बुधवार, 8 अगस्त 2012

बचपन

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        मन बड़ी बड़ी बातें करते हुए छोटा सा बच्चा लगता है,
        यही बचपन मुझे अच्छा लगता है,
        साथ हो सरसता सरलता के,
        बीज उर धरे हो तरलता के,
        शीलता तो बरबस हो,
        स्वाभिमानी तरकश हो,
        हो शब्द की मधुर शाला तो अच्छा लगता है,
        बस यही बचपन तो मुझे अच्छा लगता है,
        चाल हो दुलक प्यारी,
        हरकतें भी हों न्यारी,
        ना हो बुद्धू ना ज्ञानी ,
       जानता हो ना जो ये आग है के है पानी,
        सीधा सा सयानापन  कच्चा लगता है,
        बस हाँ यही बचपन तो मुझे अच्छा लगता है।


मंगलवार, 7 अगस्त 2012

स्पंदन


       बढ़ जाता स्पंदन हिय का पास तुम्हारे आने से, 
        थमती धड़कन रुकती सांसे दूर तुम्हारे जाने से,
        दीवानापन तो ऐसा है के दिन में ख्वाब तुम्हारे है,
        राते आँखों में कटती हैं यादों से हम हारे हैं,
        कल्पित से लगते हैं पल जो हमने साथ गुज़ारे हैं,
        साथ नहीं हैं फिर भी लगता हम तो संग तुम्हारे हैं,
        रोम रोम रोमान्चित होता आज भी जब हम मिलते है,
        यादों की गनतरिया हम तुम दोनो मिल कर सिलते हैं,
        बिलकुल तुम ना बदली हो आज भी हो वैसी की वैसी,
        फागुन, सावन, चाट बताशे, औ चूड़ी कंगन के जैसी,
        व्यक्त् करूँ मै नेह को कैसे तुम्हे अर्पित जीवन सारा है,
        सुख दुख हँसना रोना सोना सब कुछ तुम पे वारा है..

रविवार, 5 अगस्त 2012

जिजीविषा


मै अरूप अचिन्ह,
मन: मृदा खिन्न,
चला करने संस्कारित जगत,
ना कोई युक्ति ना कोई जुगत,
ईमानदारी का प्रवचन,
संस्कारों की खुरचन,
मौलिकता का आवरण,
भावनायें भावप्रवण,
सत्य की कसौटी,
पुरखों की बपौती,
मन में धार्मिकता,
सोंचो की सार्थकता,
लिये कांधे पर बोझ,
ज़िदंगी जीना है रोज,
लिखना फिर मिटाना,
खानाबदोशों  सा ठिकाना,
बना उदारता का प्रतीक,
दुनिया भर से लेता रहा सीख,
परम्परा रीति रिवाज़,
संस्कृति और समाज,
सीख पाया बस यही,
जिजीविषा  चुकती नही,
पूर्ण अब जीवन मेरा,
साथ जो पाया तेरा,
हाय मै अब क्या करूँ,
तेरा प्यार किस कोने भरूँ,
बस रक्त सिंचित प्यार है,
तेरा बहुत आभार है,

                   " राजेंद्र अवस्थी कांड "

स्वागतम


अहा प्रात स्वागत है तेरा,

मन में मोती भर लाया हूँ,
कल ही रात तो घर आया हूँ,
हुआ प्रकाशित तम जीवन का,
भ्रमित नहीं चेतन मन मेरा,

अहा प्रात स्वागत है तेरा,
 कलुषित कल को छोड़ चुका मैं,
लिप्सा का दिल तोड़ चुका मैं,
छोड़ रहा इक इक पल मुझको,
टूटा कल्पित स्वप्न भी मेरा,

अहा प्रात स्वागत है तेरा,

आनंदों का स्वामी बन कर,
मुट्ठी में सुख सारे भर कर,
रिक्त है अंजुरी आ जा प्रियतम,
भर लूँ चेहरा तेरा,

अहा प्रात स्वागत है तेरा,

रविवार, 29 जुलाई 2012

प्रेमद्वंद


करती रात विश्वासघात,
नित कर देती नव प्रभात,

विचार रेत सा झर जाते है,
दिल कतरा कतरा कर जाते है,
कुण्ठित मन के सारे कोने,
विष कणिका से भर जाते है,
लगता नही सुखद अब मुझको,
  तेरा हर एकाकी साथ,

