वय का प्रभाव जैसे जैसे मनुष्य पर होता है उसके प्रति मोह भी घटता जाता है..
जैसी पीड़ा और दुख: छोटे बच्चे की निधन पर होती है वैसी ही पीड़ा और दुख: अस्सी या नब्बे वर्ष के मनुष्य के निधन पर नहीं होती. बल्कि मैने तो कई बार लोगो को आपस में ये भी कहते सुना है कि अच्छा हुआ ज्यादा किसी से सेवा नहीं करवाई.. हँसते खेलते चली गईं..
आभास करें तो सच में अस्सी वर्ष के वृद्ध के निधन पर बहुत कम ही लोग मिलेंगे जो शोक व्यक्त करेंगे... कई लोग तो शोक व्यक्त करने से पहले पता लगा लेते हैं कि मरने वाले की उम्र क्या थी.... मालूम होने पर कि 80 साल की थीं तो कहते हैं चलो अच्छा हुआ घिसटना नहीं पड़ा..
और यहाँ फेसबुक पर ठीक उल्टा देखा मैंने.... लोगों को मालूम रहता है कि बहुत बूढ़ी थीं . आज कल आज कल लगा हुआ था, जमीन पर लिटा दी गई थीं....
बंदा खुश हो रहा है चलो एक और पोस्ट मिली. जल्दी से दादी के साथ सेल्फी ले कर पोस्ट कर दिया कि हमारी दादी की तबियत बहुत खराब है.. बस फिर क्या श्रद्धालुओं के लाइक और कमेन्ट धड़ाधड़ चिपकने लगे.. भगवान दादी को जल्दी स्वस्थ करें, ईश्वर सब अच्छा करेगे,धैर्य धारण कीजिये..
अब कोई पूछे कि धैर्य होता तो दादी के स्वास्थ की फिक्र करते ,टेंशन तो लाइक और कमेन्ट की हो रही है..जहाँ पोस्ट पुरानी होने लगी फौरन खुद एक कमेन्ट मार दिया..आज दादी ने आँखे खोली.. पोस्ट फिर से नया हो गया.. फिर लाइक कमेन्ट की रेलमपेल शुरू.. पोस्ट देखते देखते देखा कि दादी तो सच में आँखे खोले हुए हैं.. खुशी से चहकते हुए फौरन दादी को बता दिया....दादी आपकी तबियत खराब सुन के डेढ़सौ लोगों ने कमेन्ट किया और तीन सौ लोगों ने लाइक मारा.. दादी ने आँखे बंद कर ली हमेशा के लिये....ये देखते ही बंदा उछल पड़ा आधी खुशी आधे गम का एपीसोड प्रत्यक्ष हो गया...जल्दी से पोस्ट बनाई.. मित्रों अभी अभी 9.55 पर मेरी दादी माँ का स्वर्गवास हो गया..
फिर से लोगों के लाइक और कमेन्ट आने लगे.....भगवान इस दुख: की घड़ी में आपको साहस दे और दादी की आत्मा को शांति दे, ईश्वर इस कठिन दुख: की घड़ी में आपको शक्ति दे(दादी से सम्बंधित अपडेट करने की) एक कमेन्ट में पढ़ा बंदे ने लिखा था, ईश्वर पर भरोसा रखें (किस बात का ये नही लिखा) लोग भी जल्दी में होते हैं ,कभी कभी अधूरा ही कमेन्ट टीप देते हैं.... घर में माहौल शोकपूर्ण है और ये अपनी पोस्ट देख कर खुश होते रहते हैं....
भले ना हो पास मेरे शब्दों का खजाना, ना ही गा सकूँ मै प्रसंशा के गीत, सरलता मेरे साथ, स्मृति मेरी अकेली है, मेरी कलम मेरी सच्चाई बस यही मेरी सहेली है..
रविवार, 29 मार्च 2015
लाइक-कमेण्ट
शुक्रवार, 20 मार्च 2015
जाल..
नहीं झुरझुरी हुई थी मुझको मौसम जब था सर्द यहां
परस्त्री आकर्षण का कुत्सित खेल है कुछ मस्तिष्कों का
जो, हमदर्दी का रूपक गढ़ते, चरित्रहीन कमजर्फों का.
काँप गया था देख के पर कुछ अभिलाषी नामर्द यहाँ.
नहीं झुरझरी..
