शनिवार, 20 जून 2015

अस्तित्व

तुमको पास ना देख दूरी का अहसास हुआ, भले ही ह्रदय मे रुधिर की तरह उपस्थित हो, पर श्वेत कणिकाएँ कुछ कम हो चली हैं, यादों का सिलसिला श्वांस की तरह हो गया है, हाँ जब बिजली नहीं आती,तब तुम्हारे पास ना होने का अहसास दम घोटता हुआ सा लगता है, अधेरे मे तुम नज़र आने लगती हो कल्पनाओं मे, और मै ढ़ेर सारी बातें कर जाता हूँ तुमसे, वास्तव मे मुझे पता होता है कि तुम नही हो, अंधेरा कर गई रोशनी की तरह, लेकिन तुम्हारी अंधेरे की सौगात मुझे पसंद है, मुझे पता है ये भी कि जब तुम आओगी, तो रोशनी आयेगी मेरे कमरे में, जब तुम आओगी तो ज़मीन आवाज़ देगी, तुम्हारे आने की, जब तुम आओगी तो चंदन की महक भी आयेगी तुम्हारे साथ, जब तुम आओगी तो मेरा अस्तित्व भी अस्तित्व मे आयेगा, अरे..अस्तित्व हीन जीवन!!!!!!!!! क्या गज़ब का परिहास है, चलो कुछ तो है परिहास ही सही, पर है तो सही जीवन बिना अस्तित्व के भी, क्यों कि,मेरा अस्तित्व तो तुम्ही हो, क्यों कि, मेरा अस्तित्व तो तुम्ही हो..

शनिवार, 2 मई 2015

दिल की बात - 3..

कुछ सत्य - कडवे सच

1. भारत दुनिया का एकमात्र ऐसा देश है, जो अपने देश में बैठे गद्दारों पर कोई कार्यवाही नहीं करता....

2. भारत दुनिया का एकमात्र ऐसा देश है. जहाँ अल्पसंख्यक समुदाय बहुसंख्यक समुदाय पर अत्याचार करता है....

3. भारत दुनिया का एकमात्र ऐसा देश है. जिसमें सरहद पर तैनात सिपाही को एकसाल तक छुट्टी नहीं मिलती. लेकिन जेल में बंद संजय दत्त को हर 2 महीने पैरोल पर छुट्टी मिल जाती है.....

4. भारत दुनिया का ऐसा देश है, जहाँ लाखों अरबो का घोटाला करने वाले आजाद घूमते है. लेकिन जिस पर आरोप साबित नहीं हुआ है कैंसर पीडित साध्वी को जेल मे रखते हैं।

5. भारत ऐसा देश है, जहाँ आतंकवादियों और बलात्कारियों के मानवाधिकारो के लिए लड़ने वाले मिल जाते है. लेकिन आतंकवादियों के हमलों में मरने वालों के लिए कोई मानवाधिकार की बात नहीं करता..... 

6. भारत ऐसा देश है जहां हिरन का शिकार करने पर कडी सजा का प्रावधान है लेकिन गौमाता जिसे हिन्दू मां मानते है की हत्या पर सब्सिडी दी जाती है 

7. भारत के सेकुलर नेता ऐसे है, जो आतंकवादियों को सम्मान देते है और राष्ट्रवादीयों को गालियां देते है....

. 8. भारत दुनिया का ऐसा देश है, जहाँ बाहरी घुसपैठियों का घर बैठे राशन कार्ड और वोटर कार्ड बन जाते है. लेकिन इन सब के लिए चक्कर काटते काटते देश के आम नागरिक की चप्पल घिस जाती है......

9. भारत दुनिया का ऐसा देश है जहां पांचवी पास आदमी एक स्कूल का चपरासी तो नही बन सकता लेकिन नेता बन सकता है ।

10. भारत दुनिया का ऐसा देश है जहां के इतिहास मे भगतसिंह को आतंकवादी और भारत पर हमला करने वाले  अकबर और सिकन्दर को महान बताया गया है।

11. भारत दुनिया का ऐसा देश है जहां 80% अंक पाने वाला बेरोजगार घूम सकता है और 40% से भी कम अंक पाने वाला आरक्षण के माध्यम से डाक्टर या जज बन सकता है...

