मंगलवार, 8 मार्च 2011

गीत.....

किसी से प्यार करना या किसी से प्यार होना दोनों एक ही सिक्के के दो पहलू हैं,
प्यार की समीक्षा नहीं की जा सकती. प्यार का कोई पैमाना नहीं होता, प्यार की कोई तौल नहीं होती, प्यार का कोई मोल नहीं होता, प्यार कम या ज्यादा नहीं होता, प्यार केवल प्यार होता.है.
हर् व्यक्ति के जीवन में प्यार होता ही है,
आज इसी प्यार से प्रेरित हो कर बड़े प्यार से पहली बार एक प्यारा सा गीत लिखने का प्रयास किया है.......

शर्मा कर देखना तेरा,फिर झुका लेना निगाहों का,
अदा तेरी ये कत्लेआम कर देती है आहों का,
तेरी चितवन को कैसे मै नज़र अंदाज़ कर जाऊँ,
चली आओ मेरे दिल में सहारा लेलो बाँहों का,      चली आओ मेरे.........


 प्यार मुझको तो तुमसे है इश्क तुमको भी कम नहीं,
      कब से तेरी आंख गीली है मेरी आंख नम नहीं,
      खता मेरी ही है शायद तुम्हारा दोष कुछ नहीं,
       अब चर्चा आम होता है हमारी ही वफाओं का,     चली आओ मेरे...........


ज़माना याद रक्खेगा हमारी इस कहानी को,
समय बर्बाद कर देगा तुम्हारी सब जवानी को,
बांकी बस निशाँ रह जाएगा इन मस्त हवाओं का,
मेरी रगबत है बस इतनी कोई रहबर हो बागों का.    चली आओ मेरे...........


तुम्हारा अक्स दिखता है मुझे फूलों में कलियों में,
हवाएं सर्द चुभती है बदन में तेरी गलियों में,
झलक दिख जाए बस तेरी यही उम्मीद रखता हूँ,
नज़र भर देख लूँ तुमको नज़ारा हो नजारों का...       चली आओ मेरे..........



    

पत्नी भक्ति...

ये बार बार आज  आज लिखते लिखते बोर हो गया हूँ किन्तु क्या करूँ लिखना तो यही पड़ेगा कि आज फिर कुछ लिखने का मन किया तो लिखने बैठ गया, मन को मारना भी उचित नहीं जान पड़ता, उचित अनुचित क्या मन को मारा ही नहीं जा सकता अगर मारा जा चुका होता तो आदरणीय धर्मराज युधिष्ठिर यक्ष से न कहते कि मन ही सबसे ज्यादा गतिवान होता है,
शायद मै राह भटक गया, क्यों कि शीर्षक "पत्नी भक्ति" लिखने के बाद मन को ले कर बैठ गया,
कोई बात नहीं देर आए दुरुस्त आए......वास्तव में पत्नी की शक्ति, धैर्य और उनकी क्षमताओं को नकार पाना किसी के बस में नहीं है..मेरे भी नहीं..क्यों कि एक देवी साक्षात् मेरे घर के मंदिर में प्रतिष्ठित है,और मै पूरे मनोयोग एवं तन,मन,धन से देवी की उपासना करने में तल्लीन रहता हूँ,
प्रतिपल मेरी भक्ति में कोई भूल न रह जाए इस डर से भयभीत रहता हूँ,..ये रचना मै दुनियां की सभी पत्नियों को समर्पित करता हूँ...


