शनिवार, 16 अप्रैल 2011

भ्रष्टाचारी..


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भ्रष्टाचारी की परिभाषा गढता हूँ मै,

भ्रष्टाचारी के बारे में पढता हूँ मै,

भ्रष्ट हो कर ये मच्छर बन गए है मगर,

इनकी लीला है जारी हर गांव शहर,

भरोसा न कोई कब ये क्या सोंच लें,
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अपने माँ बाप का भी कफ़न नोंच लें,

न कोई धर्म इनका न जाती कोई,

मानवता भी इनसे लजाती हुई,

पुतले भ्रष्टता के चाहे लाखों फूंक लो,

इनके चेहरे पे चाहे जितना थूंक लो,

जरा सा भी ये स्वाभिमानी नहीं है,

इनकी आँखों में लज्जा का पानी नहीं,

रिश्वत ही बस इनका ईमान है,

परले दर्जे के साले ये बेईमान है,

Go to fullsize imageसबसे मजबूत इनका जो हथियार है,

वो निकम्मी ये कांग्रेस सरकार है,

इंसानियत नही इनमे पत्थर है ये,

जो बदतर से भी ज्यादा हो बदतर है ये,

बनाते है ये लाशों पर महल,

टूटे पांवों से भी लेते है टहल,

राष्ट्र को भ्रष्टाचारी भ्रष्ट करते रहे,

इनको सह कर सभी साथ देते रहे,

अभी भ्रष्टता का है जारी कहर,

नस नस में इनके भरा है जहर,

पर अन्ना ने इनकी कमर तोड़ दी,
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एकता की लड़ी बाहुनर जोड़ दी,

चल पडी देश में ऐसी आंधी नई,

जैसे पैदा हुआ हो फिर से गांधी कोई,

फिर गुलामी की जंजीरें तोड़ेंगे हम,

पंक्ति इतिहास में नई जोडेंगे हम,

यज्ञ में आज मिलकर करो सब हवन,

मेरा स्वीकार अन्ना करो अब नमन..

मंगलवार, 12 अप्रैल 2011

भावना पत्र...

आदरणीय सर जी, कृपया मेरे अंतर्मन की भावनाओं को समझें और यदि हो सके तो मेरी शंकाओं का निवारण करने की कृपा करें..


जैसे ही समाप्त हुआ सत्र,
लिख डाला मैंने गुरू जी को भावना पत्र,
आदरणीय सर जी महोदय,
हिन्दी साहित्य के शब्द नवोदय,
मेरी आपसे याचना है,
ये जो मार्च महीने की यातना है,
कम से कम मुझे ना मिले,
क्योंकि करने होते है मुझे आपसे बहुत सारे गिले,
पर इस महीने आप रहते हो अत्यधिक व्यस्त,
मै सवालों के चक्रव्यूह में फंस कर हो जाता हूँ त्रस्त,
मै समझता हूँ आपकी मजबूरी,
दिल से ना सही पर हो ही जाती है अपनों से दूरी,
याद दिला रहा हूँ आपको किया हुआ वादा,
हो सकता है आपकी स्मरण शक्ति हो कम या ज्यादा,
आपके अलावा जब मेरे पास नही था अन्य कोई विकल्प,
तब अप्रैल में सहायता करने का आपने लिया था संकल्प,
अब अप्रैल भी आधे से अधिक गया है बीत,
और अधूरा है आज भी हमारा वो गीत,
बड़ी हसरतों के साथ जो हमने आप को भेजा था,
पर ना जाने कहाँ से आ मरा ये तनेजा था,
जिसने आपके द्वारा प्रसिद्धि पा ली,
भले ही दिल और दिमाग दोनों से था खाली,
आप तो व्यस्त हो मै हो रहा हूँ बोर,
मेरा भी मन करता है लिख दूँ तनेजा है चोर,
पर रोक देते है हाँथ मेरे संस्कार,
आप की दी हुई शिक्षा मत करना अहंकार,
तभी तो जीवित है तनेजा जैसे जंतु,
मै फिर से लिखने लग जाता हूँ वही किन्तु परन्तु,
आप तो भोले हो आप का ह्रदय है उदार,
पहली बार देखा किसी ब्लॉगर के इतने गंदे विचार,
क्षमा करें कुछ गंदगी में अटक गया था,
अपने विषय से भटक गया था,
मैंने तो कर लिया है पक्का इरादा,
करना होगा पूरा आपको अपना वादा,
लाईट जा चुकी है अधिक हो गई है रात,
आपके चरण स्पर्श के साथ समाप्त करता हूँ बात,
स्पष्टवादी हूँ विचार है साफ़ साफ़,
गलतियों के लिए कर दीजियेगा माफ,
अशीर्वादाकंशी उज्वल हो मेरा भविष्य,
राजेन्द्र अवस्थी (कांड)आपका सेवक आपका शिष्य,

शुक्रवार, 8 अप्रैल 2011

अन्ना हजारे,हम आपके आप हमारे....

कई ब्लोगर्स ने अपनी पोस्ट के माध्यम से "अन्ना जी" को अपना समर्थन दिया है, अपनी शैली में हमने भी प्रयास किया है ज़रा देखें...
अन्ना हजारे,हम आपके आप हमारे..

सन १९६५ में भारत , पकिस्तान युद्ध के दौरान सेना में ट्रक ड्राइवर की नौकरी करने वाले "अन्ना हजारे" भ्रष्टाचार के विरोध में हिन्दुस्तान के अंदर सागरमाथा जैसा आंदोलन करेंगे, शायद किसी ने भी सोंचा नही होगा, विदेशी दुश्मनों के दांत खट्टे करने वाली सेना में रह कर तो उन्होंने ने देश कि सेवा कि ही थी, लेकिन अब देश के अंदर मौजूद सबसे बड़े दुश्मन यानि भ्रष्ट्राचार को देश से समाप्त करने के लिए संकल्पित हैं,

आइये एक नज़र डालते है अन्ना हजारे के नाम से प्रसिद्ध किसान बाबूराव हजारे के जीवन के अनदेखे पन्नों पर.......

सर्वप्रथम देशसेवा...मेग्सेसे पुरूस्कार से सम्मानित अन्ना जी का जन्म महाराष्ट्र में अहमद नगर जिले के रोलेगन सिद्धी गाँव में १५ जून १९३८ को हुआ था. इनके पिता एक किसान थे. अन्ना हजारे १९६३ में भारतीय सेना का हिस्सा बने. भारत, पाकिस्तान लड़ाई के दौरान वह खेमकरन सेक्टर में तैनात थे. यहाँ पाकिस्तानी लड़ाकू विमानों ने भारतीय सीमा में प्रचंड बमबारी की. इस लड़ाई में अन्ना जी ने अपने साथियो को मातृभूमि पर बलिदान होते देखा. इसके बाद इन्होने कभी विवाह ना करने कि सौगंध खाई. १९६० मे ड्राईवर के पद पर रहते हूए उन्होंने रबीन्द्रनाथ टैगोर, महात्मा गाँधी, विवेकानंद,और आचार्य विनोबा भावे के बारे में रिसर्च की. अन्ना जी आज भी अपने गांव में यादव बाबा मंदिर के पास बने छोटे से कमरे में निवास करते हैं...

