धीरज धरम मित्र - धीरज धरम मित्र अरु नारी, आपति काल परखिये चारी.........हे इन पंक्तियों के महान रचयिता कहाँ हो...? रक्षा रक्षा करो....
पुकारते पुकारते थक गया हूँ..लेकिन हम लेखक द्वय को धीरज के साथ धरम को मानते हुए अर्सा हो चला है....इस अर्से में मित्रों ने देख कर भी अनदेखा करना शुरू कर दिया....कइयों नें तो ये भी अपने चपरासी से कहलवा दिया कि,साहब ऑफिस से लैप्स है और लैपी बाँटने गये हैं.....अंतिम उम्मीद नारी से थी....पर नारी की गारी सुन कर लेखनी की पूरी स्याही सूख गई.....भला हो नुक्कड़ के पनवाड़ी का जिसने बिल्कुल सटीक सलाह दी.....बिल्कुल मोहन भागवत वाले अंदाज़ में जो आडवानी को दी गई थी.....उसकी बात मेरे भी समझ में आई.....पुलिस धीरे धीरे मेरी ओर बढ़ रही थी और मैं वकीलों को फोन घुमाने में लगा था....किस्मत की बलिहारी....कोई वकील लेखक का केस लड़ने को राजी नहीं हुआ....हर दरवाजा खटखटाने के बाद.....हार मान कर फिर उसी पनवाड़ी की शरण में पंहुँचा....हाँथ जोड़ कर गिड़गिड़ाते हुए कहा....हे मुख शुद्धी कारक व्यवसायि....रक्षा करो रक्षा करो....अब तक पनवाड़ी की समझ में सब आ चुका था....धीर गम्भीर कुटिल मुद्रा बना कर पान चबाते हुए कहा....शांत हो जाओ वत्स.....मुझे पता है....तुम सरकार से हो चुके हो त्रस्त....किंतु सरकार भी क्या करे.....अपना वोट बैंक बचाते बचाते हो गई है पस्त....अब आखिरी में बचते हैं हम...हमको देखो....रहते हैं हर समय मस्त....मेरी दुकान पर आए हो तो हर कष्ट से बचाउँगा...
पुलिस हो या पहलवान दिन में तारे दिखाउँगा...
मैने कहा- भाई अब तो तुम्ही आखिरी उम्मीद हो...खैर पनवाड़ी की कृपा से जमानत हो चुकी है...लेखनी की जगह सरौता पकड़ना सीख रहा हूँ.....क्यो कि, बेबाक लेखन की मुसीबत झेलने के बाद....पनवाड़ी का पॉवर अच्छी तरह देख रहा हूँ.....
अंत में यही कहुँगा-बच जाते जो जलती आग में हाँथ सेंका नहीं होता,
क्योकि- लेखकिय जमात में कभी एका नही होता।
भले ना हो पास मेरे शब्दों का खजाना, ना ही गा सकूँ मै प्रसंशा के गीत, सरलता मेरे साथ, स्मृति मेरी अकेली है, मेरी कलम मेरी सच्चाई बस यही मेरी सहेली है..
शुक्रवार, 23 अगस्त 2013
मै ना बोलुँगा....
गुरुवार, 22 अगस्त 2013
मीठा माहुर.