आज कल हम लोग पत्नी युग में जी रहे है,
उन्ही का दिया हुआ खा पी रहे है,
इस युग में पत्नी भक्ति बहुत जरुरी है,
बिना भार्या भक्ति के जिंदगी अधूरी है,
यूँ तो मेरे जैसे श्रद्धालु बहुत मिल जायेंगे,
आप एक्सरे निगाहों से देखेंगे तो कई पत्नी भक्त पाएंगे,
कवि होने के साथ सरकारी कर्मचारी हूँ,
पहले माता पिता का था अब पत्नी का आज्ञाकारी हूँ,
 हमारी पत्नी का स्वभाव बड़ा नरम है,
उनके समक्ष मौन रहना मेरा मुख्य धरम है,
प्रातः काल बेड टी देना मेरी नित्य क्रिया का हिस्सा है,
आगे का हांल सुनिए एक रोज का किस्सा है,
दफ्तर से शाम को घर आया तो पत्नी को नदारद पाया,
किसी बात पर नाराज हो मायके चली गयी थी,
अपने तीन प्रतिनिधि मेरे पास छोड़ गयी थी,
बेटे से पूछा,चंदू मम्मी क्या अभी से सो गयीं
चंदू बोला वो तो नानी के यहाँ गयीं,
फिर तो मै अपने आप को कोसने लगा,
क्या गलती हो गयी इस विषय में सोचने लगा,
दाल में नमक तो बिलकुल सही था,
कही छोला ज्यादा कड़वा तो नहीं था,
मैंने चाय भी नहीं पी थी पर उनको जरुर दी थी,
ना जाने क्या बात हो गयी,
जो अपनी एक क्षत्रछाया से मुझे वंचित कर गयीं,
इसी उलझन में फंसा हुआ,गले तक पत्नी प्रेम में धंसा हुआ,
पहुच गया ससुराल,ससुर ने देखते ही पूछा हालचाल,
मैंने कहा बाकी तो सब ठीक है,
परेशानी केवल एक है,
आपकी बेटी का मूड पाकिस्तानी प्रधानमन्त्री की तरह उखड़ा हुआ है,
जबकि हाल ही में हमारे बीच जिनेवा समझौता हुआ है,
कि हम दोनों के बीच अब प्रेम की गंगा बहेगी,
मुझसे कोई गलती हो तो अपने मुख से वो जरूर कहेगी,
पर मुझे चेतक समझ उन्होंने अपनी पुतली फिराई,
किसी नेता कि तरह वादा खिलाफी दिखाई,
आदरणीय पिता जी कृपया आप ही बताएं,
कि कर्ज रुपी बोझ से लदी गृहस्थी की गाड़ी,
हम एक पहिये पर कैसे चलाये,
ससुर को मेरे ऊपर रहम आया,
सास को "माँ जी" कह कर बुलाया 
माँ ने मुझे देखते ही नाक भौं सिकोड़ी,
सरौते के बीच दबी हुई सुपारी झटके से तोड़ी,
इत्मीनान से बैठ कर हमसे कहा,अब क्या लेने आए हो यहाँ,
विदा के समय ६ हट्टे कट्टे आदमी लगे थे कार के अंदर बिठाने में,
२ चादर १ दरी भीग गई थी चुप कराने में,
२ मन की लड़की १ मन की रह गई,
तुम्हारे जुल्म इतने दिन न जाने कैसे सह गई,
मेरी जबान तालू से रही चिपकी,
माता जी तानो की देती रही थपकी,
मैंने कहा माता जी, मै आपकी बेटी पर दिलो जान से मरता हूँ,
पत्नी के सिवा दुनियां में किसी से नहीं डरता हूँ,
काश पूरी दुनियां के पति मेरे जैसे हो जाएँ,
तो साम्प्रदायिकता से छुटकारा मिल जाए,
क्यों कि तब हर् पति पूजा घर में पत्नी का चित्र लगाएगा,
देश से जाति,रंग,मजहब का भेद भाव जड़ से खत्म हो जाएगा,
मेरे ह्रदय में पत्नी के लिए अंध भक्ति है,
हमारे विचार से बीबी ही दुनियां की सर्वोच्च शक्ति है,
इसलिए दहेज ले कर अपना मत गिराइये दाम,
दुनियां भर की पत्नियों को मेरा शत शत प्रणाम....मेरा शत शत प्रणाम....

शनिवार, 5 मार्च 2011

अंग्रेजी में हगीस हिंदी में हगास....

मेरा स्वयम का अनुभव है, आप भी देखें...