गुरुवार, 23 अप्रैल 2015

किसान

बखत अइस भारत मा आवा किसान मरे जात हैं,
भीखियार होइगे नेता उई पिसान धरे जात है,
चकरबक्क होति खूब चउका औ चौपालन तक,
या चीखि औ पुकार सुनि लरिका डरे जात हैं,
जी आपन जी का मारि मारि देस का जियाएन है,
उई देस के किसान सब अध मरे हून जात हैं,
खेत खाली पेट खाली समुहे धरी छूँछी थाली,
गाँव छाँड़ि ज्वान सहरु नौकरी करै जात हैं,
गाँव मां रहै बाघु अस बोकरी सहरु कइ दीन्हेस,
तनखा मिली आखिरी मा भूखे पेट परै जात हैं,
महतारी सब जानि रही अजानि बनी रहति है,
दिल्ली मा हमार लरिका पेड़ ते मरै जात हैं।

रविवार, 5 अप्रैल 2015

स्वाभिमान

मौन हूँ  मैं तो यूँ समझो के बेदी अभी सजाई है,
घृत कपूर औ आमृ काष्ठ से ज्वाला बस सुलगाई है,
लोकतंत्र का हवन हमारा प्रारम्भिक चरणों में है,
सच पूँछो इतिहास सृष्टि का मेरे आचरणो मे है,
बिन देखे औ बिन जाने तुम क्या पहचान बताओगे,
हत्या को कुर्बानी कह कर कब तक लाज बचाओगे,
हम तो समझाते आये हैं तुमको सब संदर्भों में,
फिर भी आँखे मूँद रहे तुम झूठ दिखावा दर्पों में,
बने रहो नादान युँही कुर्बानी दे दो अपनी भी,
बचा नहीं ना कोई बचेगा महन्त मॉरिस मदनी भी,
अपनी बख्शी चाह रहे सल्लाहो अलैह वसल्लम से,
तुमने कब किसको बख्श़ा है अपने खूनी बल्लम से,
अभी गनीमत बाँकी है तुम बच्चों को भी मार चुके,
कॉप उठेगी कायनात यदि हम धीरज को त्याग चुके,

रचनाकार- राजेन्द्र अवस्थी.......

रविवार, 29 मार्च 2015

लाइक-कमेण्ट

वय का प्रभाव जैसे जैसे मनुष्य पर होता है उसके प्रति मोह भी घटता जाता है..
जैसी पीड़ा और दुख: छोटे बच्चे की निधन पर होती है वैसी ही पीड़ा और दुख: अस्सी या नब्बे वर्ष के मनुष्य के निधन पर नहीं होती. बल्कि मैने तो कई बार लोगो को आपस में ये भी कहते सुना है कि अच्छा हुआ ज्यादा किसी से सेवा नहीं करवाई.. हँसते खेलते चली गईं..
आभास करें तो सच में अस्सी वर्ष के वृद्ध के निधन पर बहुत कम ही लोग मिलेंगे जो शोक व्यक्त करेंगे... कई लोग तो शोक व्यक्त करने से पहले पता लगा लेते हैं कि मरने वाले की उम्र क्या थी.... मालूम होने पर कि 80 साल की थीं तो कहते हैं चलो अच्छा हुआ घिसटना नहीं पड़ा..
और यहाँ फेसबुक पर ठीक उल्टा देखा मैंने.... लोगों को मालूम रहता है कि बहुत बूढ़ी थीं . आज कल आज कल लगा हुआ था, जमीन पर लिटा दी गई थीं....
बंदा खुश हो रहा है चलो एक और पोस्ट मिली. जल्दी से दादी के साथ सेल्फी ले कर पोस्ट कर दिया कि हमारी दादी की तबियत बहुत खराब है.. बस फिर क्या श्रद्धालुओं के लाइक और कमेन्ट धड़ाधड़ चिपकने लगे.. भगवान दादी को जल्दी स्वस्थ करें, ईश्वर सब अच्छा करेगे,धैर्य धारण कीजिये..
अब कोई पूछे कि धैर्य होता तो दादी के स्वास्थ की फिक्र करते ,टेंशन तो लाइक और कमेन्ट की हो रही है..जहाँ पोस्ट पुरानी होने लगी फौरन खुद एक कमेन्ट मार दिया..आज दादी ने आँखे खोली.. पोस्ट फिर से नया हो गया.. फिर लाइक कमेन्ट की रेलमपेल शुरू.. पोस्ट देखते देखते देखा कि दादी तो सच में आँखे खोले हुए हैं.. खुशी से चहकते हुए फौरन दादी को बता दिया....दादी आपकी  तबियत खराब सुन के डेढ़सौ लोगों ने कमेन्ट किया और तीन सौ लोगों ने लाइक मारा.. दादी ने आँखे बंद कर ली हमेशा के लिये....ये देखते ही बंदा उछल पड़ा आधी खुशी आधे गम का एपीसोड प्रत्यक्ष हो गया...जल्दी से पोस्ट बनाई.. मित्रों अभी अभी 9.55 पर मेरी दादी माँ का स्वर्गवास हो गया..
फिर से लोगों के लाइक और कमेन्ट आने लगे.....भगवान इस दुख: की घड़ी में आपको साहस दे और दादी की आत्मा को शांति दे, ईश्वर इस कठिन दुख: की घड़ी में आपको शक्ति दे(दादी से सम्बंधित अपडेट करने की) एक कमेन्ट में पढ़ा बंदे ने लिखा था, ईश्वर पर भरोसा रखें  (किस बात का ये नही लिखा) लोग भी जल्दी में होते हैं ,कभी कभी अधूरा ही कमेन्ट टीप देते हैं.... घर में माहौल शोकपूर्ण है और ये अपनी पोस्ट देख कर खुश होते रहते हैं....