करती रात विश्वास घात,
कर देती नित नव प्रभात,

सूना तनमन खाली सा,
ह्रदय बना है जाली सा,
प्यार की बूदें छन्न से हो,
उड़ जाती आग की लाली सा,
रह जाती है पास हमारे,
ठोकर खाने वाली बात,

करती रात विश्वास घात,
कर देती नित नव प्रभात,



प्रेम रात में रत होता है,
तुमसे मोह विकट होता है,
सुर्ख लाल भानु मुखमंडल,
दीप्त प्रतीत द्रश्य होता है,
लहराता जब भोर का परचम,
लगता जैसे ह्रदय घात,

करती रात विश्वास घात,
कर देती नित नव प्रभात,









शुक्रवार, 27 जुलाई 2012

अस्तित्व


 तुमको पास ना देख दूरी का अहसास हुआ,
 भले ही ह्रदय मे रुधिर की तरह उपस्थित हो,
 पर श्वेत कणिकाएँ कुछ कम हो चली हैं,
 यादों का सिलसिला श्वांस की तरह हो गया है,
 हाँ जब बिजली नहीं आती,
 तब तुम्हारे पास ना होने का अहसास दम घोटता हुआ सा लगता है,
 अधेरे मे तुम नज़र आने लगती हो कल्पनाओं मे,
 और मै ढ़ेर सारी बातें कर जाता हूँ तुमसे,
 वास्तव मे मुझे पता होता है कि तुम नही हो,
 अंधेरा कर गई रोशनी की तरह,
 लेकिन तुम्हारी अंधेरे की सौगात मुझे पसंद है,
 मुझे पता है ये भी कि जब तुम आओगी तो रोशनी आयेगी मेरे कमरे में,
जब तुम आओगी तो ज़मीन आवाज़ देगी, तुम्हारे आने की,
जब तुम आओगी तो चंदन की महक भी आयेगी तुम्हारे साथ,
जब तुम आओगी तो मेरा जीवन  भी अस्तित्व मे आयेगा,

 अरे..अस्तित्व हीन जीवन!!!!!!!!!

क्या गज़ब का परिहास है,
चलो कुछ तो है परिहास ही सही,
पर है तो सही जीवन बिना अस्तित्व के भी,
क्यों कि,मेरा अस्तित्व तो तुम्ही हो,
क्यों कि, मेरा अस्तित्व तो तुम्ही हो.....


                                                              राजेंद्र अवस्थी (कांड )

नतमस्तक



नतमस्तक हूँ आज समय के सामने,
श्रम का प्रतिदान चाबुक की फटकार,
जिम्मेदारियों का बोझ लादे ,
चला आया बचपन को झिड़कते हुए,
तानों, दुराग्रहों , समाज की,
बेंड़िया पहने मनाता रहा त्योहार,
बोझ कभी भारी ना लगा,
 पर आज समय ने नतमस्तक कर दिया,
स्वाभिमान भी दलदली हो गया है अब,
सूखे ठूंठ सा ज्ञान बाँकी है,
जो जीवन और मृत्यु के फर्क को जताता है,
साथ ही ये भी बताता है कि, 
सिर्फ ठूँठ बचा है.........
.सिर्फ ठूँठ बचा है..
                                                                     
                       
                                                                     राजेन्द्र अवस्थी (काण्ड)ै

रविवार, 8 जुलाई 2012

चिड़िया

आज एक चिड़िया अपनी चोंच में एक कतरा धूप भर कर मेरे कमरे मे डाल गई,
मुझे हिकारत से देखा और, कुछ जलते हुआ प्रश्न उछाल गई,
क्या ए.सी.मे रहने वालो को गर्मी नही लगती,
प्यास से सूखते गले मे सुइयां नही चुभतीं,
कब तक और कितने तरीकों से बचाओगे अपने अस्तित्व को,
कैसे कैसे महान बनाओगे खुद के व्यक्तित्व को,
ठण्डी हवायें कब तक रहेंगी आस पास,
कब तक ना लगेगी तुमको प्यास,
खेत,खलिहान,तालाब,पोखर,बाग,
नेह,मेह,सम्वेदना,संगीत,राग,
बना दो सब को बोनसाई, 
इसांन बना ईश्वर ये आवाज़ चिड़िया ने लगाई,
रहो अपने स्वार्थ और लालच के संसार में,
इस एक कतरा धूप को भी बेंच दो बाजार में,
जाते जाते ए.सी.का ठण्डापन, मेरी सोंचों मे भर गई,
और वो एक कतरा धूप अपनी चोंच से मेरे कमरे में धर गई...