कई दिवसों के बाद आज फिर से मेरे मष्तिष्क में,
कुछ खुराफाती विचार नो एंट्री में घुसे ट्रक कि तरह घुसे,
पहले तो हम मन ही मन हँसे,
फिर लगा विषय तो है ये बहुत ही गहरा,
अचानक ब्रेक लगी खुराफाती ट्रक ठहरा,
पर ये हगास बहुत ही अजीब है,
इस पर चर्चा न करना  हमारी तहजीब है,
हम छोड़ नहीं सकते इतनी अहम् बात को,
मुश्किल में पड़ जाते है जब लग जाती है रात को,
शीत ऋतू में बिस्तर का मोह,
ऊपर से निद्रा का विछोह,
पर लगे होने कि मजबूरी,
नहीं करने देती निद्रा पूरी,
सबसे पहले हम कसमसाते है,
थोड़ी देर बाद उहापोह में खुद को पाते है,
फिर दर्द बढ़ता जाता है,
कुछ भी समझ नहीं आता है,
हगास न आए तो होती है बड़ी पीड़ा,
बिना हगे नहीं जी सकता कोई कीड़ा,
कुछ लोग बैठ के है करते,
कुछ लोग बैठने से है डरते,
चेहरा देखिये उस आदमी का गौर से,
जिसको टट्टी लगी हो जोर से,
मौका न मिल रहा हो करने का ,
ऐसे में मन करता है मरने का,
बेचैनी सी छा जाती है,
जब मुहं के पास आ जाती है,
अब निकली कि तब निकली,
अनियंत्रित हो जाती पगली,
बढ़ जाए दूरी यदि घर की,
डर लगा ही रहता अब सरकी,
तब मार चिमोटा भाग चलो,
घर खुला मिले उसमे घुस लो,

फिर परम शांति को करो प्राप्त,
उदर शूल जो है व्याप्त,
लम्बी लम्बी सांसे ले कर,
उदर के ऊपर कर रख कर,
नेत्र बंद हो कर गुम सुम,
याद करो फिर प्रभु को तुम,
बहुत बुरी इसकी है बॉस,
एकबार में न निकले तो बार बार सब करो प्रयास,
मेरा तो बस यही है अनुभव,
खूब हगो जितना हो संभव,...........


शनिवार, 26 फ़रवरी 2011

कुछ इधर की कुछ उधर की....

कल चेहरों की पुस्तक के माध्यम से थोड़ी देर के लिए अपने साहब श्री अनूप शुक्ला जी से वार्तालाप करने का सुयोग प्राप्त हुआ, मै तो ऐसे अवसरों को रिश्वत की तरह ही मानता हूँ क्यों की रिश्वत भी हर् ऐरे गैरे को नहीं मिलती,
एरों में तो हम पहले भी कभी नहीं रहे और गैर मै स्वयं को मानने से इंकार करता हूँ,
बात करने की कला भी अब अबला नहीं रही काफी परिष्कृत हो चुकी है और इसी परिष्कृत कला का परिचय साहब से बात करते समय मुझे प्राप्त हुआ, हो सकता है ये मेरी अज्ञानता हो या उनकी अत्यधिक व्यस्तता के कारण मुझे ऐसा लगा और जो कुछ भी मुझे लगा उसे मै यहाँ टीपे दे रहा हूँ,क्यों की इतने अदम्य साहस को प्रदर्शित करने की छमता मेरे भीतर नहीं है की जो कुछ मै यहाँ लिख रहा हूँ उसे अपने जबड़े से साहब के सामने निकाल सकूँ, इसलिए वार्तालाप का आंशिक अंश यहाँ प्रस्तुत कर रहा हूँ,
मै:-सर जी नमस्ते
 सर:- नमस्ते
सर:- क्या हाल है
मै:- सब आपका आशीर्वाद है
सर:- कुछ नया नहीं लिखा
मै:- कुछ दिनों से अत्यधिक व्यस्त था इस कारण से नहीं लिख सका
सर:- ठीक
मै:- जल्दी ही लिखूंगा
सर:- सही
मै:- अगर आप व्यस्त हों तो मुझे छमा करें
सर:- ठीक
मै:- आपने तो मुझे बहुतखूब समझाया परन्तु बहुत कुछ मेरी समझ में नहीं आया
सर:- सही
मै:- फिर से उसी सुयोग्य अवसर का बेसब्री से इंतजार कर रहा हूँ
सर:- ठीक  ..........सर जी ऑफ लाइन हो जाते है
मै:- शुभरात्रि सर जी
सर:- शुभरात्रि...
लिखना तो बहुत कुछ चाहता था किन्तु,
केस्को की कृपा से अंधेर हो गई है इसलिए बांकी फिर कभी.........