भूख से लड़ कर भी कैसे मौत कोई रोक ले,
मुनिया की अंतड़ियों को गर सरकार यूँ ही नोच ले,
क्यूँ रहे देता दुहाई नियम और कानून की,
ना गिरा बूंदे जहर की आँख अपनी पोंछ ले।
बहरे शहर में कब तलक चीखेगा यूँ बेसाख्ता,
आँख के अंधे घरों से कैसे कोई झाँकता,
दौड़ कर कैसे उठाते लाश उस मासूम की,
लाश ले अपनी चले मिला जैसा जिसको रास्ता।
सबकी वाणी में यहां पर देखो कैसा ओज है,
कल मरी थी दामिनी और आज कन्या भोज है,
भूख की बातें न कर भूख से बच जाएगा,
खा कर ज़हर स्कूल में अब मरते बच्चे रोज़ हैं।
फिर भी करेंगे गर्व हम खुद पे अपने देश पे,
नाज़ होता ही रहेगा संस्कृति औ परिवेश पे,
मौत चाहे फिर बंटे हर गाँव के स्कूल में,
कल करेंगी पीड़ियां संताप अपने शेष पे।
मंगलवार, 20 अगस्त 2013
कर्णधार
रोज सब बखिया उधेड़ें देश और आवाम की,
अपराध का अड्डा है संसद गरिमा है बस नाम की,
चुप रहो कुछ कह न देना चुन के आये है सभी,
उसने चुना है इनको जो रोटी ना चुन पाया कभी,
क्या फरक पड़ता है इनको सिन्नी हो परसाद हो,
इनको है खाने से मतलब मुल्क ये बरबाद हो,
कानून की आँखों पे पट्टी है बंधी इस देश में,
पिंजरे में घुस बैठी है सीबीआई तोता वेष में,
कटोरा अपना मत छुपा सरकार की नज़रों में है,
देश अलबत्ता भयानक रूप से खतरों में है,
ना जरूरत है चढ़ाने की किसी को शीश के,
जब भी चाहेंगे उतारेंगे वो सर दस बीस के।
सोमवार, 19 अगस्त 2013
केदारनाथ की विभीषिका
गड़ड़ गड़ड़ की ध्वनि सुन कर,
दहल गया सर्वस मेरा,
चीख पुकार मची चँहु दिस,
काँप उठा ज़र्रा ज़र्रा,
पत्थर की बरसात हुई,
घनघोर अंधेरी रात हुई,
जाने कितने घर टूटे,
और जाने कितने,
बह निकले,
ऐसा लगता था जैसे,
पानी से पत्थर पिघले,
प्रलय का था मंजर सारा,
प्रकृति ने था खंजर मारा,
सब चीख चीख कर रोते थे,
अपने अपनो को खोते थे,
ना कोई अपना दिखता था,
बस काल ही किस्मत लिखता था,
भगवान ने भृगुटी की तिरछी,
हर तरफ थी केवल मौत बिछी,
रात सरकती जाती थी,
हर आहट दिल धड़काती थी,
हुई सुबह सब दहल गये,
हो ज़मीदोज सब महल गये,
बस लाशें लाशें लाशें थी,
रुक चुकी सभी की साँसे थीं,
जो जीवन अब भी बाँकी था,
वो लाचारी की झाँकी था,
पर रुके नही थे इंद्र अभी,
जारी जीवन के द्वंद स़भी,
खौफ़ भरा था हर चेहरा,
ईश्वर बन बैठा था बहरा,
शिव बैठे थे शव के ऊपर,
या शव लेटे थे शिव के ऊपर,
तांडव नृत्य हुआ भारी,
तेरी शिव महिमा न्यारी,
नेत्र तीसरा खोल दिया,
पर्वत भी बम शिव बोल दिया,
हाहाकार मचा भारी,
अब त्राहिमाम हे त्रिपुरारी,
त्राहिमाम हैं त्राहिमाम,
मृत्युंजय तुमको है प्रणाम,
बरखा रुकी जगा जीवन,
प्राण बचा भागे सब वन,
आशा ने साथ ना छोड़ा था,
अब भूँख ने नाता जोड़ा था,