बदली में ,

चाँद आज छुप गया था बदली में ,

अठखेलियाँ थी खूब जारी,
बदलियों के दिल भारी,
छुप छुप के आता था,
चाँद मन चुराता था,
बदली को नचाता चाँद उंगली में,
चाँद आज छुप गया था बदली में,

बदलियाँ बैरागी थीं,
प्रेम अगन लागी थी,
बदलियों का अकुलाना,
बैरी चाँद छुप जाना,
हो गई अमावस रात उजली में,
चाँद आज छुप गया था बदली मे,

चाँद ने बहुत रोका,
बदलियों को था टोंका,
है चाँदनी प्रिया मेरी,
संगिनी सदा चेरी,
मन हारा चाँद चाँदनी सी पगली में,
चाँद आज छुप गया था बदली में




गिला

कितना सारा गिला,
इंतज़ार बिजली के आने का,
संशय सवेरे ना उठ पाने का,
गैस का खतम होता सिलेंडर,
अन्ना के सामने कांग्रेस का डिफेंडर,
साल की सबसे अधिक ठंडी रात,
गुज़ार दी तनहा तुम्हारी यादों के साथ,
यादें बता देती है उम्र का तकाजा,
साँसों से कहता है प्राण,अभी ना जा,
जीवन भर साथ चलते है शिकवे गिले,
जैसे कल रात ख़्वाब में तुम मुझे नही मिले,
पर कैसे कहूँ नज़रों के सामने थे तुम,
राह भटकी जब कोई मुझे थामते थे तुम,
माह गुज़रे साल गुज़रे गिले बांकी रह गए,
ख़्वाबों में यादों में मौन ही सब कुछ तुम कह गए,
अब शेष हूँ मै, तुम्हारे ख़्वाब, तुम्हारी याद,
वो जगह, जहां पहली बार, तुमसे मिला,
और कुछ शेष है, तो वो है सिर्फ गिला, सिर्फ गिला,सिर्फ गिला......

शनिवार, 7 जुलाई 2012

खुजली

खुजली, क्या है? इस प्रश्न का उत्तर शायद सभी को मालूम है कि,जब भी प्राणी मात्र के तन पर या मन पर,
किसी
अनचाही छुअन का अनुभव होता है चाहे वो भ्रम वश हो या जानबूझ कर हो,
उस
छुअन के आभास को हाँथ से सहला कर या नाखूनों के माध्यम से खरोंच कर मानसिक संतुष्टि  प्राप्त कर,जिस शारीरिक और मानसिक पीड़ा को शांत किया जाता है , उसको खुजली कहते है,प्राचीनकाल से खुजली की दो जातियों के होने का प्रमाण शिला लेखो के माध्यम से प्राप्त होता है,
- व्यक्त खुजली २- अव्यक्त खुजली==============
व्यक्त खुजली,- के अंतर्गत वो खुजली आती है जो सामान्य रूप से दृष्टिगोचर हो जाए,इस तरह की खुजली कोई भी कही भी कभी भी खुजा सकता है,जैसे शरीर के किसी भी अंग को खुजाते हुए,दैनिक क्रिया कलापों के बीच में हम और आप एक दुसरे को देख सकते है,
अव्यक्त खुजली
:- इसके अंतर्गत जो दृष्टिगत ना हो कर हमारे व्यवहार से जाहिर होती हो, जैसे जबान की खुजली... खुजली हर जीवित प्राणी को कभी कभी होती ही है,यूँ तो खुजली मात्र तीन अक्षरों के मेल से बना अझेल शब्द है,खुजली शब्द स्त्रीलिंग है, इसका संधिविछेद करने पर खून+जली प्राप्त होता है जिसका सामान्य सा अर्थ है खून जलाने वाली,लोकमत के अनुसार प्रायः ये गंदगी से उत्पन्न होती है,पर व्यक्तिगत मेरे विचार से खुजली का गंदगी या सफाई से कोई लेना देना नही है,मैंने संत महात्माओं को प्रवचन करते समय नाक्,कान,गला,मस्तक अदि खुजाते हुए देखा है,खुजली से सम्बंधित स्वयं का अनुभव शब्दों के माध्यम से आपके सामने प्रस्तुत कर रहा हूँ,-----------------------------------------------------------------------------------------
                                भाग १