शुक्रवार, 25 फ़रवरी 2011

शिकार....

साहित्य की राजनीति के लिए...


कविता भी होती आज राजनीती का शिकार,

लेखनी भी कर रही शब्दों में फर्क है,

शीला और मुन्नी को तवज्जो दे रहे है लोग,

इसीलिए आज कविता का बेडा गर्क है,

जिसको भी देखिये पहुंचे हुए है कवी सब,


कवी कवी में तो था ही मंच में भी फर्क है,


कोई हास्य व्यंगकार कोई गीतकार है,


कोई न्यायाधीश बनकर बैठा है ये तर्क है,


चाटुकारिता का है व्यापक यहाँ प्रभाव,


स्वाभिमानी कवी के लिए सबसे बड़ा नर्क है....


कर रहा फिर भी मै ईमानदारी से प्रयास,

सादे सरल शब्द हैं ना चांदी का वर्क है.......

रविवार, 20 फ़रवरी 2011

कवि का दर्द....

आज कविता के  भी छेत्र में बहुत राजनीति है,
फिर भी क्या कहूँ मित्रों हमको इससे प्रीति है,
सारी उम्र लिख लिख के फाड़ते कागज रहे,
कवी हम कैसे बने आपसे कैसे कहे,
उल्टा सीधा सोंचते सोंच ही बदल गई,
 और किसी को नहीं पत्नी जी को खल गई,
घर के भीतर का झगडा अब तो आम हो गया,
छेत्र में कविता के फिर भी मेरा नाम हो गया,
मुसीबतें हो गई सहेली,
श्रीमती बन गई पहेली,
हाँथ रख कर गाल पे  रात दिन सोंचा किये,
बेगम के तानो को सुन कर बाल हम नोचा किये,
इस बात का प्रमाण सामने है आपके,
फिर भी कोई शक है तो सर देखिये नाप के,
खेत सारा साफ है बिना कोई श्रम किये,
युवतियां अब देखता हूँ आंख अपनी नम किये,
क्या बताऊँ हाय मेरा हाल कैसा हो गया,
सोंच कर हालत को अपनी चैन मेरा खो गया,
अब तो जाता हूँ यारो जब भी किसी मित्र घर,
कांप जाते है बड़े सब सारे बच्चे जाते डर,
कोई भी सुनता न कविता भाग जाते छोड़ घर,
घटना ऐसी जब भी होती क्रोध से जाता हू भर,
कष्ट मेरे भाई अब तो रोज बढ़ते जा रहे,
बालों के खोने कि सिल्वर जुबली हम मना रहे,
दर्द सारा पी रहा हूँ स्वाभिमान छोड़ कर,
बन के कवी जी रहा हूँ सारे रिश्ते तोड़ कर,
हम तो यारों कट गए दुनिया से सारी,
अब  तो केवल मै हूँ और  मेरी कविता है प्यारी........और मेरी कविता है प्यारी.....

                                                                                        आपका बुलबुल
                                                                                         राजेंद्र अवस्थी (कांड)

सोमवार, 7 फ़रवरी 2011

वन............


वन
वन है आज मर रहा,
निशब्द शब्द झर रहा,
भाव रस से सींच के,
सीमा रेखा खींच के,
मन में प्रेम भर रहा,....वन है आज ......
कोई कुछ भी कहे,
रुष्ट भले सब रहें,
आप का सुखद प्रयास,
मन में आस भर रहा,..........वन है आज.....
कर्तव्य तुम अपना करो,
मुसीबतों से न डरो,
अपने हांथों ही समाज
कब्र अपनी भर रहा,.............वन है आज............