फिर समाज सेवा..

१९७५ में सेना से स्वेक्षिक सेवा निवृत्ति लेने के पश्चात वह अपने गाँव रोलेगन सिद्धी लौट आये.गाँव में सूखा, गरीबी, अपराध, और शराबियों का बोलबाला था, उन्होंने इन सब समस्याओं का सामना करते हुए गाँव वासियों को नहर बनाने और तालाबों में वर्षा जल को एकत्र करने के लिए प्रोत्साहित किया, और अन्य कई प्रकार के सामाजिक कार्यक्रम चलाए जिसके कारण रोलेगन सिद्धी गाँव अन्य सभी गांवों के लिए आदर्श गाँव बन गया, इस साहसिक प्रयास के कारण वो पूरे देश में प्रसिद्ध हो गए.

आंदोलन...

उसी समय उनका सामना महाराष्ट्र के वन विभाग के अधिकारियों से हुआ. वह पुणे के पास आलंदी के पास भूंख हड़ताल पर बैठ गए. उनके आंदोलन ने समूचे प्रशाशन को हिला कर रख दिया और प्रशाशन को आरोपियों के खिलाफ कार्रवाई करने के लिए विवश होना पड़ा. उन्होंने १९९१ में "भ्रष्टाचार विरोधी जन आंदोलन" का गठन किया जो आज पूरे देश में फ़ैल गया है. देश में सूचना के अधिकार का विचार अन्ना जी ने १९९७ में दीया. इसी वर्ष अन्ना जी ने सूचना का अधिकार प्राप्त करने के लिए जन जागृति अभियान चलाया. जिसके कारण केन्द्र सरकार को २००५ में "सूचना का अधिकार क़ानून" बनाने के लिए विवश होना पड़ा..


और अब....जन लोक पाल बिल...

जस्टिस संतोष हेगड़े,प्रशांत भूषण,और अरविन्द केजरीवाल द्वारा बनाया गया यह विधेयक लोगों के द्वारा वेबसाइट पर दी गई प्रतिक्रिया और जनता के साथ विचार विमर्श के बाद तैयार किया गया है. इस बिल को शांति भूषण, जे.एम्.लिंगदोह, किरन बेदी, अन्ना हजारे आदि का भारी समर्थन प्राप्त है. इस बिल की प्रति प्रधान मंत्री एवं सभी राज्यों के मुख्यमंत्रियों को १ दिसंबर को ही भेज दी गई थी..


जन लोकपाल बिल की खास बातें..

१. इस क़ानून के अंतर्गत, केन्द्र में लोकपाल और राज्यों में लोकायुक्त का गठन होगा.
२. ये संस्था निर्वाचन आयोग और सुप्रीम कोर्ट की तरह सर्कार से स्वतंत्र होगी.
कोई भी नेता या सरकारी अधिकारी जाँच की प्रक्रिया को प्रभावित नही कर पाएगा.
३. भ्रष्टाचारियों के खिलाफ कई वर्षों तक मुक़दमे लंबित नही रहेंगे. किसी भी मुक़दमे की
जाँच एक वर्ष में पूरी होगी. ट्रायल अगले एक वर्ष में पूरा होगा भ्रष्ट नेता, अधिकारी या
जज को दो वर्ष के अंदर जेल भेजा जाएगा.
४. अपराध सिद्ध होने पर भ्रष्टाचारियों के द्वारा सरकार को हुए घाटे को वसूल किया जाएगा.
५. यदि किसी नागरिक का काम तय समय सीमा के भीतर नही होता, तो लोकपाल
दोषी अधिकारी पर जुर्माना लगाएगा और वह जुर्माना शिकायत कर्ता को मुआवजे के रूप में
मिलेगा.
६. अगर आप का राशन कार्ड, मतदाता पहचान पात्र, पासपोर्ट आदि तय समय सीमा के भीतर
नही बनता है या पुलिस आपकी शिकायत दर्ज नही करती तो आप इसकी शिकायत लोकपाल
से कर सकते है और उसे यह काम एक माह के भीतर कराना होगा. आप किसी भी प्रकार
के भ्रष्टाचार की शिकायत लोकपाल से कर सकते है जैसे सरकारी राशन की कला बाजारी,
सड़क बनाने में गुणवत्ता की अनदेखी, पंचायत निधि का दुरूपयोग. लोकपाल को इसकी जाँच
एक साल के भीतर पूरी करनी होगी. ट्रायल अगले एक वर्ष में पूरा होगा और दोषी को दो वर्ष
के भीतर जेल भेजा जाएगा.
७. क्या सर्कार भ्रष्ट और कमजोर लोगों को लोकपाल का सदस्य नही बनाना चाहेगी?
ये मुमकिन नहीं है क्यों की लोकपाल के सदस्यों का चयन जजों, नागरिकों और संवैधानिक संस्थानों
द्वारा किया जरगा ना की नेताओं के द्वारा. इनकी नियुक्ति पारदर्शी तरीके से और जनता की भागीदारी से
होगी.
८. अगर लोकपाल में काम करने वाले अधिकारी भेष्ट पाए गए तो? लोकपाल/लोकयुक्तों का कामकाज पूरी
तरह पारदर्शी होगा.लोकपाल के किसी भी कर्मचारी के खिलाफ शिकायत आने पर उसकी जाँच
अधिकतम दो माह में पूरी कर उसे बर्खास्त कर दिया जाएगा.
९. मौजूदा भ्रष्टाचार निरोधक संस्थानों का क्या होगा? सीवीसी, विजिलेंस विभाग, सीबीआई के भ्रष्टाचार
निरोधक विभाग का लोकपाल में विलय कर दिया जाएगा. लोकपाल को किसी जज, नेता या अधिकारी
के खिलाफ जाँच करने व मुकदमा चलाने के लिए पूर्ण शक्ती और व्यवस्था भी होगी..

रविवार, 20 मार्च 2011

होली की सीख....



