रविवार, 26 अगस्त 2012

काली दलाली



निष्ठा और  ईमानदारी कोयले सी काली है,
इसीलिये प्यारी मुझे काली घरवाली है,
कजरारे नैनों की कंटीली सी दुनाली है,
चर्चा में मित्रों आज कोयले की दलाली है,
श्वेत श्याम नहीं कुछ श्याम श्याम खाली है,
 श्वेत खादी रोती आज संसद भी काली है,
घृणा करते है आज राजनीति से सभी,
भ्रष्ट नेताओं के कारण नेता शब्द गाली है,
भ्रष्टाचार लूटमार घोटालों की मची धूम,
भारत वर्ष बन गया किन्नर की ताली है,
जैसे चाहो वैसे काटो देश केक बन गया,
देसीघी के साथ मे विदेशी क्रीम डाली है,
हवा उल्टी दिशा से देखो आज चल रही,
बगिया उजाड़ रहा बगिया का माली है,
चहूँ ओर घोटालो की छाई आज घटा काली,
कान्हा अब राखो लाज रोवत सवाली है,

शनिवार, 25 अगस्त 2012

प्रेम अगन


मन भीतर की प्रेम अगन तुम कैसे कहो बुझाऊं मैं
राधा राधा कहते कहते क्या कान्हा बन जाऊँ मैं,                                              तान सुरीली धड़कन वाली कम्पित झंकृत होती है,
लाल सुनहरे हरे बैंगनी रंग नयन मे बोती है,
तुम नयना नीचे कर लेती मौन हो क्या समझाऊँ मैं,
मन भीतर की प्रेम अगन तुम कैसे कहो बुझाऊं मैं,
राधा राधा कहते कहते क्या कान्हा बन जाऊँ मैं,
बीती ऋत सावन की फिर भी कोयल गीत सुनाती है,
तेरे मेरे प्रेम की वीणा निशदिन मधुर बजाती है,
तुम भी सुन लो प्रेम रागिनी क्या कोयल बन गाऊँ मैं,
प्रेम अगन
मन भीतर की प्रेम अगन तुम कैसे कहो बुझाऊं मै,
राधा राधा कहते कहते क्या कान्हा बन जाऊँ मैं,
बिजुरी तड़प रही विरहन सी घटा ह्रदय पर छाई है,
हरे विधाता जतन करो कुछ कैसी अगन लगाई है,
प्रेम अनल निर्मल सब कहते फिर क्या मलय लगाऊँ मैं,
मन भीतर की प्रेम अगन तुम कैसे कहो बुझाऊं मैं,
राधा राधा कहते कहते क्या कान्हा बन जाऊँ मैं,