अपने आप में एक विचित्र अनुभव है,अनोखा अहसास है,
स्वयं संवेदना का व्यक्तिगत आभास है,
इसलिए करता हूँ आपको खबरदार बाखबर, 
कर रहा था मै ट्रेन का सफर, 
तीन दिनों का झंझावात,कब गुज़रे दिन कब आई रात,
कभी जोर कभी धीरे से ट्रेन का हिलना,
पुरानी पटरियों से नई पटरियों का मिलना,
अलसाई आँखों में कल्पनाओं का जोर,
कानो में गूंजता इंजन का शोर,
चाँद रात थी उजली उजली
अचानक महसूस हुई पाँव में खुजली,
आँखों में नींद मन अलसाया,
अपने दूसरे पाँव से खुजली को सहलाया,
पर खुजली बन गई थी कॉग्रेस आई,
बढ़ती गई जैसे महंगाई,
हाँथ से खुजाने की हिम्मत नही पड़ रही थी,
और खुजली द्रोपदी के चीर की तरह बढ़ रही थी,
कई बार मोबाइल पर खोजा पैर ऊपर नीचे समेटे,
कमबख्त मोबाइल वाले भी कोई आप्शन खुजाने का नही देते,
सारी जुगत फेल हो रही थी,खुजली अझेल हो रही थी,
अंत में हमें ही पड़ा उठना,तिकोना किया घुटना,
दाहिने हाँथ की शुभता रखते हुए मद्देनज़र,
तर्जनी उंगली के नाखून की धार की प्रखर,
बिना हानिलाभ सोंचे किया नाखून का प्रयोग,
शायद शनि के साथ राहू का था कालसर्प योग,
मिटा खुजली पैर की, की परम शान्ति प्राप्त,
बैग का तकिया बना और निद्रा हो गई व्याप्त,                              
                                            भाग
..
भोर
की पहली किरण, नींद मेरी हुई हिरन,
कानपुर की धरा को,हाँथ जोड़े कर नमन,
अपने घर का प्यार पा कर मन प्रफुल्लित हो गया,
यात्रा का शब्द अर्थ विष बीज दाना बो गया,
मै तो गंजा था ही मेरा लाल पंजा हो गया,
सोंचते ही सोंचते मष्तिष्क् मंझा हो गया,
नित दायरा अपना बढाता था वो भ्रष्टाचार सा,
बीत वासर सब रहे औषधि बदलते यार सा,
ये चिकित्सक वो चिकित्सक सब चिकित्सक गए,
कारबंकल,पीलपांव,अन्धामुखी बतला गए,
फोड़ा बना घोडा और मै डंकी के जैसा हो गया,
मै तो जो था सब सही मेरा पुत्र मंकी हो गया 
घर के सारे काम भी जिम्मे पे उसके गए,
आगे की औपचारिकता सभी नेता उसे बतला गए,
संस्कारों की वजह से आज वो लट्टू बना,
भागता फिरता था वो धोबी का टट्टू बना,
राजकीय नियमावली से अभी अनजान था,
उम्र चौदह साल थी समझो कि वो नादान था,
मै पड़ा था खाट पर बन के भ्रष्टाचार सा,
देखा करूँ मै मौन सब गांधी पे चढ़ते हार सा,
बेइज्जती सी पैर की सब चीराफाडी हो गई,
अर्थ स्थिति घर की जैसे बैलगाडी हो गई,
लोकतंत्री पैर की सब लोकपाली हो गई,
सरकार के नियमों के कारन जेब खाली हो गई,
शर्म सी आने लगी थी खुद को अपने नाम पे,
कर के हिम्मत एक दिन मै चल पड़ा फिर काम पे,
मित्र अधिकारी सभी के हमदर्दी जताते,
बीतता था दिन चिकित्सीय औपचारिकता निभाते,
नेता थे कन्नी काटते विपदा ना सुनता था कोई,
टूटी थी कोई चीज़ सीने में, मेरी नैतिकता रोई,
खुद में साहस भर के निकला फिर मै सीना तान के,
भ्रष्ट सिस्टम से लडूंगा मन में ऐसा ठान के.....
भ्रष्ट सिस्टम से लडूंगा मन में ऐसा ठान के.....<br>

मंगलवार, 8 मई 2012

मतलब..