                           होली की सीख                         होली की सीख



लिखने के लिए हों``` पढ़ने के लिए````` या``` बोलने के लिए```` कुछ विषय``` इतने बम ब्लास्ट होते है,
कि रिक्शे वाले````खोमचे वाले````झल्ली वाले से ले कर`````` भारत के प्रधान मंत्री तक``` का ```ध्यान आकर्षित कर ही लेते है|. ऐसा ही एक विषयी त्यौहार है भारतीय होली``````होली के बारे में तो`` बहुत कुछ लिखा`` कहा`` पढ़ा गया है`````````` ना जाने क्या क्या गढा गया है,

फिर भी जो कुछ रह गया है बाँकी,
मै यहाँ  पर उसकी दिखा देता हूँ झाँकी,
उत्तर प्रदेश कि होली,
साथ में देहाती बोली,
थोडा और लुत्फ़ उठाओ,
हमारे शहर में आओ,
यानी कानपूर,
आपकी सब मस्ती हो जाएगी काफूर,
कानपुर सेन्ट्रल जैसे ही आओगे,
बड़े बड़े इंसानी छोत अपने सामने पाओगे,
बदबू से आपकी फटने लगेगी
.
.
.
नाक,
सीना होगा छलनी हसरतें चाक चाक,
पस्त हो चुके होंगे आधे हौसले,
कुली कहेगा बाबूजी थोडा कानपुर घूम लें,
जैसे ही  स्टेशन से बाहर आएँगे,
ऑटो वाले साहब कह के का सामान उठाएंगे,
बाहर जब आप सन्निपात से जागोगे,
ऑटो रिक्शा खुद चला कर भागोगे,
कुछ ही देर में आप को पता चल जाएगा,
कि आप खोटा सिक्का तो चला सकते हो पर ऑटो आप से नहीं चल पाएगा,
गुस्से से ड्राइवर जब भ्रकुटी करेगा तिरछी,
ह्रदय में चुभ जाएगी स्वाभिमान की बरछी,
फिर भी मौन रहते हुए,
अनापेक्षित यातना सहते हुए,
शुरू करोगे यादगार सफर,
ड्राइवर सोंचेगा...आज अच्छा फंसा डफर,
अचानक धीरे से लगेगा आपको जोरदार झटका,
बिगड कर कहोगे अबे कहाँ ला पटका,
ड्राइवर बोलेगा.. चिल्लाइये मत गहरी साँस लीजिये,
कानपुर कि सड़कों के गड्ढों का दर्शन कीजिए,
विभिन्न किस्म के गड्ढे आप यहाँ पाएँगे,
गलती से पहली बार आए हैं,
दोबारा नहीं आएँगे,
अब आप मौन हो जाओगे,
छुप के अपना सर सहलाओगे,
बार बार ऑटो खाएगा हिचकोले,
करोगे अनुभव जैसे धरा डोले,
पर आपके सर तो चढा होगा होली का खुमार,
क्यों की योजना बना कर आये थे बेशुमार,
अब छोटी मुसीबतों से घबराना क्या,
चाहे जितनी हो अनजान डगर लडखडा कर गिर जाना क्या,
सोंच ही रहे थे ये सब क्या है बखेडा,
तभी ऑटो के अंदर आया गोबर का थपेड़ा,
आपकी सूरत देख ड्राइवर बेसाख्ता हंसा,
ऑटो से उतरते ही पैर घुटनों तक कीचड में धंसा,
किराया सुनकर कलेजा मुंह तक आया,
ड्राइवर बोला, शुक्र करो आपसे धक्का नहीं लगवाया,
पीछे गली में गूँज रही थी गाली,
मै,पर्स,दिमाग,जेब हर जगह से हो चुका था खाली,
कानपुर आ कर मुझे अच्छी मिली सीख,
भाग्यशाली हूँ जो स्टेशन पर मांग रहा हूँ भीख,
                                          भाग्यशाली हूँ जो स्टेशन पर मांग रहा हूँ भीख......

शुक्रवार, 18 मार्च 2011

हाय कितना कठिन ये जीवन,

मेरी ये रचना जेल में  बंद एक निरपराध कैदी की भावनाओं को व्यक्त करती है....

 कहना पड़ता है अब मुझको,
                             हाय कितना कठिन ये जीवन,
                                         Caged Inside by lor.rain.e

             जो वीराने का देता परिचय,
                            हर पल जीवन करता जो  क्षय,
            सरल ह्रदय सुन्दर मृदुभाषी,
                            स्म्रति जिसकी नहीं है बासी,
            व्यथित हो रहा है अब कन कन,
                             हाय कितना कठिन ये जीवन,

                   Your secret is your prisoner; once you reveal it, you become its slave by Xploiтєя ™


                              दुनिया की गति वही बनी है,
                                               कल के निर्धन आज धनी हैं,
                              उसका प्रभु तो आज भी बहरा,
                                              समय वहीँ का वहीँ है ठहरा,
                               नहीं है वश में अपना तन मन,
                                             हाय कितना कठिन ये जीवन,

         
                                                 The Key to Your Soul by Ben Heine
             
                                            देखा कभी सुआ पिंजरे में,
                                                           जश्न नहीं होता उजड़े में,
                                             रात अँधेरी दिया न बाती,
                                                          परछाई है कान में गाती,
                                            नहीं है अब वो बाग वो उपवन,
                                                          हाय कितना कठिन ये जीवन,


                          Hope  in the Prison of Poverty by KathyAAdams

                                      योगी  को लज्जा आ जाए,
                                                       जो जीवन इतना कठिन बिताए,
                                      भावुकता अपनी किसे बताए,
                                                       हर पल घर की याद सताए,
                                     मै तो करता स्वयं का तरपन,
                                                       हाय कितना कठिन ये जीवन,

                                                Freedom by GraveBone
                               
                                       वार्तालाप करे प्रति छाया,
                                                    ईश्वर क्यों इंसान बनाया,
                                       मै तो हूँ इक ऐसा तोता,
                                                    बेगुनाह पिंजरे में होता,
                                       खोज रहा सबमे अपनापन,
                                                   हाय कितना कठिन ये जीवन,
                    Empty Cage by h.koppdelaney

                                        याद सभी की आती रहती,
                                                     निर्जनता बस यही है कहती,
                                         तू ही नहीं अपनों से डरा सा,
                                                     सबर करो बस और जरा सा,
                                          रोज ही करता स्वयं को अर्पन,
                                                    हाय कितना कठिन ये जीवन,


                                           Day 113/365: I'll fly away by talulayu

                                खुला आसमां तुझे दिखेगा,
                                          वंश तेरा इतिहास लिखेगा,
                               नहीं हुई तेरी कुछ हानि,
                                           समय करेगा खुद पर ग्लानि,
                               देख रहा हूँ दुःख का दर्पन,
                                           हाय कितना कठिन ये जीवन,


                    Raksha Bandhan Gifts to India by Giftstoindians1    

                                                जल्दी से तुम वापस आओ,
                                                                 विरहा,फाग,भजन,सब गाओ,
                                                 बहना से "राखी" बंधवाओ,
                                                                ना  रखना कोई  इच्छा बांकी,
                                                  इतिश्री हो अब सारा कलपन,
                                                              वाह रे कितना सुखी वो जीवन....
                                                                         वाह रे कितना सुखी वो जीवन...