शुक्रवार, 20 मार्च 2015

जाल..

नहीं झुरझुरी हुई थी मुझको मौसम जब था सर्द यहां
परस्त्री आकर्षण का कुत्सित खेल है कुछ मस्तिष्कों का
जो, हमदर्दी का रूपक गढ़ते, चरित्रहीन कमजर्फों का.
काँप गया था देख के पर कुछ अभिलाषी नामर्द यहाँ.
नहीं झुरझरी..
शब्द अलंकृत गहराते हैं बद्धितलिपि हो, छंदों में
परिचय पलपल बढ़ता जाता,निश्चय के सब फंदों में
इनकी तो पहचान सरल है रहती सूरत जर्द यहाँ
नहीं झुरझरी..
काम लपेटे मन के भीतर मिश्री सी रखते ये बोली
बसे हुए नैनों, स्वप्नों में, अंगिया, सुंदरि, सुंदरि चोली.
ऐसी सभी कुसंस्कृत शै को करना है बेपर्द यहाँ.
नहीं झुरझुरी...

मंगलवार, 17 मार्च 2015

आज का जीना..

वो डरता है अपनी बड़ी होती बच्ची को देख कर..
या यूँ कहें कि वो डरता है औरत देख कर,
अकेला छोड़ कर जब भी वो बाहर जाता हैं,
साथ ले कर जाता हैं सिर्फ डर,
घर में रह जाती है अकेली,
बच्चियों के साथ,
कलमा पढ़ती आरज़ू,
उसके घर से निकलते ही,
जां नमाज़ बिछ जाती है,
बच्चियाँ भी बैठ जाती हैं पास में,
आँगन में कोई चिडिया भी,
सरगोश़ी करती है,
तो उसे ताला बंद मिलता है दरवाजे पर,
कोई झरोखा नहीं,
जिससे आरज़ू को रोशनी दिख जाये,
बच्चियों को भी रोशनी चाहिये,
बच्चियाँ चुपचाप देखती रहती हैं,
कलमा पढ़ती अम्मी को,
कोई शरारती सिपाही,
ताले को हिला देता है,
जोर से,
कि शायद कोई चीख़,
सुनाई दे जाये उसे,
कमरे में बच्चियों का मुँह,
गोद में छुपा लेती है आरज़ू,
मेरे मौला मेरे मालिक,
आवाज़ सुनती हैं बच्चियाँ,
सीख जाती हैं बच्चियाँ,
अपना सिर ढापना,
खाना बनाना,
बर्तन धोना,
चुपचाप अँधेरे कमरे में रहना,
और इंतज़ार करना अब्बा का,
ताला खुलने की आवाज़,
धड़कन रोक देती है,
साँस भूल जाती है भूँख भी,
जल्दी से अंदर आ कर,
अब्बास खुश हो लेता है,
आज के लिये जीना हो गया।

बुधवार, 11 मार्च 2015

रंगीलो म्हारो कानपुर..