पर खाना पानी नही मिला,
ना वहाँ किसी का दिल पिघला,
अब सजी दुकानें लालच की,
पाखंडी लोभी स्वारथ की,
आज कोई ना दानी था,
सौ रुपये में बोतल पानी था,
दूध भी दो सौ रुपये का था,
हर धंधा अब तो नफ़े का था,
कपटियों का आलम ना पूँछो,
क्या हुआ वहां पर ना पूँछो,
अब बचे रहे तो कह लेंगे,
आगे अब आप भी दहलेंगेे,
जंगल में घना अंधेरा था,
विपदाओं ने घेरा था,
एक माँ थी बेटी साथ लिये,
बैठी थी हाँथ में हाँथ लिये,
दिल धड़क रहा,
मन लरज़ रहा,
अब कलम भी मेरी काँप रही,
होनी विपदा को नाप रही,
दो राक्षस जंगल से निकले,
मनविकृत बुद्धि से थे छिछले,
हाँथ पकड़ कर बेटी का,
बाल उखाड़ा चोटी का,
वस्त्र भी उसके फ़ाड़ दिये,
माँ चीखी सूखा हाड़ लिये,
कोई तो मदद करो आ कर,
खुद उलझ पड़ी वो चिल्ला कर,
तभी रोशनी एक चमकी,
माता की आँखे दमकी,
रणचंडी सी बनी हुई,
फिर टूट पड़ी वो तनी हुई,
बेटी को माँ ने बचा लिया,
स्वरक्त से मेंहदी रचा लिया,
अब बैठे मिल कर साथ सभी,
बाँकी थी आधी रात अभी,
होंठ सभी के सूखे थे,
सब तीन दिनों से भूखे थे,
आँखों मे रात बिता डाली,
अब चमकी सूरज की लाली,
भेद ना था कुछ भाषा का,
हुआ सवेरा आशा का,
आ गये बाँकुरे भारत के,
पुतले सब परमारथ के,
वो आ पँहुचे हैं धैर्य धरो,
बस थोड़ा सा तुम सबर करो,
रस्सों का सेतु बना दिया,
खुद को रस्सों पर बिछा दिया,
मानव निर्मित मानव पुल था,
ये भारत का मानव कुल था,
इस पार सभी को ले आये,
जान बचा सब घर आये।
ये रचना अपूर्ण है....इसलिये क्यों कि....जिस पीड़ा को केदारनाथ धाम में फ़ंसे हुये लोगों ने झेला..उसका रंच मात्र भी मैं अपने शब्दों में व्यक्त नही कर पाया हूँ.......
सभी मित्रों से विनम्र निवेदन है कि, प्रस्तुत रचना को कृपया "लाइक" ना करें.......सादर.....सस्नेह....राजेन्द्र अवस्थी।
गुरुवार, 15 अगस्त 2013
मेरा भारत महान
अब तो अझेल ये कांग्रेस राज हो गया,
सस्ता हो गया आदमी मंहगा प्याज हो गया,
कितनी ईमानदारी से करते है बेईमानी देखो,
भ्रष्टाचार में नंबर वन हिन्दुस्तान हो गया,
और बारिश से अब डरने लगे है लोग,
अबकी बरसात में पूरा शहर टाइटेनिक जहाज हो गया,
दुहाई देते है सब इंसानियत की मगर,
न जाने कितने बच्चो का कत्ले आम हो गया,
सुन कर अब तालियाँ मत बजाओ लोगो,
मेरा ये पैगाम भी बदनाम हो गया,
मल्टीमिडिया सेट बच्चे भी रखते है जेब में,
इसीलिए तो मित्रो नेटवर्क जाम हो गया
अब तो स्कूल में होता है बलात्कार,
ये कैसी शिक्षा का प्रचार हो गया,
कटे हांथो से देश की पकडे हो बागडोर,
तभी तो कही संसद भवन कही अक्षरधाम हो गया,
हवाओ में भी यारो घुल रहा है अब जहर,
फिर भी मेरा भारत महान हो गया........फिर भी मेरा...