शब्द नही है प्यार है मेरा,शब्दों का संसार है मेरा, अगणित बातें कहने को(कलम)ब्लॉग ही अब आधार है मेरा.


                                                                  मतलब..


मतलब,
मतलब ये है कि दुनिया में जो भी कुछ हो रहा है, वो सिर्फ मतलब के लिए ही हो रहा है,
 मतलब ये कि आप अगर इस लेख को पढ़ रहे है तो मतलब से ही पढ रहे होंगे
और अगर नही पढेंगे तो भी मतलब से ही नही पढेंगे,
पढ़ने का मतलब नई जानकारी प्राप्त करना, ना पढ़ने का मतलब बिजली बचाना, समय बचाना...
खैर मेरा मतलब तो मतलब के बारे में लिखने से है..सो मै तो अपना मतलब पूरा किये लेता हूँ,
आप भी तो अपना कर रहे है...
सब कहते है दुनिया मतलब की है, पहले मै नही समझता था,
पर अब समझने लगा हूँ, कि संसार का सारा सार बेमतलब नही है,
विवाह मतलब से,
बच्चे मतलब से,
बच्चों की पढाई मतलब से,
दोस्तों से दोस्ती और लड़ाई मतलब से,
गाना मतलब से,
खाना मतलब से,
हंसना मतलब से,
रोना मतलब से,
जागना मतलब से,
सोना मतलब से,
बैठना मतलब से,
चलना मतलब से,
गिरना मतलब से,
सम्हलना मतलब से,
यानी कम शब्दों में ये समझिए कि समझना भी मतलब से
ना समझना भी मतलब से, कभी कभी सोंचता हूँ कि क्या निस्वार्थ कुछ भी नही,
फिर ये समझ में आता है कि सोंचना भी तो बेमतलब नही,
बिलकुल पक्का है कि मतलब के बारे में लिखने में भी तो मतलब है,
किसी को नाम का मतलब होता है किसी को दाम का मतलब होता है,
और मेरा तो मानना यहाँ तक है कि, जो लोग अन्ना हजारे या बाबा रामदेव नही बन पाते,
वो ब्लोगर बन जाते है, मतलब कुछ हुआ तो ठीक, नही तो प्रचार तो हो ही जाता है,
या फिर शौक पूरा करने का मतलब तो है ही,
अच्छा आप ही बताईये बिना मतलब भी कुछ होता है क्या?
बिना मतलब के तो पत्नी बात भी नही करती,
बिना मतलब के गाय घास भी नही चरती,
बिना मतलब के बेटा बाप से नही डरता,
बिना मतलब के सैनिक सीमा पे नही मरता,
बिना मतलब ब्लोगर ब्लॉग नही लिखता,
बिना मतलब के मतलब नही दिखता,
मेरे शहर की सारी सड़कें खोद डाली गई है, अब आप सोचोगे कि सड़कों की खुदाई
से किसी को क्या मतलब,
मतलब है जी, बहुत बड़ा मतलब है, सड़के खुदेंगी लोग गिरेंगे, चुटहिल होंगे,
रिक्शा या आटो से अस्पताल जाएंगे, बहुतेरे ग़रीबों का भला होगा,
नर्सिंगहोम और डॉक्टरों की चांदी हो जाएगी,
नगर निगम के अफसरों का कमीशन पक्का होगा,
वाहन जल्दी खराब होंगे, गरीब मकेनिकों का धंधा चल निकलेगा,
सड़क खुदाई के विरोध में नेता आंदोलन करेंगे,नेतागीरी की दुकान चल जाएगी,
मतलब ये कि सड़क खुदाई से हजारों लोगों का मतलब पूरा हो जाएगा,
मतलब ये कि हर,
बात में मतलब,
मुक्का लात में मतलब,
मतलब में मतलब,
बेमतलब में मतलब,
मतलब ये कि बे मतलब कुछ भी नही,
मुझे लगता है कि अब मेरा भी मतलब हो गया है, और मुझे कुछ दूसरे मतलब भी देखने है,
इसलिए अब आप भी अपने मतलब को मतलब से देखिये, मेरा मतलब तो आप समझ ही गए होंगे..
यहाँ मतलब से रोटी है मतलब से दाना है,
सच है दोस्तों बड़ा मतलबी जमाना है...