कानपुर का आलम देखो बरस रही है मस्ती,
सभी दिवाने हुए खड़े है चाहे जो हो हस्ती,
रंगरलियों की बात करें क्या हवा हुई रंगीन,
हुल्लड़ धूम तमाशा हो चाहे आग लगी हो बस्ती।

मनु होय त कम्पू घूमि जाओ,
भीड़ भड़क्का रेलम पेला,
मोटर टम्पू खड़खड़ ठेला,
चाट पकउड़ी सेब औ केला,
चम्प चमेली केतकी बेला,
भगवत भूमि का चूमि जाओ,
मनु होय त कम्पू घूमि जाओ,

खुरपी फरुहा काँटा कीला,
लाल गुलाबी नीला पीला,
भंग तरंगं हैं छैल छबीला,
खड़खड़ गढ्ढा अड्डी टीला,
ठग्गू के लड्डू चिउरा चीला,
अब होरी के रंग मा झूमि जाओ,
मनु होय त कम्पू घूमि जाओ,

आला माला कान कै बाला,
स्थित प्रयागनरायन शिवाला,
हटिया कै खटिया बक्सा ताला,
नये गंज के मोटे लाला,
अखबारन मा अमर उजाला,
देखि बुनाई हैण्डलूमि जाओ,
मनु होय त कम्पू घूमि जाओ।

रचनाकार-राजेन्द्र अवस्थी....

सोमवार, 16 फ़रवरी 2015

मान्यता...


घुमक्कड़ी प्रवृत्ति कहाँ ले जाए कुछ पता नही होता.....बड़ा नाम सुना था चूड़ेश्वर महादेव जी का गंजमुरादाबाद से दाहिनी ओर मुड़ कर करीब 4 किलोमीटर पैदल चल कर मैं पहुँचा फूलगढ़ गाँव (फुलई) इसी गाँव में स्थित हैं भगवान चूड़ेश्वर महादेव जी का भव्य मंदिर....ये परकोटा शैली में हैं और लगभग 1850 ईस्वी में निर्मित किया गया है...चूँ कि ये स्वर्गीय पण्डित हुलास रॉय तिवारी और उनके अनुज स्वर्गीय लक्ष्मन प्रसाद तिवारी जी सानिध्य में बनवाया गया था अत: आज भी उन्ही परिवार के लोगों द्वारा मंदिर की देखभाल और रखरखाव किया जाता है..
मंदिर से इस परिवार की कुछ कृषि योग्य भूमि जोड़ दी गई है....
लगभग दो फुट चौड़ी एक दीवार से मंदिर चारो ओर से घिरा हुआ है. चारो कोनो पर एक एक अष्टभुजाकार चबूतरा बना है..मंदिर में पुजारी जी के निवास की अति उत्तम व्यवस्था है.... मंदिर के अंदर विशालाकार में भगवान शिव जी प्रतीक लिंग रूप में विराजमान हैं..भगवान के सम्मुख ही नंन्दी जी विनम्र स्वरूप में अवस्थित हैं.....मंदिर के साथ ही एक तालाब का भी निर्माण कराया गया था जिसे अब गाँव







 के लोगों नें पाटना शुरू कर दिया है.....मंदिर की जमीन और आस पास की जमीन पर भी कुछ दबंग लोगों नें कब्जा करना प्रारम्भ कर दिया जिससे मंदिर का मूल स्वरूप भी प्रभावित हो रहा है.......

गुरुवार, 12 फ़रवरी 2015

ओ री होरी..



