शनिवार, 25 अगस्त 2012

प्रेम अगन


मन भीतर की प्रेम अगन तुम कैसे कहो बुझाऊं मैं
राधा राधा कहते कहते क्या कान्हा बन जाऊँ मैं,                                              तान सुरीली धड़कन वाली कम्पित झंकृत होती है,
लाल सुनहरे हरे बैंगनी रंग नयन मे बोती है,
तुम नयना नीचे कर लेती मौन हो क्या समझाऊँ मैं,
मन भीतर की प्रेम अगन तुम कैसे कहो बुझाऊं मैं,
राधा राधा कहते कहते क्या कान्हा बन जाऊँ मैं,
बीती ऋत सावन की फिर भी कोयल गीत सुनाती है,
तेरे मेरे प्रेम की वीणा निशदिन मधुर बजाती है,
तुम भी सुन लो प्रेम रागिनी क्या कोयल बन गाऊँ मैं,
प्रेम अगन
मन भीतर की प्रेम अगन तुम कैसे कहो बुझाऊं मै,
राधा राधा कहते कहते क्या कान्हा बन जाऊँ मैं,
बिजुरी तड़प रही विरहन सी घटा ह्रदय पर छाई है,
हरे विधाता जतन करो कुछ कैसी अगन लगाई है,
प्रेम अनल निर्मल सब कहते फिर क्या मलय लगाऊँ मैं,
मन भीतर की प्रेम अगन तुम कैसे कहो बुझाऊं मैं,
राधा राधा कहते कहते क्या कान्हा बन जाऊँ मैं,

शनिवार, 18 अगस्त 2012

खोज ...


भाई चारा प्रेम जहाँ है, मुझको वो संसार बता दो,
भस्म करे जो कुंठाओं को मुझको वो अंगार बता दो,
रिश्ते नाते मिलें जहाँ पर मुझको वो बाजार बता दो,
धुलते हों सब पाप जहाँ पर मुझको वो तालाब बता दो,
मन संताप करे जो शीतल मुझको वो आफताब बता दो,
घुमा फिरा कर बहुत कह चुके मुझको अब सब साफ बता दो,
देख सकूँ जो खुले नयन से ऐसा कोई ख्वाब बता दो,
आग पेट की बुझा सके जो ऐसा कोई यत्न बता दो,
तार दे सबको अन्त पलों में ऐसा कोई पुन्य बता दो,
समझे मेरी बात सभी बस ऐसा कोई जाप बता दो,
नेता कद मेरा हो जाए ऐसी कोई नाप बता दो,
निर्मल मन सबका हो जाए ऐसा कोई ताप बता दो ,
प्यार करे जो निश्छलता से ऐसा कोई साँप बता दो,
ले लोगे क्या प्राण मेरे तुम अभी मुझे चुपचाप बता दो,

बुधवार, 15 अगस्त 2012

अविश्वास


तुम हमेशा साथ रहीं मेरे,
ये मान कर कि मै तुम्हे प्यार नहीं करता,
मैने कई बार कहा कि ये सही नही है,
लेकिन तुम अपने मन मे उपजे विश्वास पर अटल रहीं,
अटल मै भी रहा अपने कथन पर,
बच्चों का बचपन बीत गया,
मौसम भी बदलते रहे,
करवाचौथ का चाँद और देर से निकलने लगा,,
मै भी रहा तुम्हारे ही पास,
फिर भी,
तुमको नही लगा कि मै प्यार करता हूँ,
तुमसे,
तुम्हारी साँसो की तीव्रता बताती रहती है,
 आज भी तुम उसी भरोसे से साथ हो,
कि यकीन कर सको मेरी बात पर,
भरोसा कर सको मेरे भरोसे का,
मै जानता हूँ विश्वास को तुम,
जाहिर नही करतीं खुद पर भी,
कहीं मै ना जान लूँ तुम्हारे विश्वास को,
इसी डर से,
तुम कहीं नहीं जातीं,
कभी नही जातीं,
मुझसे दूर,
ख्वाब में भी,
बस अविश्वास को जीते रहना चाहती हो,
साथ मे रह कर,

