुतली फिराई,
किसी नेता कि तरह वादा खिलाफी दिखाई,
आदरणीय पिता जी कृपया आप ही बताएं,
कि कर्ज रुपी बोझ से लदी गृहस्थी की गाड़ी,
हम एक पहिये पर कैसे चलाये,
ससुर को मेरे ऊपर रहम आया,
सास को "माँ जी" कह कर बुलाया 
माँ ने मुझे देखते ही नाक भौं सिकोड़ी,
सरौते के बीच दबी हुई सुपारी झटके से तोड़ी,
इत्मीनान से बैठ कर हमसे कहा,अब क्या लेने आए हो यहाँ,
विदा के समय ६ हट्टे कट्टे आदमी लगे थे कार के अंदर बिठाने में,
२ चादर १ दरी भीग गई थी चुप कराने में,
२ मन की लड़की १ मन की रह गई,
तुम्हारे जुल्म इतने दिन न जाने कैसे सह गई,
मेरी जबान तालू से रही चिपकी,
माता जी तानो की देती रही थपकी,
मैंने कहा माता जी, मै आपकी बेटी पर दिलो जान से मरता हूँ,
पत्नी के सिवा दुनियां में किसी से नहीं डरता हूँ,
काश पूरी दुनियां के पति मेरे जैसे हो जाएँ,
तो साम्प्रदायिकता से छुटकारा मिल जाए,
क्यों कि तब हर् पति पूजा घर में पत्नी का चित्र लगाएगा,
देश से जाति,रंग,मजहब का भेद भाव जड़ से खत्म हो जाएगा,
मेरे ह्रदय में पत्नी के लिए अंध भक्ति है,
हमारे विचार से बीबी ही दुनियां की सर्वोच्च शक्ति है,
इसलिए दहेज ले कर अपना मत गिराइये दाम,
दुनियां भर की पत्नियों को मेरा शत शत प्रणाम....मेरा शत शत प्रणाम....

शनिवार, 5 मार्च 2011

अंग्रेजी में हगीस हिंदी में हगास....

मेरा स्वयम का अनुभव है, आप भी देखें...

कई दिवसों के बाद आज फिर से मेरे मष्तिष्क में,
कुछ खुराफाती विचार नो एंट्री में घुसे ट्रक कि तरह घुसे,
पहले तो हम मन ही मन हँसे,
फिर लगा विषय तो है ये बहुत ही गहरा,
अचानक ब्रेक लगी खुराफाती ट्रक ठहरा,
पर ये हगास बहुत ही अजीब है,
इस पर चर्चा न करना  हमारी तहजीब है,
हम छोड़ नहीं सकते इतनी अहम् बात को,
मुश्किल में पड़ जाते है जब लग जाती है रात को,
शीत ऋतू में बिस्तर का मोह,
ऊपर से निद्रा का विछोह,
पर लगे होने कि मजबूरी,
नहीं करने देती निद्रा पूरी,
सबसे पहले हम कसमसाते है,
थोड़ी देर बाद उहापोह में खुद को पाते है,
फिर दर्द बढ़ता जाता है,
कुछ भी समझ नहीं आता है,
हगास न आए तो होती है बड़ी पीड़ा,
बिना हगे नहीं जी सकता कोई कीड़ा,
कुछ लोग बैठ के है करते,
कुछ लोग बैठने से है डरते,
चेहरा देखिये उस आदमी का गौर से,
जिसको टट्टी लगी हो जोर से,
मौका न मिल रहा हो करने का ,
ऐसे में मन करता है मरने का,
बेचैनी सी छा जाती है,
जब मुहं के पास आ जाती है,
अब निकली कि तब निकली,
अनियंत्रित हो जाती पगली,
बढ़ जाए दूरी यदि घर की,
डर लगा ही रहता अब सरकी,
तब मार चिमोटा भाग चलो,
घर खुला मिले उसमे घुस लो,

फिर परम शांति को करो प्राप्त,
उदर शूल जो है व्याप्त,
लम्बी लम्बी सांसे ले कर,
उदर के ऊपर कर रख कर,
नेत्र बंद हो कर गुम सुम,
याद करो फिर प्रभु को तुम,
बहुत बुरी इसकी है बॉस,
एकबार में न निकले तो बार बार सब करो प्रयास,
मेरा तो बस यही है अनुभव,
खूब हगो जितना हो संभव,...........


शनिवार, 26 फ़रवरी 2011

कुछ इधर की कुछ उधर की....

कल चेहरों की पुस्तक के माध्यम से थोड़ी देर के लिए अपने साहब श्री अनूप शुक्ला जी से वार्तालाप करने का सुयोग प्राप्त हुआ, मै तो ऐसे अवसरों को रिश्वत की तरह ही मानता हूँ क्यों की रिश्वत भी हर् ऐरे गैरे को नहीं मिलती,
एरों में तो हम पहले भी कभी नहीं रहे और गैर मै स्वयं को मानने से इंकार करता हूँ,
बात करने की कला भी अब अबला नहीं रही काफी परिष्कृत हो चुकी है और इसी परिष्कृत कला का परिचय साहब से बात करते समय मुझे प्राप्त हुआ, हो सकता है ये मेरी अज्ञानता हो या उनकी अत्यधिक व्यस्तता के कारण मुझे ऐसा लगा और जो कुछ भी मुझे लगा उसे मै यहाँ टीपे दे रहा हूँ,क्यों की इतने अदम्य साहस को प्रदर्शित करने की छमता मेरे भीतर नहीं है की जो कुछ मै यहाँ लिख रहा हूँ उसे अपने जबड़े से साहब के सामने निकाल सकूँ, इसलिए वार्तालाप का आंशिक अंश यहाँ प्रस्तुत कर रहा हूँ,
मै:-सर जी नमस्ते
 सर:- नमस्ते
सर:- क्या हाल है
मै:- सब आपका आशीर्वाद है
सर:- कुछ नया नहीं लिखा
मै:- कुछ दिनों से अत्यधिक व्यस्त था इस कारण से नहीं लिख सका
सर:- ठीक
मै:- जल्दी ही लिखूंगा
सर:- सही
मै:- अगर आप व्यस्त हों तो मुझे छमा करें
सर:- ठीक
मै:- आपने तो मुझे बहुतखूब समझाया परन्तु बहुत कुछ मेरी समझ में नहीं आया
सर:- सही
मै:- फिर से उसी सुयोग्य अवसर का बेसब्री से इंतजार कर रहा हूँ
सर:- ठीक  ..........सर जी ऑफ लाइन हो जाते है
मै:- शुभरात्रि सर जी
सर:- शुभरात्रि...
लिखना तो बहुत कुछ चाहता था किन्तु,
केस्को की कृपा से अंधेर हो गई है इसलिए बांकी फिर कभी.........