होरी है सिर पर ठाढ़ी,
मैं का करौं गुइयाँ,

पेड़न से जबसे महुआ चुवत है,
पुरवा हवा मोरी देही छुवत है,
जियरा मा धुक धुकी बाढ़ी, 
मैं का करौं गुइयाँ,
होरी है सिर पर ठाढ़ी, मैं का करौं गुइयाँ,

सपनेहु साजन लोरी सुनावैं,
बातन हमका दुनिया देखावैं,
गाले मा जब चुभी दाढ़ी,
मै का करौं गुइयाँ,
होरी है सिर पर ठाढ़ी, मैं का करौं गुइयाँ,

पाँव धरनि पर ना धरै देवैं,
पल पल हमका गोदी लेवैं,
लाज बहुत है गाढ़ी,
मै का करौं गुइयाँ,
होरी है सिर पर ठाढ़ी,मैं का करौं गुइयाँ।

गुरुवार, 29 जनवरी 2015

प्रियतमा..

बढ़ जाता स्पंदन हिय का पास तुम्हारे आने से,
थमती धड़कन रुकती सांसे दूर तुम्हारे जाने से,

दीवानापन तो ऐसा के दिन में ख्वाब तुम्हारे है,
राते आँखों में कटती हैं यादों से हम हारे हैं,

कल्पित से लगते हैं पल जो साथ गुज़ारे हैं,
साथ नहीं हैं फिर भी लगता हम तो संग तुम्हारे हैं,

रोम रोम रोमान्चित होता आज भी जब हम मिलते है,
यादों की गनतरिया हम तुम दोनो मिल कर सिलते हैं,

बिलकुल तुम ना बदली हो आज भी हो वैसी की वैसी,
फागुन, सावन, चाट बताशे, औ चूड़ी कंगन के जैसी,

व्यक्त् करूँ मै नेह को कैसे अर्पित जीवन सारा है,
सुख दुख हँसना रोना सोना सब कुछ तुम पे वारा है....


.प्रियतमा....

बुधवार, 28 जनवरी 2015

कानपुर की प्राचीन विरासत..

यूँ तो काम से फुर्सत मिलती नहीं और यदि मिलती भी है तो अब फुर्सत से रहने की चाह नहीं रह गई..छ्याशठवें गणतंत्र दिवस का अवकाश मेरे लिये घूमने का सुअवसर ले कर आया..
सवेरे से इंद्रदेव का सुंदर प्रस्तुतीकरण लगातार जारी था ...यात्रा के लिये हमने अपने बैग में बरसाती,टार्च,टूटने वाला छाता,एक गिलास और प्लेट साथ ही बिस्किट और नमकीन रख ली थी...
दस बजे से हम तैयार हो कर बैठे और पानी बंद होने का इंतजार कर रहे थे....भगवान की कृपा से ग्यारह बजे पानी बरसना बंद हुआ तो श्रीमती जी ने एहतियातन समझाया कि, हो सके तो आज का प्रोग्राम कैंसिल कर दिया जाय क्योंकि सड़कों पर फिसलन होगी और हम जहाँ जा रहे थे वहाँ पता नहीं सड़के कैसी हों....लेकिन हम ना माने और बेटे से बाइक निकालने को कहा..खैर किसी तरह महामृत्युंजय मंत्र का जाप करते हुए यात्रा प्रारम्भ की.... ईधन टैंक फुल करा लिया और गूगल मैप के सहारे भीतरगाँव में स्थित गुप्तकालीन मंदिर की ओर चल पड़े. पानी बरसने के कारण जगह जगह गढ्ढों में जलभराव और सड़क पर कीचड़ का अनुपम सुयोग बाइक के साथ ही मेरे कपड़ों पर भी विचित्र चित्रकारी कर रहा था फिर भी ना जाने क्यों आज ये बुरा नहीं लग रहा था. गणतंत्र दिवस होने के कारण सड़कों पर अधिक भीड़ भी नहीं थी रमइपुर से मेरी मंजिल के लिये रास्ता बाँई ओर को घूम रहा था लेकिन अति आत्मविश्वास से लबरेज सोंचा कि हम सही रास्ते पर हैं और पत्नी जी की सलाह भी ठुकरा दी कि मैप में एक बार देख लो...इसका नतीजा ये हुआ कि हम रमईपुर से आगे बढ़ते चले गये और जब बिधनू पहुँचे तब पता चला कि हम पाँच किलोमीटर व्यर्थ में आगे आ गये हैं....कभी कभी आगे होना भी तकलीफ देता है...  अभी तक दो जगह गूगलमैप देखना पड़ा था...बिधनू में एक होटल पर हल्का जलपान किया और वापस रमईपुर की ओर चल दिये....चार किलोमीटर चलने के बाद भीतरगाँव का रुख किया और मुख्य सड़क से करीब आठ किलोमीटर अंदर चलने के बाद भीतरगाँव के बाजार से होते हुए जैसे ही पहला मोड़ दाहिनी तरफ घूमे तो हम अवाक रह गये...