शब्द अलंकृत गहराते हैं बद्धितलिपि हो, छंदों में
परिचय पलपल बढ़ता जाता,निश्चय के सब फंदों में
इनकी तो पहचान सरल है रहती सूरत जर्द यहाँ
नहीं झुरझरी..
काम लपेटे मन के भीतर मिश्री सी रखते ये बोली
बसे हुए नैनों, स्वप्नों में, अंगिया, सुंदरि, सुंदरि चोली.
ऐसी सभी कुसंस्कृत शै को करना है बेपर्द यहाँ.
नहीं झुरझुरी...
मंगलवार, 17 मार्च 2015
आज का जीना..
वो डरता है अपनी बड़ी होती बच्ची को देख कर..
या यूँ कहें कि वो डरता है औरत देख कर,
अकेला छोड़ कर जब भी वो बाहर जाता हैं,
साथ ले कर जाता हैं सिर्फ डर,
घर में रह जाती है अकेली,
बच्चियों के साथ,
कलमा पढ़ती आरज़ू,
उसके घर से निकलते ही,
जां नमाज़ बिछ जाती है,
बच्चियाँ भी बैठ जाती हैं पास में,
आँगन में कोई चिडिया भी,
सरगोश़ी करती है,
तो उसे ताला बंद मिलता है दरवाजे पर,
कोई झरोखा नहीं,
जिससे आरज़ू को रोशनी दिख जाये,
बच्चियों को भी रोशनी चाहिये,
बच्चियाँ चुपचाप देखती रहती हैं,
कलमा पढ़ती अम्मी को,
कोई शरारती सिपाही,
ताले को हिला देता है,
जोर से,
कि शायद कोई चीख़,
सुनाई दे जाये उसे,
कमरे में बच्चियों का मुँह,
गोद में छुपा लेती है आरज़ू,
मेरे मौला मेरे मालिक,
आवाज़ सुनती हैं बच्चियाँ,
सीख जाती हैं बच्चियाँ,
अपना सिर ढापना,
खाना बनाना,
बर्तन धोना,
चुपचाप अँधेरे कमरे में रहना,
और इंतज़ार करना अब्बा का,
ताला खुलने की आवाज़,
धड़कन रोक देती है,
साँस भूल जाती है भूँख भी,
जल्दी से अंदर आ कर,
अब्बास खुश हो लेता है,
आज के लिये जीना हो गया।
बुधवार, 11 मार्च 2015
रंगीलो म्हारो कानपुर..
कानपुर का आलम देखो बरस रही है मस्ती,
सभी दिवाने हुए खड़े है चाहे जो हो हस्ती,
रंगरलियों की बात करें क्या हवा हुई रंगीन,
हुल्लड़ धूम तमाशा हो चाहे आग लगी हो बस्ती।
मनु होय त कम्पू घूमि जाओ,
भीड़ भड़क्का रेलम पेला,
मोटर टम्पू खड़खड़ ठेला,
चाट पकउड़ी सेब औ केला,
चम्प चमेली केतकी बेला,
भगवत भूमि का चूमि जाओ,
मनु होय त कम्पू घूमि जाओ,
खुरपी फरुहा काँटा कीला,
लाल गुलाबी नीला पीला,
भंग तरंगं हैं छैल छबीला,
खड़खड़ गढ्ढा अड्डी टीला,
ठग्गू के लड्डू चिउरा चीला,
अब होरी के रंग मा झूमि जाओ,
मनु होय त कम्पू घूमि जाओ,
आला माला कान कै बाला,
स्थित प्रयागनरायन शिवाला,
हटिया कै खटिया बक्सा ताला,
नये गंज के मोटे लाला,
अखबारन मा अमर उजाला,
देखि बुनाई हैण्डलूमि जाओ,
मनु होय त कम्पू घूमि जाओ।
रचनाकार-राजेन्द्र अवस्थी....
सोमवार, 16 फ़रवरी 2015
मान्यता...
के लोगों नें पाटना शुरू कर दिया है.....मंदिर की जमीन और आस पास की जमीन पर भी कुछ दबंग लोगों नें कब्जा करना प्रारम्भ कर दिया जिससे मंदिर का मूल स्वरूप भी प्रभावित हो रहा है.......
गुरुवार, 12 फ़रवरी 2015
ओ री होरी..
गुरुवार, 29 जनवरी 2015
प्रियतमा..
बुधवार, 28 जनवरी 2015
कानपुर की प्राचीन विरासत..