शुक्रवार, 4 फ़रवरी 2011

टी. पी. एम्.

क्यों कि मै सरकारी नौकर हूँ तो स्वामीभक्ति दर्शाने के लिए ही सही चंद पंक्तियाँ लिखने का प्रयास किया है,
तो आप भी देखिये.....



जिधर भी देखो उधर हो रहा टी पी एम्,
पीछे पीछे अफसर नेता आगे आगे चल रहे जी एम्,
मस्ती में है सभी लोग कुछ लोग बहुत ही है महीन,
लम्बी वाली कलछी ले खुरच रहे यहाँ वहां जमीन,
कुछ बुरुश हाँथ में ले दौड़े,
कुछ जूट का झोंझा ले कर में,
कुछ एप्रेन खोज लगे करने,
कुछ कन्नी काट रहे डर में,
सारे अफसर जुटे हुए,
जुटा हुआ पूरा सेक्शन,
हाँथ पैर यों हिला रहे ज्यों नाच रहे माइकल जैक्सन,
चरों तरफ हड़बड़ी मची,
हो रहा जोर से घमासान,
कुछ लोग लुकैय्या देख रहे मति है जिनकी कुछ चतुर सुजान,
सब महा प्रबंधक जान रहे,
पर भोला शंकर  बने हुए,
कर्म निष्ठ कर्तव्य निष्ठ,
श्रमशील समर में डंटे हुए,
कुछ निश्चय कर मंथर गति से,
मन ही मन प्रभु का ध्यान किया,
उठा जूट झोंझा बुरुश,
टी पी एम् आरंभ किया,
अपनी ही टेबल के नीचे जो देखा मैंने प्रथम बार,
पीकदान इक रक्खा था जिसे करता था मै बहुत प्यार,
थूक थूक कर पान मसाला भरता था उसे बार बार,
खूब मुझे समझाते रहते,
मित्र मेरे सब दोस्त यार,
निश्चित मति दृढ प्रतिग्य ह्रदय कर,
उठा लिया उस पीकदान को,
टी पी एम् का समर शुरू कर दिया फेंक उस थूकदान को,
झाड़ पोंछ कर साफ किया फिर टेबल के नीचे का थल,
टी पी एम् सब मिल आज करो न जाने कब आएगा कल...
                                                                                        आपका बुलबुल
                                                                                       राजेंद्र अवस्थी (कांड)
                                 

मंगलवार, 11 जनवरी 2011

नेता......

हमारे देश में नेताओं का बड़ा महत्व है, वास्तव में इंसानों की यही सबसे ज्यादा उन्नत प्रजाति है!
और सारे संसार में ये प्रचंड प्रतिभा के साथ अपनी विभिन्न कलाओं का प्रदर्शन किया करते है,
ये हिंसक नहीं होते,और लज्जा शब्द से ये अंजान बने रहते है,अपने झूठ बोलने की विशिष्ट कला का प्रदर्शन अनावश्यक रूप से हर वक्त किया करते है,नित नए मुद्दों के माध्यम से अपने अस्तित्व का आभास पूरी दुनियां को कराते रहते है,          
इनके मुद्दों से प्रभावित हो कर कुछ पंक्तियाँ मैंने भी लिखने का प्रयास किया है जो आपके सामने प्रस्तुत है....