सातवी आठवीं शती का ये मंदिर वर्गाकार स्थान पर बना हुआ है। वर्ग के कोने, एक छोड़कर एक, इस प्रकार से बने हैं,  और मध्य में 15 वर्ग फुट का एक गर्भगृह तथा उसके साथ एक 7 वर्ग फुट का मण्डप है। दोनों के बीच एक मार्ग है। गर्भगृह के ऊपर एक वेश्म है जिसका क्षेत्र नीचे के कक्ष से लगभग आधा है। 1850 ई. में ऊपरी भाग की छत बिजली गिरने से नष्ट हो गई थी। स्थूल दीवारों के बाह्य भाग पर आयताकार घेरों में सुन्दर मूर्तिकारी अंकन है। ये मूर्तियाँ पकी हुई मिट्टी की बनी हैं। मन्दिर में अनेक सुन्दर अलंकरणों का प्रदर्शन किया गया है। 



किंतु इसके रखरखाव पर कोई विशेष ध्यान ना दिये जाने से आबादी के बीच मंदिर कहीं खो सा गया है...कभी कभी लोग पिकनिक मनाने के उद्येश्य से इसके पार्क में चले आते हैं.. ये तो गुप्तकालीन इष्टिका मंदिर का प्रसंग था..इस मंदिर का संरक्षक नियुक्त किये गये श्री साही जी से मालूम हुआ ग्राम बुजुर्ग बेहटा में स्थित भगवान जगन्नाथ जी के प्राचीन मंदिर के बारे में अब तो ह्रदय में जिज्ञासा हिलोरे लेने लगी और मन भगवान के दर्शनों के लिये व्याकुल हो उठा...लगभग एक घण्टे का सफर कर के हम भगवान जगन्नाथ जी के दरबार में थे..



किंतु.. मंदिर की दशा देख कर बेहद अफसोस हुआ...पुरातत्व विभाग द्वारा संरक्षित ये प्राचीन मंदिर अपनी खंडित हो चुकी उत्कृष्ट मूर्तियो और टूटे हुए अलंकृत स्तम्भों के साथ अपनी विशिष्ट बनावट को समेटे गवाही देता सा जान पड़ता है कि कम से कम ये एक हजार वर्ष पुराना तो अवश्य ही होगा....दुख: इस बात का भी है कि संरक्षित स्मारक घोषित होने के बावजूद भी पुरातत्व विभाग की ओर से मंदिर के सम्बंध में कोई जानकारी उपलब्ध नहीं कराई गई है......हाँ पुरातत्व विभाग ने इस मंदिर के चबूतरे की मरम्मत करवाने के साथ ही प्रकाश के लिये एक सौर सिस्टम की व्यवस्था अवश्य कर दी है लेकिन ये प्रकाश व्यवस्था दिन में भी मंदिर के अंदर व्याप्त अंधकार को दूर करने के लिये नहीं है..मरम्मत के बाद मंदिर का मुख्य द्वार आदमकद जरूर हो गया है लेकिन जो प्राचीन मुख्यद्वार है वो लगभग तीन फुट ऊँचा और दो फुट चौड़ा है जिससे पूरी तरह झुक कर जाने पर ही भगवान के दर्शन किये जा सकते हैं..मंदिर के अंदर भगवान जगन्नाथ जी की विशाल प्राचीन मूर्ति स्थापित है और जिस पत्थर पर भगवान की मूर्ति है उसी पत्थर पर दाँये बाँये खंडित मूर्तियाँ भी उकेरी हुई हैं... मंदिर के गर्भगृह में दिन में भी अंधेरा छाया रहता है और इसी गर्भगृह में ही ऊपर एक चमत्कारी पत्थर स्थित है जिसे यहां के लोग मानसून पत्थर कहते हैं ..रहस्य को समेटे ये पत्थर मानसून आने की सूचना पंद्रह दिन पूर्व ही दे देता है, मानसून आने से पंद्रह दिन पूर्व ही इस पत्थर से बूँद बूँद पानी टपकने लगता है वाकई ये एक अनसुलझा रहस्य है...मंदिर के गर्भगृह के दोनों ओर बनी छोटी छोटी कोठरियों में भगवान विष्णु की प्रतिमा है, इन्हीं में से एक में पुरावशेषों के ढेर हैं....गाँव में कुछ महिलाएं ही दिखी उनसे बात की तो उन्होने बताया कि इस मंदिर के आस पास खुदाई की जाय तो और भी प्राचीन वस्तुएं प्राप्त हो सकती हैं...
बड़े अफसोस की बात है कि कानपुर में प्रति वर्ष भगवान जगन्नाथ जी मण्डल के द्वारा रथयात्रा का आयोजन किया जाता है...कितना बेहतर हो कि इस प्राचीन मंदिर के देखभाल की जिम्मेदारी जगन्नाथ जी मण्डल सम्हाल ले... 