बुधवार, 16 मार्च 2011

समर्पण..

"कुछ धीर के साथ" "कुछ नीर के साथ" "ह्रदय में गूंजी पीर के साथ" अपनी नादान,मासूम,स्नेहिल अर्धांगिनी को समर्पित करता हूँ ये रचना......


July 7 2009 Extravaganza - Prediction = True by Pilottage
    
 मै वाचाल समंदर सा तुम
               निर्मल धार सी बहती हो,







ह्रदय का संबल तुम ही हो,
               जीवन आलंबन तुम ही हो,
तुम स्नेह की कोमल डोर प्रिये,
                     प्रेम पाश प्रतिबद्ध किये,
साथ मेरे हो कर भी तुम न,
                        जाने क्या क्या सहती हो,   मै वाचाल समंदर सा तुम निर्मल.....


A New Begining.. by Gauri V

सहज मेरी मुस्कान हो तुम,
                 अभिमान भी तुम स्वाभिमान भी तुम,
तुम कंठ कोकिला सुरभित हो,
                      मै दुनिया के आयाम में गुम,

और मेरे कागा स्वर को तुम,
            भँवरे की गुन गुन कहती हो,   मै वाचाल समंदर सा तुम निर्मल.....

The glow within by P a c h y d e r m
 













  न जाने कितने वसंत प्रिये,                      
                            तेरे पतझड़ जैसे गुजरे है,
टूटे स्वप्न कई जब हम,
                          खुद दिए वचन से मुकरे हैं,
पर सुख में दुःख में साथ मेरे,
                          हर हाल में खुश तुम रहतीहो,    मै वाचाल समंदर सा तुम निर्मल.....

 by Krins
जब स्मृति पृष्ठ पलटता हूँ,
                         नेत्र नीर टपकाते है,
टेढ़े मेढे अनगढ़ से,
                          चित्र कई बन जाते है,
तब हूक ह्रदय में होती है,
                            तुम मूक ही सबकुछ  कहती हो,   मै वाचाल समंदर सा तुम निर्मल.....



Birds / Lovers - Megalaima haemacephala by Umang Dutt















 कैसा ये प्रतिदान प्रिये,
                         ये कैसा स्वाभिमान प्रिये,
सारे कष्टों से मुझको,
                       रखती हो अनजान प्रिये,
दुनियां के बिछाए खारों पर,
                       तुम बिना पादुका चलती हो.   मै वाचाल समंदर सा तुम निर्मल.....



                                                                                            रजेन्द्र अवस्थी......
                                                                                                                                                               

रविवार, 13 मार्च 2011

होली का हुडदंग........

होली रंगों का उल्लास का और प्रेम का त्यौहार है.
छोटे "बच्चों" से ले कर "वयोवृद्ध", सभी पूर्ण "उल्लास" के साथ अपने "उत्साह" को प्रदर्शित करते हुए एक दूसरे को रंग और अबीर लगा कर "प्रसन्नता" पूर्वक मनाते हैं,
बहुत सारे लेखकों,कवियों, और विद्वानों ने अपनी, अपनी शैली में शब्दों के द्वारा खूब होली खेली है.
मैंने भी प्रयास किया है...



portrait by subhasish
मैंने साली से खेला जो रंग, तो घर में बीबी से हो गयी जंग,                                                    पिचक्का टूट गया..........................
उनके क्रोध की सीमा टूट गयी, और पत्नी हमसे रूठ गयी,
            मैंने प्यार से पकड़ा जो हाँथ, उन्होंने हुसर के मारी लात,
                                                  पिचक्का टूट गया...........................



Nandgaon Holi Festival, India by Jitendra Singh : Multi Media Trainer












हमने प्रेम में वादे कर लिए, कान भी मैंने पकड़ लिए,
          पर धन्य हो औरत जात, गुजर गई बैठे सारी रात,
            पिचक्का टूट गया..........................


Contours by sunny-drunk
 स्वाभिमान भी अपना मार गए, सब तरह से कह के हार गए,
            जब नहीं बनी कोई बात, दिखाई हमने भी औकात,
                                                   पिचक्का  टूट गया........................


SHRUTI by Sukanto Debnath
                                       
अब पत्नी से हम ऐंठ गए, और घर के बाहर बैठ गए,
            तब बढ़ने लगी तकरार, बिगड़ गया होली का त्यौहार,
                                                  पिचक्का टूट गया.........................

Ras  Lilas in Vrindavana - भक्तिकाल by Ginas Pics
 सामान भी अपना बांध लिया, और बच्चो को तैयार किया,
               जब करने लगी गृह त्याग, तो लागी हमरे ह्रदय में आग,
                                                 पिचक्का टूट गया.........................

SAM SAJAN THOMAS by Sukanto Debnath
मौसम में कुछ गर्मी थी, मेरे नेचर  में अब नरमी थी,
                मै जोड़ के बोला हाँथ, प्रिये न छोडो मेरा साथ,
                                                 पिचक्का टूट गया.......................




Carnaval d'Automne by Christine Lebrasseur
 मुस्कान उन्हें अति मंद हुई, और प्यार से आँखे बंद हुई,
               जब टूटा भ्रम का जाल, तो बजने लगी प्रेम की ताल,
                                                     पिचक्का टूट गया................... 
                                                                         

                                                                      आपका अपना बुलबुल
                                                                       राजेंद्र अवस्थी   (कांड)

मंगलवार, 8 मार्च 2011

गीत.....

किसी से प्यार करना या किसी से प्यार होना दोनों एक ही सिक्के के दो पहलू हैं,
प्यार की समीक्षा नहीं की जा सकती. प्यार का कोई पैमाना नहीं होता, प्यार की कोई तौल नहीं होती, प्यार का कोई मोल नहीं होता, प्यार कम या ज्यादा नहीं होता, प्यार केवल प्यार होता.है.
हर् व्यक्ति के जीवन में प्यार होता ही है,
आज इसी प्यार से प्रेरित हो कर बड़े प्यार से पहली बार एक प्यारा सा गीत लिखने का प्रयास किया है.......

शर्मा कर देखना तेरा,फिर झुका लेना निगाहों का,
अदा तेरी ये कत्लेआम कर देती है आहों का,
तेरी चितवन को कैसे मै नज़र अंदाज़ कर जाऊँ,
चली आओ मेरे दिल में सहारा लेलो बाँहों का,      चली आओ मेरे.........


 प्यार मुझको तो तुमसे है इश्क तुमको भी कम नहीं,
      कब से तेरी आंख गीली है मेरी आंख नम नहीं,
      खता मेरी ही है शायद तुम्हारा दोष कुछ नहीं,
       अब चर्चा आम होता है हमारी ही वफाओं का,     चली आओ मेरे...........