राजेन्द्र अवस्थी (काण्ड)
ये कैसी आज़ादी
एक बच्ची खड़ी थी तिरंगा लिये हाँथ में,
तन मैला मन उजला फूल झरें हर बात में,
उसे ना थी पता पंद्रह अगस्त की विशेषता,
भावनाओं का उथलापन संवेदना की निशेचता,
मालूम ना था अभी छोटी है,
पुत्र नहीं बेटी है,
है कोई ईश्वर या है कहीं परमात्मा, बस
तिरंगे के रंग में रंगी थी उसकी आत्मा,
नहीं मालूम था उसे संविधान भी,
टाफी बिस्किट मिलने का प्रावधान भी,
माँ ने सुनाई थी कथा तिरंगे के स्वाभिमान की,
और याद थी दो पंक्तियाँ उसे देश गान की,
झंण्डा ऊँचा रहे हमारा,
विजयी विश्व तिरंगा प्यारा,
मद्धम स्वर में गाती थी,
तीन रंग एक साथ वो अपने हाँथों से लहराती थी,
तभी लोग चिल्लाये नेता जी आ गये,
नेता जी के साथ आये लोग,
आधे से ज्यादा टाफी बिस्किट खा गये,
जो जिसके हाँथ लगा लोगों ने छाँट लिया,
बचा खुचा सामान आयोजको ने बाँट लिया,
गले पड़े हार हुई पुष्प वर्षा नेता जी फूल गये,
इस आपाधापी में झण्डा लहराना भूल गये,
तभी बोला नेता जी का एक मुस्टंडा,
नेता जी जल्दी में हैं आप खुद फहरा लेना झण्डा,
हम सब के पीछे से झण्डे के नीचे से,
स्वर गूँजा- झण्डा ऊँचा रहे हमारा,
विजयी विश्व तिरंगा प्यारा,
बच्ची ने देश गान जोर से गाया,
उत्साह से लबरेज़ तिरंगा लहराया,
अफसोस ना था उसे खाली हाँथ होने का,
बस उल्लास था ज़मीन में तीन रंग बोने का,
नारंगी टाफी,सफेद बिस्किट,हरी चॉकलेट,
कुछ दिन बाद मिलेगी,
तब शायद माँ भारती के होंठो पर मुस्कान खिलेगी।
"राजेन्द्र अवस्थी"
शनिवार, 11 मई 2013
तेरा आँचल
जीने के मोड़ पर बैठ कर,
सिसकते हुए पुकारा है कई बार,
कई कई बार, माँ को,
और फिर मैने देखा है,
पनीली आँखों से माँ को,
अपने होंठो पर उंगली रख कर,
मुझे चुप हो जाने का इशारा करते हुए,
तब मुझे ज्ञान नहीं था,
आत्माओं के बारे में,
लेकिन ना जाने क्यों,
वो जीने का मोड़,
माँ की गोद का अहसास कराता था,
और अक्सर ही महसूस होती थी,
माँ की छुअन उस मोड़ पर,
अचानक ना जाने क्या हुआ?
मैं वही हूँ,
जीने का मोड़ भी वही है,
पर माँ नहीं दिखती अब मुझे,
क्या आँखो का पानी मर चुका है?
या मेरी नज़रे कमज़ोर हो चुकी हैं?
या मुझे ज़रूरत नहीं रही माँ की?
या संवेदनशीलता खत्म हो चुकी मेरी?
नहीं नहीं मैं इतना पाषाण ह्रदय नहीं हो सकता,
हाँ शायद मैने विकल्प तलाश लिया है,
माँ का,
हाँ ये सच है,
तुझमें माँ दिखती है मुझे,
मेरे जीवन साथी के रूप में,
आखिर तू भी मुझे कभी रोने नही देती,
हाँ तू माँ है,
ये सच है कि, तू माँ भी है
बुधवार, 8 मई 2013
मुर्दों का मिलन
रोज़ रात को बिस्तर के ऊपर,
आलिंगन,
रात जितनी काली होती है,
निषिद्ध इच्छाएँ भी बलवती होती हैं,
थके हुए बदन,
बनावटी संवेदना लिये,
गजरती रात में,
रोज मिलते है दो मुर्दे,
इस मिलन के साक्षी हो जाते है,
अनचाहे ही,
तकियों के गिलाफ़,
जो महसूस कर लेते हैं,
आंसुओ के नमकीन स्वाद को,
बिस्तर की चादर पर पड़ी सिलवटें,
देती हैं गवाही,
किसी के पुरुषार्थ की,
कमरे में रक्खी हर चीज़,
आतंकित हो जाती है,
रात के आने के साथ ही,
क्रूरता,लिप्सा,पीड़ा की,
जननी क्यूँ है रात?