शुक्रवार, 21 नवंबर 2014

हँसी

मेरे बच्चे हर बात में हँसी खोज लेते हैं,
जैसे फूल काँटों में भी खुशी खोज लेते हैं,

भूल जाते हैं हर बात जो चुभती हो कहीं,
ऐसी हर बात में नाखुशी खोज लेते हैं,
मेरे बच्चे हर बात में हँसी.................

सितम भी सह ले जो हँस कर जमाने के,
ऐसी कोई मासूम दिलकशी खोज लेते हैं,
मेरे बच्चे हर बात में हँसी...................

मेरे घर में सहमे नही रहते बच्चे हमसे,
वो मुझमें ही कोई हमनशीं खोज लेते हैं,
मेरे बच्चे हर बात में हँसी....................

बड़े प्यारे हैं बच्चे मेरे जरा सादा से हैं,
हर रंग में खुशबू - ए-गुलाब सी खोज लेते है,
मेरे बच्चे हर बात में हँसी.....................

मंगलवार, 18 नवंबर 2014

फेरा..

छोड़ दो फेरा ग्रहों का तुम शनि के घर में हो,
शांति की हो बात कैसे आत्मा जब डर में हो,
खोजते हो रास्ते पर खो चुकी उम्मीद को,
चमक से लुट जाओगे चोरों के शहर में हो,
पालते हो स्वप्न क्यों स्वाभिमानी चैन के,
आँसुओं से है जो गीला तुम उसी बिस्तर में हो,
पेट भर खाना जुगाड़ो बेशरम बन कर रहो,
फिर तराजू ले के बैठो तुम उसी स्तर में हो,
पीठ पर थपकी यहाँ पर मुफ्त में मिल जायेगी,
मिलती हैं मीठी बोलियां फ्री तुम उसी के दर में हो,
पत्नी तो पल पल प्रश्न करती ही रहेगी शान से,
शुक्र है घर पर नहीं तुम आज भी दफ्तर में हो।

भाई-भाई

भाई-भाई..

तुमने खूब सवाल किये हैं,
हमने अपने होंठ सिंये हैं,
कातर आँखें पलक झपकती,
साथ ये कैसा अलग जिये हैं,

हरदम करते हो मनमानी,
फिर कहते हो गई नादानी,
तर्क कुतर्कों से करते हो,
हर हरकत की खैरमख्वानी,

जी भर जाये जब जिद्दों से,
ना रहना फिर शरमिंदो से,
कर लेना तुम सोंच को व्यापक,
दुनियाँ भरी हुई गिद्धों से,

तुमने खूब सवाल किये हैं,
हमने अपने होंठ सियें हैं,
इसी तरह बचपन से अबतक,
हम तुम दोनो साथ जिये हैं।

गीत- करवाचौथ-हुदहुद..