रेल का टिकट.

शब्द नही है प्यार है मेरा,शब्दों का संसार है मेरा, अगणित बातें कहने को(कलम)ब्लॉग ही अब आधार है मेरा...


                                                    


पहली बार हमने लिया रेल का टिकट,

लाइन लगी थी बड़ी विकट,
हम भी आंखी मीचे, लग गए सब से पीछे,
गरमी के मारे निकल रहा था पसीना,
तभी धकेलते हुए मुझे आगे बढ़ी एक हसीना,
होंठो पर लिए विज्योंमत्त हँसी,
अभिमन्यु की तरह लाइन के चक्रव्यूह में घुसी,
सभी की निगाहें उसी पर थी चप्की,
वो टिकट के लिए खिडकी पे लपकी,
मै इस अन्याय को ना सह पाया,
मैडम लाइन में आइये फरमान सुनाया,
इससे पहले कि लड़की अपना पर्स खोले,
भ्रष्टाचार के खिलाफ मुझे लड़ता देख कुछ और लोग भी बोले,
मैडम आप गलत कर रही है,
महिलाए अब पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिला कर लड़ रही है,
लाइन चाइना वाल की तरह थी लंबी,
मैंने कहा:मेरे आगे लग जाओ महिला समर्थक है हम भी,
लड़की ने कर दिया इनकार,
मेरे पीछे खडी हो गई निर्विकार,
रह गया मै हक्का बक्का,
अचानक किसी ने मारा जोर से धक्का,
लाइन का सिस्टम बिगड़ा,
मेरे आगे पहलवान लगा हुआ था एक तगड़ा,
मुझे घूरा आँखे तरेरी गरमाया,
मैंने नेता की तरह पोलैटिली समझाया,
पहलवान ने मेरी औकात को बांचा,
आओ देखा ना ताव मार दिया तमाचा,
हमने भी ऊपर नीचे हाँथ पैर हिलाए,
पर पहलवान का कुछ भी ना बिगाड़ पाए,
लड़ाई की उम्र थी कम जैसे कनपुरिया बिजली,
पीछे से मैडम को गायब देख  मेरी तबीयत दहली,
तुरंत जेब टटोली पर्स देखा,
मेरे माथे पर खिंच गई चिंता की रेखा,
पर्स के साथ पीछे की जेब लापता थी,
मै चीखा,कोई तो बताओ यार मेरी क्या खता थी,

रविवार, 6 मई 2012

रे ध्वनि ....

रे ध्वनि ,कुछ तो कहो तुम कौन हो ,
चीखती फिरती फिर इस दम किसलिए तुम मौन हो ,
रे ध्वनि ,कुछ तो कहो तुम कौन हो ,

मस्त करती मानसिकता शांत चित्त आनंन्द हो ,
अनुभूति की नव रौशनी और दिव्य परमानन्द हो
शांति की सरिता हो तुम या समुद्र का शोर हो ,
सहचरी हो जीव की या या जीव का तुम ठौर हो ...

रे ध्वनि ,कुछ तो कहो तुम कौन हो ,

गूंजती  है गूँज निर्जन बाग और खलिहान में ,
ध्वनि  मचलती है पवन के शोर में तूफ़ान में ,
कुछ तो कहो अब चुप न रहो अब शब्द के अवसान मे,
बोल दो मधु घोल दो तुम शब्द का सिरमौर हो,

रे ध्वनि ,कुछ तो कहो तुम कौन हो ,

कणिका  तुम्ही क्षणिका तुम्ही हर शै में बसती हो तुम्ही ,
शून्य दीखता शून्य पर ब्रम्हांड भी निर् ध्वनि नहीं ,
श्वांश का उच्छ्वांस का एहसास का तुम शोर हो ...
प्राण में पनघट में ध्वनि तुम ही हो या कोई और हो ,