आज का जमाना मुद्दों का जमाना है,
सभी नेताओं के पास मुद्दों का खजाना है,
ना जाने कहाँ से ढूंढ़ कर लाते है,
मतदाताओं के मुह में दूध की बोतल के सामान लगाते है,
मुद्दों का दूध पिला कर मतदाता को जब बना देते है पहलवान,
तब सम्प्रदायकता फैला कर आपस में कुश्ती लड़वाते है,
देश की ऐसी हालत देख कर बेरोजगारों को चाहिए वो आगे आएं,
मुद्दों की दुकान खोल कर ए.राजा, आडवानी से उद्घाटन कराएँ,
देश के सबसे बड़े मुद्दा निर्माता तो यही है,
इनके मुद्दों की शान विदेशों में भी रही है,
ए.राजा ने टू जी स्पेक्ट्रम का बम फोड़ा,
आडवानी ने राम जन्म भूमि का गोला छोड़ा,
जिससे जलने लगा सारा देश,
झुलसाने लगे भारत माता के केश,
सिंकने लगी सियासी रोटियां,
विधवां हो गई न जाने कितनी बेटियां,
रोने लगी इंसानियत,
प्रतिष्ठित हो गई शैतानियत,
बेटों का फूटा सर,
मां जीते जी गई मर,
ज्यादा क्या कहूँ खूब हुआ खुनी खेल,
बंद बाजारों में डिस्काउंट पर हुई मौत की सेल,  फिर भी मुद्दों का उत्पादन जारी है,
पता नहीं भविष्य में फिर किस मुद्दे की बारी है....फिर किस मुद्दे की....फिर किस मुद्दे की......

                                                                              आपका बुलबुल...
                                                                              राजेंद्र अवस्थी ( कांड )

रविवार, 9 जनवरी 2011

भाग्य....

कल सौभाग्य से साहित्य मर्मग्य, मकेनिक्लिग्य, हमारे साहब फुरसतिया महाराज श्री अनूप शुक्ल जी से अनुभाग में ही मिलना हो गया,
कुछ देर तो मैंने सोंचा - बात करूँ के न करूँ फिर साहस बटोर कर मै उनके आगे पीछे मंडराने लगा,
इस आशा के साथ की सही मौक़ा देख कर उनसे बात कर सकूँ,
और वो मौका मुझे २६ जनवरी के इनाम की तरह मिल ही गया,
बड़ा सकुचाते हुए हमने उनको अपने ब्लॉग  हरकांड.ब्लागस्पाट.कॉम के बारे में बताया,
 तो बड़े निर्विकार भाव से उन्होंने हिंदिनी/फुरसतिया के बारे में हमसे कुछ सवाल किये,
उनके सवालों का जवाब मैंने बहुत नर्वासियाते हुए दिया,
तब मेरे ब्लॉग का पता नोट करते हुए वो हमसे बोले,
मै अभी तुम्हारा ब्लॉग देखता हूँ,
मुझे नहीं मालूम उन्होंने मेरा ब्लॉग देखा की नहीं,
परन्तु आज हिंदिनी/फुरसतिया पर उनका लेख "हादसे राह भूल जाएँगे" को पढ़ते समय मै इन चार लाइनों को संगृहीत करने से अपने को रोक नहीं पाया,

मै अपना सब गम भुला तो दूँ,
कोई अपना मुझे कहे तो सही,
हादसे राह भूल जाएँगे,
 कोई मेरे साथ चले तो सही..
                                    वजीर अंजुम साहब....

इन चार पंक्तियों के लिए मै मरहूम वजीर अंजुम साहब को और अपने साहब श्री अनूप शुक्ल जी को कोटिश धन्यवाद देता हूँ,
                                                       आपका
                                                                  बुलबुल
                                                                  राजेंद्र अवस्थी (कांड)

सोमवार, 27 दिसंबर 2010

मेरा भारत महान हो गया..

जब से मेरे देश में कांग्रेस राज हो गया,
सस्ता हो गया आदमी मंहगा प्याज हो गया,
कितनी ईमानदारी से करते है बेईमानी देखो,
भ्रष्टाचार में नंबर वन हिन्दुस्तान हो गया,
और बारिश से अब डरने लगे है लोग,
क्यों की पिछली बरसात में पूरा शहर टाइटेनिक जहाज हो गया,
दुहाई देते है सब इंसानियत की मगर,
न जाने कितने बच्चो का कत्ले आम हो गया,
सुन कर अब तालियाँ मत बजाओ लोगो,
मेरा ये पैगाम भी बदनाम हो गया,
मल्टीमिडिया सेट अब बच्चे भी रखते है जेब में,
इसीलिए तो मित्रो नेटवर्क जाम हो गया,
अब तो स्कूल में होता है बलात्कार,
ये कैसी शिक्षा का प्रचार हो गया,
कटे हांथो से देश की पकडे हो बागडोर,
तभी तो कही संसद भवन कही अक्षरधाम हो गया,
हवाओ में भी यारो घुल रहा है अब जहर,
फिर भी मेरा भारत महान हो गया..............फिर भी मेरा............