ज़माना याद रक्खेगा हमारी इस कहानी को,
समय बर्बाद कर देगा तुम्हारी सब जवानी को,
बांकी बस निशाँ रह जाएगा इन मस्त हवाओं का,
मेरी रगबत है बस इतनी कोई रहबर हो बागों का.    चली आओ मेरे...........


तुम्हारा अक्स दिखता है मुझे फूलों में कलियों में,
हवाएं सर्द चुभती है बदन में तेरी गलियों में,
झलक दिख जाए बस तेरी यही उम्मीद रखता हूँ,
नज़र भर देख लूँ तुमको नज़ारा हो नजारों का...       चली आओ मेरे..........



    

पत्नी भक्ति...

ये बार बार आज  आज लिखते लिखते बोर हो गया हूँ किन्तु क्या करूँ लिखना तो यही पड़ेगा कि आज फिर कुछ लिखने का मन किया तो लिखने बैठ गया, मन को मारना भी उचित नहीं जान पड़ता, उचित अनुचित क्या मन को मारा ही नहीं जा सकता अगर मारा जा चुका होता तो आदरणीय धर्मराज युधिष्ठिर यक्ष से न कहते कि मन ही सबसे ज्यादा गतिवान होता है,
शायद मै राह भटक गया, क्यों कि शीर्षक "पत्नी भक्ति" लिखने के बाद मन को ले कर बैठ गया,
कोई बात नहीं देर आए दुरुस्त आए......वास्तव में पत्नी की शक्ति, धैर्य और उनकी क्षमताओं को नकार पाना किसी के बस में नहीं है..मेरे भी नहीं..क्यों कि एक देवी साक्षात् मेरे घर के मंदिर में प्रतिष्ठित है,और मै पूरे मनोयोग एवं तन,मन,धन से देवी की उपासना करने में तल्लीन रहता हूँ,
प्रतिपल मेरी भक्ति में कोई भूल न रह जाए इस डर से भयभीत रहता हूँ,..ये रचना मै दुनियां की सभी पत्नियों को समर्पित करता हूँ...


आज कल हम लोग पत्नी युग में जी रहे है,
उन्ही का दिया हुआ खा पी रहे है,
इस युग में पत्नी भक्ति बहुत जरुरी है,
बिना भार्या भक्ति के जिंदगी अधूरी है,
यूँ तो मेरे जैसे श्रद्धालु बहुत मिल जायेंगे,
आप एक्सरे निगाहों से देखेंगे तो कई पत्नी भक्त पाएंगे,
कवि होने के साथ सरकारी कर्मचारी हूँ,
पहले माता पिता का था अब पत्नी का आज्ञाकारी हूँ,
 हमारी पत्नी का स्वभाव बड़ा नरम है,
उनके समक्ष मौन रहना मेरा मुख्य धरम है,
प्रातः काल बेड टी देना मेरी नित्य क्रिया का हिस्सा है,
आगे का हांल सुनिए एक रोज का किस्सा है,
दफ्तर से शाम को घर आया तो पत्नी को नदारद पाया,
किसी बात पर नाराज हो मायके चली गयी थी,
अपने तीन प्रतिनिधि मेरे पास छोड़ गयी थी,
बेटे से पूछा,चंदू मम्मी क्या अभी से सो गयीं
चंदू बोला वो तो नानी के यहाँ गयीं,
फिर तो मै अपने आप को कोसने लगा,
क्या गलती हो गयी इस विषय में सोचने लगा,
दाल में नमक तो बिलकुल सही था,
कही छोला ज्यादा कड़वा तो नहीं था,
मैंने चाय भी नहीं पी थी पर उनको जरुर दी थी,
ना जाने क्या बात हो गयी,
जो अपनी एक क्षत्रछाया से मुझे वंचित कर गयीं,
इसी उलझन में फंसा हुआ,गले तक पत्नी प्रेम में धंसा हुआ,
पहुच गया ससुराल,ससुर ने देखते ही पूछा हालचाल,
मैंने कहा बाकी तो सब ठीक है,
परेशानी केवल एक है,
आपकी बेटी का मूड पाकिस्तानी प्रधानमन्त्री की तरह उखड़ा हुआ है,
जबकि हाल ही में हमारे बीच जिनेवा समझौता हुआ है,
कि हम दोनों के बीच अब प्रेम की गंगा बहेगी,
मुझसे कोई गलती हो तो अपने मुख से वो जरूर कहेगी,
पर मुझे चेतक समझ उन्होंने अपनी पुतली फिराई,
किसी नेता कि तरह वादा खिलाफी दिखाई,
आदरणीय पिता जी कृपया आप ही बताएं,
कि कर्ज रुपी बोझ से लदी गृहस्थी की गाड़ी,
हम एक पहिये पर कैसे चलाये,
ससुर को मेरे ऊपर रहम आया,
सास को "माँ जी" कह कर बुलाया 
माँ ने मुझे देखते ही नाक भौं सिकोड़ी,
सरौते के बीच दबी हुई सुपारी झटके से तोड़ी,
इत्मीनान से बैठ कर हमसे कहा,अब क्या लेने आए हो यहाँ,
विदा के समय ६ हट्टे कट्टे आदमी लगे थे कार के अंदर बिठाने में,
२ चादर १ दरी भीग गई थी चुप कराने में,
२ मन की लड़की १ मन की रह गई,
तुम्हारे जुल्म इतने दिन न जाने कैसे सह गई,
मेरी जबान तालू से रही चिपकी,
माता जी तानो की देती रही थपकी,
मैंने कहा माता जी, मै आपकी बेटी पर दिलो जान से मरता हूँ,
पत्नी के सिवा दुनियां में किसी से नहीं डरता हूँ,
काश पूरी दुनियां के पति मेरे जैसे हो जाएँ,
तो साम्प्रदायिकता से छुटकारा मिल जाए,
क्यों कि तब हर् पति पूजा घर में पत्नी का चित्र लगाएगा,
देश से जाति,रंग,मजहब का भेद भाव जड़ से खत्म हो जाएगा,
मेरे ह्रदय में पत्नी के लिए अंध भक्ति है,
हमारे विचार से बीबी ही दुनियां की सर्वोच्च शक्ति है,
इसलिए दहेज ले कर अपना मत गिराइये दाम,
दुनियां भर की पत्नियों को मेरा शत शत प्रणाम....मेरा शत शत प्रणाम....

शनिवार, 5 मार्च 2011

अंग्रेजी में हगीस हिंदी में हगास....

मेरा स्वयम का अनुभव है, आप भी देखें...