रे ध्वनि ,कुछ तो कहो तुम कौन हो ,

नाता हो तुम जग से जगत का ,
सूत्र हो गत से विगत का ,
आधार तुम सब कार्य का ,शिष्टाचार हो व्यवहार का ,
मौन कैसे हो कोई जब व्याप्त तुम सब ओर हो ..
रे ध्वनि ,कुछ तो कहो तुम कौन हो ,



शनिवार, 10 मार्च 2012

होली की-सीख



                           होली की सीख                         होली की सीख



लिखने के लिए हों``` पढ़ने के लिए````` या``` बोलने के लिए```` कुछ विषय``` इतने बम ब्लास्ट होते है,
कि रिक्शे वाले````खोमचे वाले````झल्ली वाले से ले कर`````` भारत के प्रधान मंत्री तक``` का ```ध्यान आकर्षित कर ही लेते है|. ऐसा ही एक विषयी त्यौहार है भारतीय होली``````होली के बारे में तो`` बहुत कुछ लिखा`` कहा`` पढ़ा गया है`````````` ना जाने क्या क्या गढा गया है,

फिर भी जो कुछ रह गया है बाँकी,
मै यहाँ  पर उसकी दिखा देता हूँ झाँकी,
उत्तर प्रदेश कि होली,
साथ में देहाती बोली,
थोडा और लुत्फ़ उठाओ,
हमारे शहर में आओ,
यानी कानपूर,
आपकी सब मस्ती हो जाएगी काफूर,
कानपुर सेन्ट्रल जैसे ही आओगे,
बड़े बड़े इंसानी छोत अपने सामने पाओगे,
बदबू से आपकी फटने लगेगी
.
.
.
नाक,
सीना होगा छलनी हसरतें चाक चाक,
पस्त हो चुके होंगे आधे हौसले,
कुली कहेगा बाबूजी थोडा कानपुर घूम लें,
जैसे ही  स्टेशन से बाहर आएँगे,
ऑटो वाले साहब कह के का सामान उठाएंगे,
बाहर जब आप सन्निपात से जागोगे,
ऑटो रिक्शा खुद चला कर भागोगे,
कुछ ही देर में आप को पता चल जाएगा,
कि आप खोटा सिक्का तो चला सकते हो पर ऑटो आप से नहीं चल पाएगा,
गुस्से से ड्राइवर जब भ्रकुटी करेगा तिरछी,
ह्रदय में चुभ जाएगी स्वाभिमान की बरछी,
फिर भी मौन रहते हुए,
अनापेक्षित यातना सहते हुए,
शुरू करोगे यादगार सफर,
ड्राइवर सोंचेगा...आज अच्छा फंसा डफर,
अचानक धीरे से लगेगा आपको जोरदार झटका,
बिगड कर कहोगे अबे कहाँ ला पटका,
ड्राइवर बोलेगा.. चिल्लाइये मत गहरी साँस लीजिये,
कानपुर कि सड़कों के गड्ढों का दर्शन कीजिए,
विभिन्न किस्म के गड्ढे आप यहाँ पाएँगे,
गलती से पहली बार आए हैं,
दोबारा नहीं आएँगे,
अब आप मौन हो जाओगे,
छुप के अपना सर सहलाओगे,
बार बार ऑटो खाएगा हिचकोले,
करोगे अनुभव जैसे धरा डोले,
पर आपके सर तो चढा होगा होली का खुमार,
क्यों की योजना बना कर आये थे बेशुमार,
अब छोटी मुसीबतों से घबराना क्या,
चाहे जितनी हो अनजान डगर लडखडा कर गिर जाना क्या,
सोंच ही रहे थे ये सब क्या है बखेडा,
तभी ऑटो के अंदर आया गोबर का थपेड़ा,
आपकी सूरत देख ड्राइवर बेसाख्ता हंसा,
ऑटो से उतरते ही पैर घुटनों तक कीचड में धंसा,
किराया सुनकर कलेजा मुंह तक आया,
ड्राइवर बोला, शुक्र करो आपसे धक्का नहीं लगवाया,
पीछे गली में गूँज रही थी गाली,
मै,पर्स,दिमाग,जेब हर जगह से हो चुका था खाली,
कानपुर आ कर मुझे अच्छी मिली सीख,
भाग्यशाली हूँ जो स्टेशन पर मांग रहा हूँ भीख,
                                          भाग्यशाली हूँ जो स्टेशन पर मांग रहा हूँ भीख......