बुधवार, 17 अप्रैल 2013
दरारों से झांकते लोग
जैसे ही खोलो द्वार दूर भागते हैं लोग,
किवांड़ दिल के खोल कर पूँछा है बारहाँ,
साँसे बची हैं चंद जाँ चाहते है लोग,
गुज़री तमाम उम्र उमरा तलाशते,
दिल भी नहीं है पास तो क्या चाहते है लोग,
परिंदो पर है नज़र सैयाद की मगर,
घोंसलों से ही परवाज़ चाहते हैं लोग,
फुसफुसा के बात करना हक है सभी का,
महफिलों की शम्मा बना चाहते हैं लोग,
जो मिल नहीं सकता वही चाहते हैं लोग,
फूलों को भी एक बूंद ओस की तलाश है,
खुशबू नही है अब मकरंद चाहते हैं लोग,
सब कर रहे है साबित खुद को खुदा मगर,
काबिल नही हैं फिर भी हुनर चाहते है लोग,
कहना है कुछ अगर तो कहो प्यार से मगर,
खुद लगाई आग में जला चाहते हैं लोग,
राजेन्द्र अवस्थी (काण्ड)
बुधवार, 27 फ़रवरी 2013
माँ तुझे एक बात बतानी है
मैं जान ना सका अब तक,
क्यों तेरी आँखों में रात सिमट आती थी,
बिस्तर की नमी तेरे कपड़ों से लिपट जाती थी,
भले ही अब तू फरिश्ता आसमानी है ,
माँ तुझे एक बात बतानी है ,
देख मेरे लड़खड़ाते कदम,
हर पल तेरा निकलता था दम,
मेरे आँसू जो दिख जाते तुझको,
बारिश तेरी पलकों से उमड़ आती थी,
क्यों दिखती परेशान सी तेरी पेशानी है ,
माँ तुझे एक बात बतानी है ,
तुझे उम्र भी नहीं दिखती अब आँखों से,
बूढ़ा नहीं बड़ा हूँ मैं पर वही प्यार झलकता तेरी बातों से,
माँ मेरे पास तू मेरी अपनी निशानी है ,
माँ तुझे एक बात बतानी है ,
याद नहीं करता तुझको तू सदा साथ है हर पल,
बस एक बार आ उंगली पकड़ मेरी साथ तू ले चल,
है तू ही जागीर मेरी माँ तू ही कहानी है
माँ तुझे एक बात बतानी है ,।
राजेन्द्र अवस्थी (काण्ड)
रविवार, 20 जनवरी 2013
दुनियां छल बल की,
निज अपनो का व्यवहार बदलते देखा,
सीख मिली नूतन सी मुझको,
फिर भी मन है भारी,
व्यथित ह्रदय होता है पल पल,
सोच के हे त्रिपुरारी,
सरित प्रेम को मिल प्रपात में,
धार बदलते देखा,
मैने तो रिश्तों का कौमार्य.......
पलक झपकते बदली दुनियां,
मुझ गंवार पागल की,
खुली आँख तो देखा अचरज,
है दुनियां छल बल की,
बचपन से अब तक खुशियों को,
द्वार बदलते देखा,
मैने तो रिश्तों का कौमार्य.........
पुरखों की सत शिक्षाओं को,
उर में धारण कर के,
पल पल देखा खुद को खुद में,
अह्लादित हो मरते
पीछे आते राही को हाँ,
राह बदलते देखा,
मैने तो रिश्तों का कौमार्य.......
कैसी दुनियां कैसे रिश्ते,
मतलब के सब साथी,
जाने कब तक लिये चलूंगा,
संस्कारों की थाथी,
अच्छा हुआ कहूं मै कैसे ,
सधवा का श्रंगार बिखरते देखा,
मैने तो रिश्तों का कौमार्य उतरते देखा।
बुधवार, 21 नवंबर 2012
मच्छरों का पे कमीशन
निर्माणी के कामगारों से ज्यादा मच्छरों को भा गया..
कल रात अनुभाग में में बैठे मै सुन रहा था ,
एक मच्छर अपनी पत्नी से कह रहा था ,
"अरी भागवान अब दिन बदल जाएंगे अपने ,
कभी देखा करते थे हम खालिस खून के सपने ,
अब सारे ख्वाब पूरे हो जाएँगे ,
मजदूर से लेकर महाप्रबंधक के खून की दावत हम उड़ाएँगे ,
पहले हम मजदूरों का खून पीते थे ,
कैसे घिसट घिसट कर जीते थे ,
मजदूरों के खून से आती थी रोटी प्याज की महक ,
जिसको पीते ही सीना जाता था दहक
आफिसरों की दया से मर मर कर जी रहे थे ,
जान पर खेल कर अधिकारियों का खून पी रहे थे ,
पर अब नहीं उठाना पड़ेगा ज्यादा खतरा ,
डंक घुसा कर निकाल लेंगे खून का एक एक कतरा ,
जब वेतन आयोग की खुशी में हो जाएँगे सब चूर ,
जश्न मनाएंगे दारू पियेंगे भरपूर ,
तब आधी रात में हम अपना काम दिखाएँगे ,
नशे में मदहोश पड़े लोगों के तन में अपना डंक चुभाएंगे ,
न कोई दर ना कोई आफत ,
खून के साथ साथ चलेगी दारू की दावत ,"
मच्छर की बातों ने मेरे स्वाभिमान को जगा दिया ,
मैंने कछुआ छाप अगरबत्ती जला कर मच्छरों को भगा दिया ,
ये जान कर हुई ह्रदय में बहुत ही पीड़ा ,
कि मच्छर भी समझते है इंसानों को दारू का कीड़ा ...