कई दिवसों के बाद आज फिर से मेरे मष्तिष्क में,
कुछ खुराफाती विचार नो एंट्री में घुसे ट्रक कि तरह घुसे,
पहले तो हम मन ही मन हँसे,
फिर लगा विषय तो है ये बहुत ही गहरा,
अचानक ब्रेक लगी खुराफाती ट्रक ठहरा,
पर ये हगास बहुत ही अजीब है,
इस पर चर्चा न करना  हमारी तहजीब है,
हम छोड़ नहीं सकते इतनी अहम् बात को,
मुश्किल में पड़ जाते है जब लग जाती है रात को,
शीत ऋतू में बिस्तर का मोह,
ऊपर से निद्रा का विछोह,
पर लगे होने कि मजबूरी,
नहीं करने देती निद्रा पूरी,
सबसे पहले हम कसमसाते है,
थोड़ी देर बाद उहापोह में खुद को पाते है,
फिर दर्द बढ़ता जाता है,
कुछ भी समझ नहीं आता है,
हगास न आए तो होती है बड़ी पीड़ा,
बिना हगे नहीं जी सकता कोई कीड़ा,
कुछ लोग बैठ के है करते,
कुछ लोग बैठने से है डरते,
चेहरा देखिये उस आदमी का गौर से,
जिसको टट्टी लगी हो जोर से,
मौका न मिल रहा हो करने का ,
ऐसे में मन करता है मरने का,
बेचैनी सी छा जाती है,
जब मुहं के पास आ जाती है,
अब निकली कि तब निकली,
अनियंत्रित हो जाती पगली,
बढ़ जाए दूरी यदि घर की,
डर लगा ही रहता अब सरकी,
तब मार चिमोटा भाग चलो,
घर खुला मिले उसमे घुस लो,

फिर परम शांति को करो प्राप्त,
उदर शूल जो है व्याप्त,
लम्बी लम्बी सांसे ले कर,
उदर के ऊपर कर रख कर,
नेत्र बंद हो कर गुम सुम,
याद करो फिर प्रभु को तुम,
बहुत बुरी इसकी है बॉस,
एकबार में न निकले तो बार बार सब करो प्रयास,
मेरा तो बस यही है अनुभव,
खूब हगो जितना हो संभव,...........


शनिवार, 26 फ़रवरी 2011

कुछ इधर की कुछ उधर की....

कल चेहरों की पुस्तक के माध्यम से थोड़ी देर के लिए अपने साहब श्री अनूप शुक्ला जी से वार्तालाप करने का सुयोग प्राप्त हुआ, मै तो ऐसे अवसरों को रिश्वत की तरह ही मानता हूँ क्यों की रिश्वत भी हर् ऐरे गैरे को नहीं मिलती,
एरों में तो हम पहले भी कभी नहीं रहे और गैर मै स्वयं को मानने से इंकार करता हूँ,
बात करने की कला भी अब अबला नहीं रही काफी परिष्कृत हो चुकी है और इसी परिष्कृत कला का परिचय साहब से बात करते समय मुझे प्राप्त हुआ, हो सकता है ये मेरी अज्ञानता हो या उनकी अत्यधिक व्यस्तता के कारण मुझे ऐसा लगा और जो कुछ भी मुझे लगा उसे मै यहाँ टीपे दे रहा हूँ,क्यों की इतने अदम्य साहस को प्रदर्शित करने की छमता मेरे भीतर नहीं है की जो कुछ मै यहाँ लिख रहा हूँ उसे अपने जबड़े से साहब के सामने निकाल सकूँ, इसलिए वार्तालाप का आंशिक अंश यहाँ प्रस्तुत कर रहा हूँ,
मै:-सर जी नमस्ते
 सर:- नमस्ते
सर:- क्या हाल है
मै:- सब आपका आशीर्वाद है
सर:- कुछ नया नहीं लिखा
मै:- कुछ दिनों से अत्यधिक व्यस्त था इस कारण से नहीं लिख सका
सर:- ठीक
मै:- जल्दी ही लिखूंगा
सर:- सही
मै:- अगर आप व्यस्त हों तो मुझे छमा करें
सर:- ठीक
मै:- आपने तो मुझे बहुतखूब समझाया परन्तु बहुत कुछ मेरी समझ में नहीं आया
सर:- सही
मै:- फिर से उसी सुयोग्य अवसर का बेसब्री से इंतजार कर रहा हूँ
सर:- ठीक  ..........सर जी ऑफ लाइन हो जाते है
मै:- शुभरात्रि सर जी
सर:- शुभरात्रि...
लिखना तो बहुत कुछ चाहता था किन्तु,
केस्को की कृपा से अंधेर हो गई है इसलिए बांकी फिर कभी.........

शुक्रवार, 25 फ़रवरी 2011

शिकार....

साहित्य की राजनीति के लिए...


कविता भी होती आज राजनीती का शिकार,

लेखनी भी कर रही शब्दों में फर्क है,

शीला और मुन्नी को तवज्जो दे रहे है लोग,

इसीलिए आज कविता का बेडा गर्क है,

जिसको भी देखिये पहुंचे हुए है कवी सब,


कवी कवी में तो था ही मंच में भी फर्क है,


कोई हास्य व्यंगकार कोई गीतकार है,


कोई न्यायाधीश बनकर बैठा है ये तर्क है,


चाटुकारिता का है व्यापक यहाँ प्रभाव,


स्वाभिमानी कवी के लिए सबसे बड़ा नर्क है....


कर रहा फिर भी मै ईमानदारी से प्रयास,

सादे सरल शब्द हैं ना चांदी का वर्क है.......

रविवार, 20 फ़रवरी 2011

कवि का दर्द....

आज कविता के  भी छेत्र में बहुत राजनीति है,
फिर भी क्या कहूँ मित्रों हमको इससे प्रीति है,
सारी उम्र लिख लिख के फाड़ते कागज रहे,
कवी हम कैसे बने आपसे कैसे कहे,
उल्टा सीधा सोंचते सोंच ही बदल गई,
 और किसी को नहीं पत्नी जी को खल गई,
घर के भीतर का झगडा अब तो आम हो गया,
छेत्र में कविता के फिर भी मेरा नाम हो गया,
मुसीबतें हो गई सहेली,
श्रीमती बन गई पहेली,
हाँथ रख कर गाल पे  रात दिन सोंचा किये,
बेगम के तानो को सुन कर बाल हम नोचा किये,
इस बात का प्रमाण सामने है आपके,
फिर भी कोई शक है तो सर देखिये नाप के,
खेत सारा साफ है बिना कोई श्रम किये,
युवतियां अब देखता हूँ आंख अपनी नम किये,
क्या बताऊँ हाय मेरा हाल कैसा हो गया,
सोंच कर हालत को अपनी चैन मेरा खो गया,
अब तो जाता हूँ यारो जब भी किसी मित्र घर,
कांप जाते है बड़े सब सारे बच्चे जाते डर,
कोई भी सुनता न कविता भाग जाते छोड़ घर,
घटना ऐसी जब भी होती क्रोध से जाता हू भर,
कष्ट मेरे भाई अब तो रोज बढ़ते जा रहे,
बालों के खोने कि सिल्वर जुबली हम मना रहे,
दर्द सारा पी रहा हूँ स्वाभिमान छोड़ कर,
बन के कवी जी रहा हूँ सारे रिश्ते तोड़ कर,
हम तो यारों कट गए दुनिया से सारी,
अब  तो केवल मै हूँ और  मेरी कविता है प्यारी........और मेरी कविता है प्यारी.....