किंतु इसके रखरखाव पर कोई विशेष ध्यान ना दिये जाने से आबादी के बीच मंदिर कहीं खो सा गया है...कभी कभी लोग पिकनिक मनाने के उद्येश्य से इसके पार्क में चले आते हैं.. ये तो गुप्तकालीन इष्टिका मंदिर का प्रसंग था..इस मंदिर का संरक्षक नियुक्त किये गये श्री साही जी से मालूम हुआ ग्राम बुजुर्ग बेहटा में स्थित भगवान जगन्नाथ जी के प्राचीन मंदिर के बारे में अब तो ह्रदय में जिज्ञासा हिलोरे लेने लगी और मन भगवान के दर्शनों के लिये व्याकुल हो उठा...लगभग एक घण्टे का सफर कर के हम भगवान जगन्नाथ जी के दरबार में थे..
शुक्रवार, 21 नवंबर 2014
हँसी
मेरे बच्चे हर बात में हँसी खोज लेते हैं,
जैसे फूल काँटों में भी खुशी खोज लेते हैं,
भूल जाते हैं हर बात जो चुभती हो कहीं,
ऐसी हर बात में नाखुशी खोज लेते हैं,
मेरे बच्चे हर बात में हँसी.................
सितम भी सह ले जो हँस कर जमाने के,
ऐसी कोई मासूम दिलकशी खोज लेते हैं,
मेरे बच्चे हर बात में हँसी...................
मेरे घर में सहमे नही रहते बच्चे हमसे,
वो मुझमें ही कोई हमनशीं खोज लेते हैं,
मेरे बच्चे हर बात में हँसी....................
बड़े प्यारे हैं बच्चे मेरे जरा सादा से हैं,
हर रंग में खुशबू - ए-गुलाब सी खोज लेते है,
मेरे बच्चे हर बात में हँसी.....................
मंगलवार, 18 नवंबर 2014
फेरा..
छोड़ दो फेरा ग्रहों का तुम शनि के घर में हो,
शांति की हो बात कैसे आत्मा जब डर में हो,
खोजते हो रास्ते पर खो चुकी उम्मीद को,
चमक से लुट जाओगे चोरों के शहर में हो,
पालते हो स्वप्न क्यों स्वाभिमानी चैन के,
आँसुओं से है जो गीला तुम उसी बिस्तर में हो,
पेट भर खाना जुगाड़ो बेशरम बन कर रहो,
फिर तराजू ले के बैठो तुम उसी स्तर में हो,
पीठ पर थपकी यहाँ पर मुफ्त में मिल जायेगी,
मिलती हैं मीठी बोलियां फ्री तुम उसी के दर में हो,
पत्नी तो पल पल प्रश्न करती ही रहेगी शान से,
शुक्र है घर पर नहीं तुम आज भी दफ्तर में हो।
भाई-भाई
भाई-भाई..
तुमने खूब सवाल किये हैं,
हमने अपने होंठ सिंये हैं,
कातर आँखें पलक झपकती,
साथ ये कैसा अलग जिये हैं,
हरदम करते हो मनमानी,
फिर कहते हो गई नादानी,
तर्क कुतर्कों से करते हो,
हर हरकत की खैरमख्वानी,
जी भर जाये जब जिद्दों से,
ना रहना फिर शरमिंदो से,
कर लेना तुम सोंच को व्यापक,
दुनियाँ भरी हुई गिद्धों से,
तुमने खूब सवाल किये हैं,
हमने अपने होंठ सियें हैं,
इसी तरह बचपन से अबतक,
हम तुम दोनो साथ जिये हैं।
गीत- करवाचौथ-हुदहुद..
चाँद निकल आया जो छत पर चढ कर आई तुम,
लाज के मारे तारे छुप गये हो गये सब गुमसुम,
सुर्ख सुहानी चूनर तेरी यूँ लहराती है,
जैसे कोई गुड़िया अपने घर को जाती है,
नेह का अम्बर ओढ़े सिर पर जो मुस्काईं तुम,
लाज के मारे तारे छुप गये हो गये सब गुमसुम,
सजना तेरा सजनी साजन को बहलाता है,
बिंदिया काजल टीका गीत मिलन के गाता है,
तेरे पैरों में पायल गोरी यूँ इतराती है,
निर्मल कोई धार नदी की कल कल गाती है,
प्रेम सुधा का प्याला भर छलकाती आईं तुम,
लाज के मारे तारे छुप गये हो गये सब गुमसुम,
चाँद निकल आया जो छत पर चढ कर आई तुम,
बैरी हुदहुद का कम्पू में जब से हुआ है आना,
दिल बेइमान हुआ है मेरा मौसम हुआ सुहाना।
वसंत..