शनिवार, 10 नवंबर 2012
भाग्य
कर्म थकन से चूर हो गया,
श्रम को रोते देख सडक पर,
हँसने को मजबूर हो गया,
मैं मानव हूँ मै सब कुछ हूँ ,
कैसा ये गुरूर हो गया,
शायद सुख का नशा चढ़ा है,
इसीलिये मशहूर हो गया,
अपनो ने चाहा कुछ ऐसे,
नज़रों का मै नूर हो गया,
है बला कौन सी प्रेम ना जानूं,
आशिक फिर भी जरूर हो गया,
लगी लगन कुछ ऐसी तुमसे,
लिखने का कुछ शउर हो गया,
पीने का मन नही आज पर,
शाम जाम का दौर हो गया,
कली कली में अक्स तुम्हारा,
सारा आलम हूर हो गया,
मै क्या जानूँ तुम कैसी हो,
मिलन का सपना चूर हो गया।
बुधवार, 7 नवंबर 2012
सजन का गाँव..
जहाँ सत्य की खुशबू आती हो,
कोकिल पंचम स्वर मे गाती हो,
अल्हणता मदमाती हो,
जहाँ दादी गीत सुनाती हो,
कली कली मुस्काती हो,
अम्बुआ की अमराई हो,
दिलों मे राग पनपते हो,
सपने नयनों में पकते हो,
जहाँ मिट्टी वाले कुल्हण हों,
चौपाल मे जिसकी हुल्लण हो,
जहाँ गउव्वें धूल उड़ाती हों,
जहाँ बुलबुल चोंच लड़ाती हो,
जहाँ बातों की फुलझड़िया हों ,
जहाँ दाल मुंगौड़े बड़ियाँ हों,
इच्छाएँ भी छोटी हों
मक्के की सोंधी रोटी हो,
जहाँ साग हरी सरसों का हो,
सामान ना सौ बरसों का हो,
जहाँ चूल्हा चक्की आंटा हो,
जहाँ चिमटा चौकी पाटा हो,
जहाँ मस्जिद संग शिवाला हो,
अजान भजन स्वर माला हो,
बिखरी स्वछंद हवाएं हों,
माँ,पिता की संग दुवाएं हों,
रविवार, 4 नवंबर 2012
घोड़ा गाड़ी
बप्पा हम लेबे गाड़ी,
साइकिलौ खचड़िया होइ गै है,
अब लेबै हम इंजन वाली,
हम बोलेन गाड़ी का करिहौ,
मँहगाई ससुर बहुत बाढ़ी,
एकु घोड़ा तुमका लई देबे,
गाड़ी तौ जंग लगी ठाढ़ी,
पेट्रोल मा आगी लागि रही,
डीजल कऱू तेल होइगा,
गैसौ भभकि रही द्याखौ,
मिट्टी क तेलु तिली होइगा,
खुब समुझावा हाँथ जोरि,
तब छाँड़ेन उई अपने मन कै,
फिरि घोड़ा हमहूँ लई आएन,
अम्बेसडर कार जइस चमकै,
जब देखेन उई घोड़ा कइती,
तौ सिब्बल जइस खुबै भड़के,
हम पूँछि रहेन यो कइस लाग,
उइ मौन सुरन मा सब कहिगे,
अब गाँव भरे मा बम बम होइ गै,
पाहुन होइ आये संतोषा नंद(गधा ),
एकु घोड़ा लावै गए रहएं ,
लै आए गदहा मूरख चंद,
ना लेबे गाड़ी लरिकउ कहेन,
अम्मौ आँखी खुब लाल कियेन,
हम देस के मुखिया जइस गुरू,
बस मंद मंद मुस्कात रहेन।
शुक्रवार, 2 नवंबर 2012
ललक.............