मंगलवार, 14 अगस्त 2012

गरीबी का झुनझुना



मोबाइल बनेगा गरीबों का साथी,
जैसे दिया और बाती,
मोबाइल की स्क्रीन पर दिखेगी रोटी,
खाने की थाली में रक्खी हुई बोटी,
दिखेगा कपड़ा, हरियाला सा बंगला,
मोबाइल कटोरा लिये भीख माँगता कंगला,
सिर्फ भूंख नहीं दिखेगी,
सरकार मोबाइल पर गरीबों की किस्मत लिखेगी,
रिंगटोन सुनोगे तो रोना भूल जाओगे,
वाइब्रेशन की थरथरी में झूला झूल जाओगे,
खाली जेब भारी हो जायेगी,
सब इच्छाएँ  ख्वाब मे पूरी हो जाएंगी,
दो सौ का टॉक टाइम मिलेगा मुफ्त,
सीमा रोजी रजिया से बाते करना गुप्त,
जीवन मे कुछ तो रस आएगा,
कम से कम गरीब आपस मे रोटी की बात तो कर पायेगा,
मुन्नी शीला का चल चित्र चलेगा,
मोबाइल जिसे ना मिला उसे बहुत खलेगा,
भूले बिसरे गीत खूब  बजेंगे,
औलाद वाले फूले फलेंगे,
फोन मिलने की खुशी में कॉग्रेस को देना वोट,
मौनी बाबा दोनो हाँथों से कपास लेंगे ओट,

राजेन्द्र अवस्थी (काण्ड)

शनिवार, 11 अगस्त 2012

नदी की प्यास


आसमानों से उतर कर मुझे खुशी हुई,
जब मैंने प्यासी वसुंधरा देखी,
समस्त जीव मेरी आरती उतारने लगे,
मै लहराती बलखाती,
चल पड़ी ऊंचे नीचे रास्तों पर,
प्रपात अपने पीछे छोड़ती हुई,
शक्ति का परिचय पाषाणों ने माँगा,
रेत का रूप दे दिया उनको,
वृक्षों ने मेरे यौवन को छूना चाहा,
उनकी जड़ो को हिला दिया मैंने
पर मुझे गौरव प्रदान किया मनुष्य ने,
मेरे किनारों को सहेजा संवारा,
मेरी शाखाओं को ले गया अपने घरों तक,
मै भी बच्चो सा मन लिये निर्मल करती रही,
सावन सी उन्मादित ऋतुओं को,
तभी कलकारखानों के मौसम में,
मेरी सांसों को धीमा किया जाने लगा,
मै समझ गई पर मानव ना समझा,
मैने भी नहीं की जिद ,
कारखानो की पैदावार रोकने की,
फसलें लहलहाईं प्रगति की,
और मेरी सांसे और मद्धिम होती गईं,
मै आज भी जीवित हूँ,
कम होती सांसो के साथ,
अब मै प्रपात नही बनाती,
ऊंचे नीचे रास्तों को पीछे छोड़ दिया मैने,
रेत भी मेरी राह रोकती है अब,
शाखाएं अस्तित्वहीन हो चुकी,
ऋतुओं को अब परवाह नही मेरी,
किन्तु
कारखानों की फसल लहलहा रही है,

बुधवार, 8 अगस्त 2012

बचपन

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        मन बड़ी बड़ी बातें करते हुए छोटा सा बच्चा लगता है,
        यही बचपन मुझे अच्छा लगता है,
        साथ हो सरसता सरलता के,
        बीज उर धरे हो तरलता के,
        शीलता तो बरबस हो,
        स्वाभिमानी तरकश हो,
        हो शब्द की मधुर शाला तो अच्छा लगता है,
        बस यही बचपन तो मुझे अच्छा लगता है,
        चाल हो दुलक प्यारी,
        हरकतें भी हों न्यारी,
        ना हो बुद्धू ना ज्ञानी ,
       जानता हो ना जो ये आग है के है पानी,
        सीधा सा सयानापन  कच्चा लगता है,
        बस हाँ यही बचपन तो मुझे अच्छा लगता है।