चाँद निकल आया जो छत पर चढ कर आई तुम,
लाज के मारे तारे छुप गये हो गये सब गुमसुम,
सुर्ख सुहानी चूनर तेरी यूँ लहराती है,
जैसे कोई गुड़िया अपने घर को जाती है,
नेह का अम्बर ओढ़े सिर पर जो मुस्काईं तुम,
लाज के मारे तारे छुप गये हो गये सब गुमसुम,
सजना तेरा सजनी साजन को बहलाता है,
बिंदिया काजल टीका गीत मिलन के गाता है,
तेरे पैरों में पायल गोरी यूँ इतराती है,
निर्मल कोई धार नदी की कल कल गाती है,
प्रेम सुधा का प्याला भर छलकाती आईं तुम,
लाज के मारे तारे छुप गये हो गये सब गुमसुम,
चाँद निकल आया जो छत पर चढ कर आई तुम,










बैरी हुदहुद का कम्पू में जब से हुआ है आना,
दिल बेइमान हुआ है मेरा मौसम हुआ सुहाना।

वसंत..

वसंत तुम क्यों आ जाते हो,
गीत निर्मल नेह का,
तुम क्यों सुनाते हो,
वसंत तुम क्यों......

अवरुद्ध होता ह्रदय कम्पन,
सुरभि सुरभित नेह ये मन,
प्रकृति का मेला धरा पर,
उत्फुल लगाते हो,
वसंत तुम क्यों आ जाते हो...

नव चेतना भरते धरा में,
व्यापते जर औ जरा में,
नापते हो दृष्टि के सुख,
विरहन को तपाते हो,
वसंत तुम क्यों आ जाते हो......

प्रकृति के रंगीन झरने,
मन मनोहर विपुल सपने,
भ्रमर कलियों के ह्रदय,
तुम क्यों रिझाते हो,
वसंत तुम क्योंआ जाते हो......

स्वार्थी

हमने कुछ नहीं किया तुम्हारे लिये,
हम तो अपने हाँथ के छालों को देखते रहे,
सहेजते रहे दर्द का एक एक कण,
जिससे मेरे साथ के लोग खुश रहे हर क्षण,
भावुकता का हास जारी रहा अंतस में,
संवेदनाएं पीछे छूटती रहीं हरदम,
हम खुशियों की चाहत में भागते रहे,
भीड़ में अकेले प्रकाश को छोड़ कर,
एकत्रित भी हुआ था बहुत कुछ सबके लिये,
उस "सब" में शायद मैं कभी फिट ना हो सका,
अभी भी नही हूँ और दौड़ रहा हूँ,
भीड़ में अकेले असहाय,
आज भी मै बता नही सकता,
मैने क्या किया तुम्हारे लिये,
वाकई मर्जी मेरी थी और आज भी है,
सर्वशक्तिमान की प्रेरणा निहित है,
कुछ भी होने में कुछ भी करने में,
समय ने माध्यम चुना मुझे,
चुना सबने समय समय पर,
मुझे स्वहितार्थ सप्रयोजन,
बस मैं बता नहीं सकता कि,
मैने क्या किया किसी के लिये,

जहरीला धुआँ

पीला है पका है ऊपर से टपका हुआ है,
जो चमका एक बार वो चपका हुआ है।

वाह वाह का शोर सुन के न रहना भरम में,
ये हिंदी का साहित्य भी एक अंधा कुंआ है,

दिखती है दूर तक इंसानों की ही भीड़,
मजाल है जो दिल को किसी ने भी छुआ है,

खुद मे ही है बाँकी शराफत का सिलसिला,
सलामत रहे ता-उम्र बस ये ही दुआ है,

बड़ा किया है वक्त ने शोलों में तपा कर,
उठता हुआ जो दिखता है जहरीला धुंआ है

कविताई

प्रगति का गीत सुना हमने,
नैतिकता मचल उठी बौराई,
रोक दिया पथ शब्द तिरोहित,
हुए सभी प्रतिमा घबराई,
पहरेदार हैं हर पहलू के,
स्थितियों संग रहे दिखाई,
दिखें सलोनी गाँव की गलियाँ,
पर दिखती विरहन अमराई,
लिखा किसी ने नहीं मरण को,
वरण क्यों करती है तरुणाई,
कलप रहा है ह्रदय प्रकृति का,
नज़र ना आती है अरुणाई,
आस का श्वांस रोके ना रुके,
सृष्टि का सार है या सरिताई,
कालीदास ना हो पाये हम,
चूल्हे भाड़ गई कविताई,