गुरुवार, 16 दिसंबर 2010

हंसी पर रोती जिन्दगी....

युवा वर्ग के अंतर्मन की व्यथा को,अनिवार्य शिक्षित होने की कथा को,    लिपिबद्ध करने का छोटा सा प्रयास....


हंसी पर रोती जिन्दगी, ये कैसी समाज की दरिंदगी, बच्चो का खोता जा रहा है बचपन, हर किसी में ढूंढते है अपनापन, मै इसी तरह का कुछ लिखने वाला था, अंतर्मन में दुविधाओ को पाला  था, पर जिन्दगी रोते हुए भी हंसती है, समय की कसौटी पर हर एक को कसती है, और आंकड़ो के साथ अपनी हर बात प्रस्तुत करती है, मै भी कुछ आंकड़े आप के सामने ला रहा हूँ कृपया ध्यान दे,                          (  परीक्षाओ में फेल होने के मुख्य कारण ) सीधा जवाब है -:  १ वर्ष के ३६५ दिन होते है, रोज ८ घंटे सोने के यानि पूरे साल के १२२ दिन ३६५-१२२=२४३ दीपावली अन्य त्यौहार आदि तथा गर्मियों की छट्टियों के दिन-: ६१    २४३-६१=१८२ दिन, उसमे भी ५२ रविवार १८२-५२=१३० दिन, आकस्मिक और स्कूली त्यौहार के ४० और व्यक्तिगत १५ दिन-:   १३०-५५=७५ दिन खाने पीने नहाने के ३ घंटे के हिसाब से ४६ दिन-: ७५-४६=२९ दिन रोज के १ घंटे दोस्तों के उसके १५ दिन -: २९-१५=१४ दिन अब उसमे १० दिन तो बीमार रहते है-: १४-१०=४ दिन बचे परीक्षाओ के समय भी दूरदर्शन देखने के ३ दिन-: ४-३=१ दिन बचा मित्रो, एक साल में एक ही दिन तो जन्म दिन आता है, अब जन्म दिन में कौन पढ़ाई करे ?

मंगलवार, 14 दिसंबर 2010

महंगाई...