वसंत तुम क्यों आ जाते हो,
गीत निर्मल नेह का,
तुम क्यों सुनाते हो,
वसंत तुम क्यों......
अवरुद्ध होता ह्रदय कम्पन,
सुरभि सुरभित नेह ये मन,
प्रकृति का मेला धरा पर,
उत्फुल लगाते हो,
वसंत तुम क्यों आ जाते हो...
नव चेतना भरते धरा में,
व्यापते जर औ जरा में,
नापते हो दृष्टि के सुख,
विरहन को तपाते हो,
वसंत तुम क्यों आ जाते हो......
प्रकृति के रंगीन झरने,
मन मनोहर विपुल सपने,
भ्रमर कलियों के ह्रदय,
तुम क्यों रिझाते हो,
वसंत तुम क्योंआ जाते हो......
स्वार्थी
हमने कुछ नहीं किया तुम्हारे लिये,
हम तो अपने हाँथ के छालों को देखते रहे,
सहेजते रहे दर्द का एक एक कण,
जिससे मेरे साथ के लोग खुश रहे हर क्षण,
भावुकता का हास जारी रहा अंतस में,
संवेदनाएं पीछे छूटती रहीं हरदम,
हम खुशियों की चाहत में भागते रहे,
भीड़ में अकेले प्रकाश को छोड़ कर,
एकत्रित भी हुआ था बहुत कुछ सबके लिये,
उस "सब" में शायद मैं कभी फिट ना हो सका,
अभी भी नही हूँ और दौड़ रहा हूँ,
भीड़ में अकेले असहाय,
आज भी मै बता नही सकता,
मैने क्या किया तुम्हारे लिये,
वाकई मर्जी मेरी थी और आज भी है,
सर्वशक्तिमान की प्रेरणा निहित है,
कुछ भी होने में कुछ भी करने में,
समय ने माध्यम चुना मुझे,
चुना सबने समय समय पर,
मुझे स्वहितार्थ सप्रयोजन,
बस मैं बता नहीं सकता कि,
मैने क्या किया किसी के लिये,
जहरीला धुआँ
पीला है पका है ऊपर से टपका हुआ है,
जो चमका एक बार वो चपका हुआ है।
वाह वाह का शोर सुन के न रहना भरम में,
ये हिंदी का साहित्य भी एक अंधा कुंआ है,
दिखती है दूर तक इंसानों की ही भीड़,
मजाल है जो दिल को किसी ने भी छुआ है,
खुद मे ही है बाँकी शराफत का सिलसिला,
सलामत रहे ता-उम्र बस ये ही दुआ है,
बड़ा किया है वक्त ने शोलों में तपा कर,
उठता हुआ जो दिखता है जहरीला धुंआ है
कविताई
प्रगति का गीत सुना हमने,
नैतिकता मचल उठी बौराई,
रोक दिया पथ शब्द तिरोहित,
हुए सभी प्रतिमा घबराई,
पहरेदार हैं हर पहलू के,
स्थितियों संग रहे दिखाई,
दिखें सलोनी गाँव की गलियाँ,
पर दिखती विरहन अमराई,
लिखा किसी ने नहीं मरण को,
वरण क्यों करती है तरुणाई,
कलप रहा है ह्रदय प्रकृति का,
नज़र ना आती है अरुणाई,
आस का श्वांस रोके ना रुके,
सृष्टि का सार है या सरिताई,
कालीदास ना हो पाये हम,
चूल्हे भाड़ गई कविताई,
खोज
सर झुकाये सड़क पर चलते हुए,
तलाश करती रहती नज़रें,
सड़क पर पड़ी बेतरतीब चीज़ें,
सहजने में लगे लोग एक एक पल,
लोगों की नज़रे मुझ पर हैं,
पूँछा किस पल की तलाश है,
मेरा जवाब मुस्कराहट में शामिल था,
मै चलता रहा तलाशते हुए,
लोग भी पीछे चलने लगे,
सभी तलाश रहे हैं शायद,
मैं चिल्लाया..ऐ लोगों तुम क्या तलाश रहे हो!!?