लिया अम्बर ज्यों ही,
जिज्ञासा की डोर बंधी,
उड़ चलीं गगन के पार कहीं,
लिखने जीवन की नई कहानी,
क्षितिज पार जाने की ठानी,
गीत बहारों का गाती वो,
पंख हिलाते फड़काती वो,
नीड़ रेशमी छोड़ दिया फिर,
कौंधी बिजली आइ घटा घिर,
पर उल्लास ह्रदय भर अपने,
चलीं ख्वाब सब पूरे करने,
नैनों में आशा के कण थे,
यही ज़िंदगी के वो क्षण थे,
कलियों ने मौसम तौला था,
खुशबू से तन मन डोला था,
लेकिन विधिना की पाती मे,
छिपा ना जाने क्या माटी में,
दूर बहुत ही देर तलक,
उड़ती जाती बढ़ती थी ललक,
अब थकन से दोनो चूर हुई,
अपनों से भी वो दूर हुई,
दिन कटते थे अलग अलग,
रातें कटती थी बिलख बिलख,
पर सपने उनके चुके ना थे,
इसलिये कदम भी रुके ना थे,
हर रोज़ नया आयाम लिये,
आती थी भोर पयाम लिये,
लेकिन यादें तड़पाती थी,
हंसते रोते आ जाती थीं,
अब सही ना जाती थी दूरी,
घर में सब इच्छा हो पूरी,
ये ठान लिया भीतर मन के,
बज उठे राग सब जीवन के,
उड़ चली व्योम भर पंखों में,
ध्वनि मचल उठी सब शंखों में,
सनन सनन गति बढ़ती थी,
आगे बढ़ने को लड़ती थी,
दोनों ने नज़रें दौड़ाई,
दिख गई नीड़ की परछाईं,
लिपट गईं मन प्यार भरे,
खूब नैनों से उद्गार झरे,
वृक्ष भी हर्षित डोल उठे,
बागों के भंवरे बोल उठे,
मत करना फिर से नादानी,
अब करो खतम तुम मनमानी।
शनिवार, 27 अक्टूबर 2012
साली बरखा की फुहार
प्रभु गोरी दो या काली दो बस मुझको तुम एक साली दो,
पत्नी एग्रिमेण्ट भले ही हो पर साली महिमा माया है,
पत्नी धूप भरा जीवन पथ साली सावन छाया है,
पत्नी साथ भले ही हो पर घर सूना सा लगता है,
साली यदि हो पास कभी तो सब दूना सा लगता है,
मुझे मक्खन खीर मलाई की ना भरी हुई तुम थाली दो,
प्रभु गोरी दो या काली दो...........