                                                                                        आपका बुलबुल
                                                                                         राजेंद्र अवस्थी (कांड)

सोमवार, 7 फ़रवरी 2011

वन............


वन
वन है आज मर रहा,
निशब्द शब्द झर रहा,
भाव रस से सींच के,
सीमा रेखा खींच के,
मन में प्रेम भर रहा,....वन है आज ......
कोई कुछ भी कहे,
रुष्ट भले सब रहें,
आप का सुखद प्रयास,
मन में आस भर रहा,..........वन है आज.....
कर्तव्य तुम अपना करो,
मुसीबतों से न डरो,
अपने हांथों ही समाज
कब्र अपनी भर रहा,.............वन है आज............

शुक्रवार, 4 फ़रवरी 2011

टी. पी. एम्.

क्यों कि मै सरकारी नौकर हूँ तो स्वामीभक्ति दर्शाने के लिए ही सही चंद पंक्तियाँ लिखने का प्रयास किया है,
तो आप भी देखिये.....



जिधर भी देखो उधर हो रहा टी पी एम्,
पीछे पीछे अफसर नेता आगे आगे चल रहे जी एम्,
मस्ती में है सभी लोग कुछ लोग बहुत ही है महीन,
लम्बी वाली कलछी ले खुरच रहे यहाँ वहां जमीन,
कुछ बुरुश हाँथ में ले दौड़े,
कुछ जूट का झोंझा ले कर में,
कुछ एप्रेन खोज लगे करने,
कुछ कन्नी काट रहे डर में,
सारे अफसर जुटे हुए,
जुटा हुआ पूरा सेक्शन,
हाँथ पैर यों हिला रहे ज्यों नाच रहे माइकल जैक्सन,
चरों तरफ हड़बड़ी मची,
हो रहा जोर से घमासान,
कुछ लोग लुकैय्या देख रहे मति है जिनकी कुछ चतुर सुजान,
सब महा प्रबंधक जान रहे,
पर भोला शंकर  बने हुए,
कर्म निष्ठ कर्तव्य निष्ठ,
श्रमशील समर में डंटे हुए,
कुछ निश्चय कर मंथर गति से,
मन ही मन प्रभु का ध्यान किया,
उठा जूट झोंझा बुरुश,
टी पी एम् आरंभ किया,
अपनी ही टेबल के नीचे जो देखा मैंने प्रथम बार,
पीकदान इक रक्खा था जिसे करता था मै बहुत प्यार,
थूक थूक कर पान मसाला भरता था उसे बार बार,
खूब मुझे समझाते रहते,
मित्र मेरे सब दोस्त यार,
निश्चित मति दृढ प्रतिग्य ह्रदय कर,
उठा लिया उस पीकदान को,
टी पी एम् का समर शुरू कर दिया फेंक उस थूकदान को,
झाड़ पोंछ कर साफ किया फिर टेबल के नीचे का थल,
टी पी एम् सब मिल आज करो न जाने कब आएगा कल...
                                                                                        आपका बुलबुल
                                                                                       राजेंद्र अवस्थी (कांड)
                                 

मंगलवार, 11 जनवरी 2011

नेता......

हमारे देश में नेताओं का बड़ा महत्व है, वास्तव में इंसानों की यही सबसे ज्यादा उन्नत प्रजाति है!
और सारे संसार में ये प्रचंड प्रतिभा के साथ अपनी विभिन्न कलाओं का प्रदर्शन किया करते है,
ये हिंसक नहीं होते,और लज्जा शब्द से ये अंजान बने रहते है,अपने झूठ बोलने की विशिष्ट कला का प्रदर्शन अनावश्यक रूप से हर वक्त किया करते है,नित नए मुद्दों के माध्यम से अपने अस्तित्व का आभास पूरी दुनियां को कराते रहते है,          
इनके मुद्दों से प्रभावित हो कर कुछ पंक्तियाँ मैंने भी लिखने का प्रयास किया है जो आपके सामने प्रस्तुत है....

आज का जमाना मुद्दों का जमाना है,
सभी नेताओं के पास मुद्दों का खजाना है,
ना जाने कहाँ से ढूंढ़ कर लाते है,
मतदाताओं के मुह में दूध की बोतल के सामान लगाते है,
मुद्दों का दूध पिला कर मतदाता को जब बना देते है पहलवान,
तब सम्प्रदायकता फैला कर आपस में कुश्ती लड़वाते है,
देश की ऐसी हालत देख कर बेरोजगारों को चाहिए वो आगे आएं,
मुद्दों की दुकान खोल कर ए.राजा, आडवानी से उद्घाटन कराएँ,
देश के सबसे बड़े मुद्दा निर्माता तो यही है,
इनके मुद्दों की शान विदेशों में भी रही है,
ए.राजा ने टू जी स्पेक्ट्रम का बम फोड़ा,
आडवानी ने राम जन्म भूमि का गोला छोड़ा,
जिससे जलने लगा सारा देश,
झुलसाने लगे भारत माता के केश,
सिंकने लगी सियासी रोटियां,
विधवां हो गई न जाने कितनी बेटियां,
रोने लगी इंसानियत,
प्रतिष्ठित हो गई शैतानियत,
बेटों का फूटा सर,
मां जीते जी गई मर,
ज्यादा क्या कहूँ खूब हुआ खुनी खेल,
बंद बाजारों में डिस्काउंट पर हुई मौत की सेल,  फिर भी मुद्दों का उत्पादन जारी है,
पता नहीं भविष्य में फिर किस मुद्दे की बारी है....फिर किस मुद्दे की....फिर किस मुद्दे की......

                                                                              आपका बुलबुल...
                                                                              राजेंद्र अवस्थी ( कांड )

रविवार, 9 जनवरी 2011

भाग्य....