लोगों ने मेरी ओर देखा मुस्कराये,
नज़रें फिर तलाशने लगीं सभी की,
कोई कोई उठा लेता था झुक कर,
अव्यक्त और अनमोल चीज़ों को,
तलाश की पूर्णता का अर्थ जिंदगी नहीं,
पूर्णता तो मौत मे निहित है,
तलाशते रहते हैं हम जिंदगी-ज़िंदगी भर।
शनिवार, 1 नवंबर 2014
कविताई..
प्रगति का गीत सुना हमने,
नैतिकता मचल उठी बौराई,
रोक दिया पथ शब्द तिरोहित,
हुए सभी प्रतिमा घबराई,
पहरेदार हैं हर पहलू के,
स्थितियों संग रहे दिखाई,
दिखें सलोनी गाँव की गलियाँ,
पर दिखती विरहन अमराई,
लिखा किसी ने नहीं मरण को,
वरण क्यों करती है तरुणाई,
कलप रहा है ह्रदय प्रकृति का,
नज़र ना आती है अरुणाई,
आस का श्वांस रोके ना रुके,
सृष्टि का सार है या सरिताई,
कालीदास ना हो पाये हम,
चूल्हे भाड़ गई कविताई,
सोमवार, 22 सितंबर 2014
गरिमा
लेओ अब का कीन जाय.. अब तो मोदियौ कहि दीन्हेन कि, परिवारिक संस्कृति विकसित कीन जाय.
हा हा हा.......वइसे ई बात से कॉग्रेसी बड़े खुस भे होइहैं...कि आखिर आये वई रस्ता पर..लेकिन गज्जब की बात तौ या है कि, मोदी जी का कउनौ परिवार तो है नहीं. फिर !!
फिर उई मौका की बात कई दीन्हेन कि, भारत सोने केर चिरइय्या रहए मगर हम आसमान मा उड़ब छाँडि के जमीन पर आ गेन मुला अब हमरे पास फिर से उड़ै केर मौका है.
तो मौका तो बाद मा दीख जाई पहिले चउका द्याखौ..नहीं तो पारिवारिक संस्कृति विकसित करै के चक्कर मा ना घरु के होइहौ ना घाटु के..
कायदे से दीख जाय तो देस मा पारिवारिक संस्कृति विकसित करै का श्रेय कॉग्रेसै का मिलै क चही..
भाई हम तौ पूरे नम्बर दइ के महाकोढ़पती मान लीन है कॉग्रेस का..
काहे से कि दमाद,लरिका,बिटिया,महतारी,अजिया,बाबा, अउर आगेओ न जानै केत्ते नाती पोता कस्मीर से लइके क्न्याकुमारी तक कॉग्रेसी परिवार की विरासत सम्हारे हैं..
खैर या तौ पुरान बतकही राहए.. नई बात या है कि जंऊ नई बहुरिया हैं वऊ सब उदास होइ गई है..या पारिवारिक संस्कृति वाली खबर सुनिके..काहे से कि मनु मा स्वाचौ कुछु होइ जात है कुछु..अब बुढइ बुढ़वा का को दस दाँय चाह दे..
फिर बुढ़ापे मा चाह,बिस्कुट,दूध,मलाई, हद्द होइगै...अरे यो सब लरिकन खातिर होत है कि बुढ़वन खातिर...हाँ एक बात हमका नीक लागि..उई कहेन " स्त्री गरिमा बनी रहए का चही" लेकिन हिंया तो एत्ते दिमागी परे हैं कि गरिमै की रोटी खा रहे हैं जब तक ई गरिमा पर बहस करिके मामला गरमा न दें तब तक इनका चैनै नाइ आवत..अब द्याखौ भइया हम तौ तिखार दीन तुमहूं तनक तिखारौ..
रविवार, 31 अगस्त 2014
हाय-क्यूँ...!
1-जय गणेश,
छि: उत्तर प्रदेश,
गर्मी अशेष,
2-गर्मी पसीना,
गणेशोत्सव महीना,
मुश्किल जीना।
3-वो चूहा चोर,
कलियुग है घोर,
जोर का शोर।
4-सैलाबी आँसू,
बा बहू और सासू,
कहानी धाँसू।
5-प्रभु छेड़ो ना,
करने दो आराम,
दिल तोड़ो ना।
6-ऊपर देर,
मंदिर में अंधेर,
वक्त का फेर।
7-होली यूँ जली,
लपटे रंगीन थी,
सूनी थी गली।
8-पास पैसे थे,
पिचकारी लेनी थी,
फिर से गिने।
