पत्नी घर का काम काज और चूल्हा चौका बर्तन है,
साली वर्षों की मेहनत का क्षणिक ह्रदय परिवर्तन है,
पत्नी नित दिनप्रतिदिन का बेजान पुराना कीर्तन है,
और साली बरखा की फुहार में विद्युत जैसा नर्तन है,
मेरी उजड़ी बगिया को फिर हरा करे वो माली दो,
प्रभु गोरी दो या काली दो बस मुझको तुम एक साली दो,
पत्नी का मै नौकर हूँ और साली पर मै रीझा हूँ,
कुरूक्षेत्र के घमासान का प्रस्तुत स्वयं नतीजा हूँ,ं
मुँह कड़वाहट से भर जाए मै सड़ा हुआ वो बीजा हूँ,
रस विहीन जीवन जिसका वो बदनसीब मै जीजा हूँ,
हे भगवन सीधी साधी दो या फिर कोई बवाली दो,
प्रभु गोरी दो या काली दो बस मुझको तुम एक साली दो,
पत्नी कैथे की चटनी और साली बेल मुरब्बा है,
पत्नी सूखी मटर है साली चॉकलेट का डब्बा है,
कूलर लगती घरवाली और साली ठण्डा एसी है,
पत्नी देसी खादी है और साली वस्त्र विदेशी है,
हे भगवन अब कृपा करो वरदान मुझे मत खाली दो,
गोरी दो या काली दो बस मुझको तुम एक साली दो,
मलाला
गर मिला है विष उसे पीना भी चाहिये,
थूंक दो समर्थन करने वालों के चेहरो पर,
विस्फोट करो समाज औ संस्कृति के पहरों पर,
हमदर्दी से सहलाते पीठ वाले हाँथो को,
लच्छेदार मीठी चिकनी चुपड़ी बातों को,
कर दो बेनकाब समाज के ओहदेदारों को,
दे दो अब जहर मानवता के गद्दारों को,
हम कोई बहस नही करेंगे तुम पर मलाला,
फिर से इंसानियत का मुँह हुआ है काला,
जियो बार बार जियो स्वाभिमान मरने मत,
इंसानों की बस्ती में खुद को डरने मत देना,
गवाही देता है इतिहास मानवता का,
होता असफल हर प्रयास दानवता का,
सदियों से नारी होती रही समर्पित,
अब तुम खुद को मत करना अर्पित,
सर उठा कर मारो गाल पर तमाचे,
यदि फिर कोई नारी की अस्मिता को बाँचे,
तुम्ही ने दिये थे बेशुमार अधिकार,
अपना मालिक बना दिया हो निर्विकार,
अभी और कितना सहोगी,
कब तक चरणों की दासी रहोगी,
छीन लो अपनी तेजस्विता को,
गढ़ो फिर से अपनी मधुमिता को,
अब चर्चा तुम पर ना हो कुछ ऐसा करो,
मारो पाखण्डियों को पर तुम ना मरो।
रविवार, 21 अक्टूबर 2012
"विदेसी"गंगाजली देसी कमण्डल
योह द्याखो भारत मा कइस खड़मण्डलु होइगा,
"विदेसी"गंगाजली,देसी कमण्डलु होइगा,
मंहगाई रूपी नीर बहाएन भारतु मां,
औ सम्मान देसु का चौपट कीन्हेन स्वारथ मां,
अरे यहु तौ अब बेसरम पौध डण्ठलु होइगा,
योह द्याखौ भारत मा कइस.....
मजबूरी का हरदम गाएस है योह गाना,
चुप्पी साधे कुर्सी पर बइठा बलवाना,
मारे पानी आँखिन का यो बण्डलु होइगा,
योह द्याखौ भरतु मा कइस.......
साशन औ अनुसासन का यो नाम डुबोएस,
अकल मा एहिके पाथर परिगे इज्जत खोएस,
धान का बोझा अस यो मूड़े का कण्डलु होइगा,
योह द्याखौ भारतु मा कइस खड़मण्डलु होइगा।
सोनचिरइय्या देसु का यो मरघटु कई दीन्हेस,
देश के मुखिया की जबते यो पदवी लीन्हेस,
कुटिल लीडरन का भारत अब जंगलु होइगा,
योह द्याखौ भारत मा कइस खड़मण्डलु होइगा।
गुरुवार, 18 अक्टूबर 2012
पागल कवि
धरती से अम्बर तक जाना,
शब्दों का अनमोल खजाना,
बेढ़ंगी सोंचो को गढ़ना,
निपट अकेला आगे बढ़ना,
नूतन रोज फसल बोता है,
क्या कवि पागल होता है?
जीवन की आपाधापी को,
पुन्य प्रतापी और पापी को,
पतझर को मधुमास बनाता,
एकाकी रंग रास रचाता,
स्वर्णिम पल पल में खोता है,
क्या कवि पागल होता है?
नई दिशा दर्शन देता है,
अतिशय दर्द प्रखर लेता है,
मौन मनोभावों को सबके,
चुन के शब्द मुखर देता है,
संवेदित मन मीत बना कर,
उर के अंदर ही रोता है,
क्या कवि पागल होता है?
विरह वेदना की ज्वाला को,
प्रेम प्रीत की मधुशाला को,
पीड़ा की कंटक माला को,
अंतस की कड़वी हाला को,
उद्गारों को भर प्यालों में,
सुकरात के जैसे विष पीता है,
क्या कवि पागल होता है?