कल रात अपने कमरे के भीतर हम दरवाजे से लगाए हुए कान,

सुन रहे थे सड़क पर चल रहा कुत्तो का व्याख्यान,

सारे कुत्ते कई दलों में बंटे थे,

अपनी बात कहने के लिए एकदूसरे के सामने डटे थे,

सभी दिखा रहे रहे अपनी अपनी प्रभुताई,

 हर स्वान भौक भौक के कह रहा था,

हाय रे महंगाई हाय रे मांगे हाय रे महंगाई,

 विषय गंभीर था, आगे सुनने के लिए मै भी अधीर था,

जैसे ही मेरी जिज्ञासा ने जोर पकड़ा,

बाहर एक ताकतवर कुत्ता मरियल कुत्ते पे अकडा,

 चुप बैठ एक्सरे फिल्म,

 नहीं है तुझे किसी बात का इल्म,

 पूरा देश महंगाई की आग में जल रहा है,

 और तू यहाँ खाली बातो की पूरियां तल रहा है,

 कहते है लोग भारत देश है महान,

 कभी हुए थे यहाँ राम कृष्ण और टीपू सुलतान,

 कभी था अपने देश की संस्क्रति का बोलबाला,

 पर आज है चारा स्टंप और खाद्द सामग्री घोटाला,

 पेट्रोल की कीमत हो रही है केसर जैसी,

औ इंजेक्सन लगवा के दूध दे रही है आज भैसी,

  अब तो खूब बिक रहा है ब्रांडेड आटा,

ट्रक और कार बेचते बेचते नमक बेचने लगे टाटा, ,

तुम सबको दोना चाटने की पड़ी है,

 और आज भारत माता तबाही की कगार पर खड़ी है,

 कुत्तों के सुन विद्द्वता पूर्ण विचार,

मेरे ह्रदय में हुआ क्रांति का संचार,

कोने में रखा डंडा हमने चुपके से उठाया,

और डंडे के बल पर कुत्तो को इंसानियत का परिचय करवाया,

लौट कर अपने कमरे के भीतर लेते हुए अंगड़ाई,

मैंने भी नारा लगाया वाह री महंगाई वाह री महंगाई वाह री महंगाई,                                                                                          आप सबका                                                                                   राजेंद्र अवस्थी (कांड)

शनिवार, 11 दिसंबर 2010

बेइज्जती....

बेइज्जती हम बेशर्मो का गहना
बिना बेइज्जती के क्या रहना
पूरा दिन जाता है खाली 
जब नहीं देता कोई गाली
मन उदास रहता है
खाली बकवास रहता है
बेशर्मी का ओढ़े लबादा
झूठा करता हू सबसे वादा
कोई भी बात हो
दिन हो या रात हो
जलालत है अपनी सौगात
झूठ है भाई, धोखा अपनी जात
रिश्तेदार है भ्रष्टाचारी
सगे सम्बन्धी अत्याचारी
पर कहना मत कभी मुझे नेता
गला हमने कभी किसी का  नहीं रेता
मेरी  इंसानियत सब को खलती है
शायद ये हमारी गलती है
के मै मानता हूँ  पूरी दुनिया को अपना घर
और अपने घर को तोड़ने से पहले लगता है डर
डर कही कोई बेइज्जती ना कर दे
सरे राह कोई इल्जाम मेरे सर ना धर दे
पर डरना और मरना एक जैसा है
न जाने ये संसार कैसा है
जो स्वाभिमान के साथ जीने भी नहीं देता
और सम्मान के साथ मरने भी नहीं देता
कभी हिजड़ा बना देता है और कभी कीड़ा
जीते जी देता है हर तरह से पीड़ा
मरने के बाद बन जाते है स्मारक
मौत चाहे जितनी भी रही हो ह्रदयविदारक
इसीलिए मित्रो बहुरूपिया चरित्रों
बेशर्मी के साथ जीना सीखो
बेइज्जती के बाद जी भर के चीखो
और दुनिया को बताओ मै नेता नहीं हूँ
इंसानियत के नाते सिर्फ देता हूँ लेता नहीं हूँ,,,...
                                                                   
                                                                   राजेंद्र अवस्थी...

बुधवार, 20 अक्टूबर 2010

गुरु गाथा....

अपने गुरू श्रीअनूप कुमार शुक्लाजी को उनके स्थानान्तरण से पूर्व सादर समर्पित करता हूँ ये रचना,


गुरुवर जब से चले गए तुम वीरानी सी छाई है,
याद आपको करते करते आँख मेरी भर आई है,
याद है बचपन के दिन हमको,
जब भी आप पढ़ाते थे,
हम पीछे से देख आपको नैन खूब मटकाते थे,
आप हमें समझाते रहते सब से बड़ी पढाई है, याद आपको........
भूले बिसरे याद है आते,
वो बचपन के संग संघाती,
धूल भरे दिन वो हुल्लड़ सब,
वो बरखा की काली राते,
वो दिन जाने कहाँ गए अब पतझड़ में अमराई है, याद आपको.......
याद है मुझको आज भी वो दिन,
जब संटी आपकी टूटी थी,
जाने कहाँ से कट कर आई,
पतंग जब हमने लूटी थी,
जीवन की तपती दोपहर में याद की बदली छाई है, याद आपको......
स्वाभिमान को सदा सहेजा,
चाहे कितना भी फटे कलेजा,
आपके शब्दों की गरिमा ने यही बात सिखलाई है, याद आपको.........

                                                                                                  गुरु जी को सादर समर्पित.
                                                                                                    आपका आज्ञाकरी शिष्य.                                                                                                  राजेंद्र अवस्थी (कांड)