कल सौभाग्य से साहित्य मर्मग्य, मकेनिक्लिग्य, हमारे साहब फुरसतिया महाराज श्री अनूप शुक्ल जी से अनुभाग में ही मिलना हो गया,
कुछ देर तो मैंने सोंचा - बात करूँ के न करूँ फिर साहस बटोर कर मै उनके आगे पीछे मंडराने लगा,
इस आशा के साथ की सही मौक़ा देख कर उनसे बात कर सकूँ,
और वो मौका मुझे २६ जनवरी के इनाम की तरह मिल ही गया,
बड़ा सकुचाते हुए हमने उनको अपने ब्लॉग  हरकांड.ब्लागस्पाट.कॉम के बारे में बताया,
 तो बड़े निर्विकार भाव से उन्होंने हिंदिनी/फुरसतिया के बारे में हमसे कुछ सवाल किये,
उनके सवालों का जवाब मैंने बहुत नर्वासियाते हुए दिया,
तब मेरे ब्लॉग का पता नोट करते हुए वो हमसे बोले,
मै अभी तुम्हारा ब्लॉग देखता हूँ,
मुझे नहीं मालूम उन्होंने मेरा ब्लॉग देखा की नहीं,
परन्तु आज हिंदिनी/फुरसतिया पर उनका लेख "हादसे राह भूल जाएँगे" को पढ़ते समय मै इन चार लाइनों को संगृहीत करने से अपने को रोक नहीं पाया,

मै अपना सब गम भुला तो दूँ,
कोई अपना मुझे कहे तो सही,
हादसे राह भूल जाएँगे,
 कोई मेरे साथ चले तो सही..
                                    वजीर अंजुम साहब....

इन चार पंक्तियों के लिए मै मरहूम वजीर अंजुम साहब को और अपने साहब श्री अनूप शुक्ल जी को कोटिश धन्यवाद देता हूँ,
                                                       आपका
                                                                  बुलबुल
                                                                  राजेंद्र अवस्थी (कांड)

सोमवार, 27 दिसंबर 2010

मेरा भारत महान हो गया..

जब से मेरे देश में कांग्रेस राज हो गया,
सस्ता हो गया आदमी मंहगा प्याज हो गया,
कितनी ईमानदारी से करते है बेईमानी देखो,
भ्रष्टाचार में नंबर वन हिन्दुस्तान हो गया,
और बारिश से अब डरने लगे है लोग,
क्यों की पिछली बरसात में पूरा शहर टाइटेनिक जहाज हो गया,
दुहाई देते है सब इंसानियत की मगर,
न जाने कितने बच्चो का कत्ले आम हो गया,
सुन कर अब तालियाँ मत बजाओ लोगो,
मेरा ये पैगाम भी बदनाम हो गया,
मल्टीमिडिया सेट अब बच्चे भी रखते है जेब में,
इसीलिए तो मित्रो नेटवर्क जाम हो गया,
अब तो स्कूल में होता है बलात्कार,
ये कैसी शिक्षा का प्रचार हो गया,
कटे हांथो से देश की पकडे हो बागडोर,
तभी तो कही संसद भवन कही अक्षरधाम हो गया,
हवाओ में भी यारो घुल रहा है अब जहर,
फिर भी मेरा भारत महान हो गया..............फिर भी मेरा............

गुरुवार, 16 दिसंबर 2010

हंसी पर रोती जिन्दगी....

युवा वर्ग के अंतर्मन की व्यथा को,अनिवार्य शिक्षित होने की कथा को,    लिपिबद्ध करने का छोटा सा प्रयास....


हंसी पर रोती जिन्दगी, ये कैसी समाज की दरिंदगी, बच्चो का खोता जा रहा है बचपन, हर किसी में ढूंढते है अपनापन, मै इसी तरह का कुछ लिखने वाला था, अंतर्मन में दुविधाओ को पाला  था, पर जिन्दगी रोते हुए भी हंसती है, समय की कसौटी पर हर एक को कसती है, और आंकड़ो के साथ अपनी हर बात प्रस्तुत करती है, मै भी कुछ आंकड़े आप के सामने ला रहा हूँ कृपया ध्यान दे,                          (  परीक्षाओ में फेल होने के मुख्य कारण ) सीधा जवाब है -:  १ वर्ष के ३६५ दिन होते है, रोज ८ घंटे सोने के यानि पूरे साल के १२२ दिन ३६५-१२२=२४३ दीपावली अन्य त्यौहार आदि तथा गर्मियों की छट्टियों के दिन-: ६१    २४३-६१=१८२ दिन, उसमे भी ५२ रविवार १८२-५२=१३० दिन, आकस्मिक और स्कूली त्यौहार के ४० और व्यक्तिगत १५ दिन-:   १३०-५५=७५ दिन खाने पीने नहाने के ३ घंटे के हिसाब से ४६ दिन-: ७५-४६=२९ दिन रोज के १ घंटे दोस्तों के उसके १५ दिन -: २९-१५=१४ दिन अब उसमे १० दिन तो बीमार रहते है-: १४-१०=४ दिन बचे परीक्षाओ के समय भी दूरदर्शन देखने के ३ दिन-: ४-३=१ दिन बचा मित्रो, एक साल में एक ही दिन तो जन्म दिन आता है, अब जन्म दिन में कौन पढ़ाई करे ?

मंगलवार, 14 दिसंबर 2010

महंगाई...

कल रात अपने कमरे के भीतर हम दरवाजे से लगाए हुए कान,

सुन रहे थे सड़क पर चल रहा कुत्तो का व्याख्यान,

सारे कुत्ते कई दलों में बंटे थे,

अपनी बात कहने के लिए एकदूसरे के सामने डटे थे,

सभी दिखा रहे रहे अपनी अपनी प्रभुताई,

 हर स्वान भौक भौक के कह रहा था,

हाय रे महंगाई हाय रे मांगे हाय रे महंगाई,

 विषय गंभीर था, आगे सुनने के लिए मै भी अधीर था,

जैसे ही मेरी जिज्ञासा ने जोर पकड़ा,

बाहर एक ताकतवर कुत्ता मरियल कुत्ते पे अकडा,

 चुप बैठ एक्सरे फिल्म,

 नहीं है तुझे किसी बात का इल्म,

 पूरा देश महंगाई की आग में जल रहा है,

 और तू यहाँ खाली बातो की पूरियां तल रहा है,

 कहते है लोग भारत देश है महान,

 कभी हुए थे यहाँ राम कृष्ण और टीपू सुलतान,

 कभी था अपने देश की संस्क्रति का बोलबाला,

 पर आज है चारा स्टंप और खाद्द सामग्री घोटाला,

 पेट्रोल की कीमत हो रही है केसर जैसी,

औ इंजेक्सन लगवा के दूध दे रही है आज भैसी,

  अब तो खूब बिक रहा है ब्रांडेड आटा,

ट्रक और कार बेचते बेचते नमक बेचने लगे टाटा, ,

तुम सबको दोना चाटने की पड़ी है,

 और आज भारत माता तबाही की कगार पर खड़ी है,

 कुत्तों के सुन विद्द्वता पूर्ण विचार,

मेरे ह्रदय में हुआ क्रांति का संचार,

कोने में रखा डंडा हमने चुपके से उठाया,

और डंडे के बल पर कुत्तो को इंसानियत का परिचय करवाया,

लौट कर अपने कमरे के भीतर लेते हुए अंगड़ाई,

मैंने भी नारा लगाया वाह री महंगाई वाह री महंगाई वाह री महंगाई,                                                                                          आप सबका                                                                                   राजेंद्र अवस्थी (कांड)